कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५२१
वहाँ उसने पता लगाकर उत्पल द्वीप जानेवाले समुद्रदत्त नामक बनिये से मित्रता
की और उसी के जहाज पर प्रेमपूर्ण पाथेय लेकर समुद्री मार्ग से वह उत्पल द्वीप को
चला ॥३९-४०॥
समुद्र में कुछ दूर जाने पर बिजली-रूपी जीभ को लपलपाता हुआ काल-रूपी मेघ-घटाटोप
एकाएक उमड़ पड़ा। साथ ही विधि के समान भारी को हल्का और हल्के को भारी करता हुआ
प्रचंड पवन भी चलने लगा ॥४१-४२॥
समुद्र में वायु से विताड़ित बड़ी-बड़ी पर्वताकार लहरें उठने लगीं। मानो अपने आधार
का अपमान होने के कारण पक्षाधारी पर्वत उठ खड़े हुए हों ॥४३॥
वह जहाज कभी ऊपर और कभी नीचे इस प्रकार उछलने लगा मानो बनिकों में उत्थान
और पतन का आदर्श उपस्थित कर रहा हो ॥४४॥
कुछ ही समय में बनियों की चिल्लाहट से शब्दायमान वह जहाज मानो भार वहन न कर
सकने के कारण टूट गया ॥४५॥
जहाज के टूटने पर उसका स्वामी एक तख्ते के सहारे तैरता हुआ दूसरे जहाज के मिल
जाने पर उसके द्वारा पार हो गया ॥४६॥
गिरते हुए शक्तिदेव को मुँह बाये हुए एक बड़े मत्स्य (ह्वेल) ने समूचा ही निगल
लिया ॥४७॥
वह मत्स्य समुद्र में स्वच्छन्दता से घूमता हुआ दैवयोग से उत्पल द्वीप के समीप जा
पहुँचा ॥४८॥
वहाँ पर उसी मत्स्येन्द्र मण्डल के मछली पकड़नेवाले व्यक्तियों (केवटियाओं) द्वारा दैववश
वह पकड़ लिया गया ॥४९॥
वे उस महामत्स्य को खींचकर अपने स्वामी मत्स्येन्द्र के पास ले गये ॥५०॥
मत्स्येन्द्र ने भी उस भारी मत्स्य को देखकर कौतुकवश उन दासों से उसे फड़वा
दिया ॥५१॥
उसके फाड़ने पर, उसके पेट से आश्चर्यजनक दूसरे गर्भवास का अनुभव करनेवाला जीवित
शक्तिदेव निकल पड़ा ॥५२॥
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