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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक ३११
तुम्हारे पूर्वज पांडवों ने भी पूर्व की दिशा से ही विजय प्रारम्भ की थी और गंगातटवर्ती
हस्तिनापुर को राजधानी बनाया था क्योंकि साम्राज्य पौरुष के अधीन है, उसमें किसी देश-
विशेष का कोई महत्त्व नहीं है॥६३-६४॥
यौगन्धरायण के इस प्रकार कहकर चुप हो जाने पर राजा उदयन पुरुषार्थ को बहुमान देने
के कारण बोला—यह सत्य है कि देश-विशेष साम्राज्य का कारण नहीं होता। उच्च कोटि के
व्यक्तियों के सम्पत्ति प्राप्त करने में अपना पुरुषार्थ ही एकमात्र कारण है॥६५-६६॥
किन्तु बलवान् उच्च व्यक्ति आश्रयहीन होकर भी लक्ष्मी प्राप्त करता है। क्या
आपलोगों ने सत्त्ववान् (जीवनवाले) व्यक्ति की कथा नहीं सुनी है ? ॥६७॥
इतना कहकर मन्त्रियों से प्रार्थित वत्सराज ने महारानियों के सामने ही कथा कहना
प्रारम्भ किया॥६८॥
वीर विदूषक ब्राह्मण की कथा
समस्त भूतल में प्रसिद्ध उज्जयिनी नाम की नगरी है। पूर्व समय में उसमें आदित्यसेन
नाम का राजा राज्य करता था ॥६९॥
आदित्य के ही समान महाप्रतापी आदित्यसेन का रथ भी कभी कहीं रुकता न था॥७०॥
चन्द्रमा के समान उस राजा का छत्र ऊँचा होने पर अन्य सभी राजाओं के छत्र दूर हो
जाते थे क्योंकि उन (राजाओं) की गर्मी शान्त हो जाती थी। वह राजा भूतल में प्राप्त हो
सकनेवाले सभी भोगों का वैसे ही आश्रय-स्थान था जैसे समस्त रत्नों का आश्रय समुद्र होता
है। वह राजा किसी समय यात्रा के लिए निकला और सेना के साथ गंगा के तट पर आकर
ठहर गया। वहाँ ठहरे हुए राजा के समीप वहाँ का रहनेवाला गुप्तवर्मा नाम का कोई धनी
साहूकार कन्यारत्न को उपहार-स्वरूप लेकर राजद्वार में उपस्थित हुआ॥७१-७४॥
वह द्वारपाल से बोला—देव ! यह तीनों लोकों की रत्न-स्वरूपा कन्या मेरे घर में
उत्पन्न हुई है। इसे मैं अन्य कहीं प्रदान नहीं कर सकता। आप ही इस उपहार के योग्य हैं।
द्वारपाल से इस प्रकार निवेदन कराकर गुप्तवर्मा ने राजा को अपनी कन्या दिखाई। स्नेहापूर्ण राजा
उसके कामाग्नि के समान सौन्दर्य-प्रभाव में पिघलकर पानी-पानी हो गया॥७५-७८॥