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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक १०९
तदनन्तर सिंहासन और खजाना मिलने की प्रसन्नता में राजा रूपी मेघ पताका-रूपी
बिजली-से चमकते हुए नगरी के आकाश से सेवकों पर सोने की वृष्टि करने लगे। (राजा ने खूब
धन लुटाया) ॥४९-५०॥
इस प्रकार उत्सव पुरस्कार-वितरण आदि में उस दिन के व्यतीत हो जाने पर दूसरे
दिन राजा का मन टोहने (जाँचने) की इच्छा से यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज! तुमने अपनी
कुल-परम्परा से आये हुए सिंहासन को प्राप्त किया है, अतः अब उसपर बैठो ॥५१-५२॥
वत्सराज का दिग्विजय के लिए विचार
राजा ने कहा—'मेरे परदादा सारी पृथ्वी को जीतकर जिस सिंहासन पर बैठे थे उसपर
बिना चारों दिशाओं की विजय किये बैठने से मेरा क्या महत्त्व है ? ऐसा कहकर राजा सिंहासन
पर नहीं बैठा कारण यह कि कुलीनों को आत्माभिमान स्वाभाविक होता है ॥५३-५५॥
तब प्रसन्न यौगन्धरायण ने कहा—'ठीक है, महाराज ! तब पहले पूर्व दिशा में विजय
का उद्यम कीजिए।' ॥५६॥
यह सुनकर राजा ने यौगन्धरायण से प्रसंगवश पूछा कि 'उत्तर आदि अनेक दिशाओं
के रहते हुए राजा लोग पहले पूर्व दिशा की ओर क्यों जाते हैं ? यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज !
उत्तर दिशा यद्यपि प्रशस्त है, किन्तु म्लेच्छों के संपर्क से दूषित है। सूर्य का अस्त होने के कारण
पश्चिम को भी अच्छा नहीं माना जाता और दक्षिण दिशा यमराज की दिशा होने तथा उसमें
राक्षसों का निवास होने के कारण उसे भी अच्छा नहीं समझा जाता ॥५७-५९॥
पूर्व में सूर्य का उदय होता है। उसमें इन्द्र का निवास है। गंगा नदी भी पूर्व की ओर जाती
है, इसलिए पूर्व दिशा पवित्र और प्रशस्त मानी जाती है ॥६०॥
भारतीय प्रदेशों में भी विन्ध्याचल और हिमाचल के मध्य का देश जो गंगा-जल से पवित्र
है, सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ॥६१॥
इसलिए मंगलार्थी राजा लोग पहले पूर्व की ओर प्रयाण करते हैं और गंगा-तटवर्ती
देशों में निवास भी करते हैं ॥६२॥