कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक १०१
अपने श्वसुर के इस प्रकार के वचन सुनकर वत्सराज का हृदय आनन्द से भर गया।
महारानी वासवदत्ता पर प्रेम बढ़ गया और मन्त्री यौगन्धरायण पर भी स्नेह दृढ़ हो गया ॥१७॥
तदनन्तर दोनों महारानियों के साथ उस दूत को सम्मान-सहित विदा करके उत्साहित-
हृदय वत्सराज ने मन्त्रियों से परामर्श करके दिग्विजय-यात्रा के प्रबन्ध में कौशाम्बी जाने का
निश्चय किया ॥१७१॥
महाकवि श्री सोमदेव भट्ट-रचित कथा सरित्सागर के लावानक लम्बक का
तृतीय तरंग समाप्त
चतुर्थ तरंग
वत्सराज का कौशाम्बी में पुनरागमन
तदनन्तर एक दिन वत्सराज ने अपनी पत्नियों तथा मन्त्रियों के साथ लावाणक से
कौशाम्बी की ओर प्रस्थान किया ॥१॥
असमय में उछलती हुई समुद्र की लहरों के समान कोलाहल से दिशाओं को गुंजित करती
हुई उमड़ी सेनाओं ने साथ ही प्रस्थान किया ॥२॥
यदि सूर्य उदयाचल पर्वत के साथ आकाश में गमन करे तो हाथी पर बैठे हुए राजा
उदयन की उपमा उससे दी जा सके' ॥३॥
सिर पर लगे हुए श्वेत छत्र से ऐसा मालूम होता था कि राजा ने सूर्य के तेज को जीत
लिया था इसलिए प्रसन्न होकर चन्द्रमा मानो छत्र के व्याज से राजा की सेवा कर रहा
था ॥४॥
उस मत्तोरति विराजमान (हाथी पर बैठ हुए) तेजस्वी उदयन के चारों ओर सामन्तगण
इस प्रकार चक्कर लगा रहे थे जैसे अन्य ग्रह ध्रुव-नक्षत्र के चारों ओर भ्रमण करते हैं ॥५॥
राजा के पीछे हथिनिया पर बैठी हुई दोनो रानियां लक्ष्मी और पृथ्वी के समान राजा
का अनुगमन कर रही थी ॥६॥
१ इसका नाम अभूतोपमा है। इसका उदाहरण दण्डी के काव्यादर्श में इस प्रकार
है—हे मुग्ध ! यदि सुन्दर नेत्रों वाला कमल हो तो तेरे मुंह की शोभा धारण कर सके। काव्य
प्रकाशकार ने इस अलंकार को अतिशयोक्ति का एकभेद माना है।