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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

'हे दुराचारिणी! वन में घूमते हुए रामचन्द्र के दर्शन पर्यन्त तू पत्थर हो जा' साथ
ही इन्द्र को भी शाप दिया कि 'जिस स्त्री-वरांग¹ के लोभ से तूने पाप किया है, उस
अंग के तेरे शरीर में हजारों चिह्न हो जायेंगे। इस प्रकार दोनों को शाप दे कर मुनि
स्वेच्छा से तपस्या करने चले गये। अहल्या भी कठोर शिला बन गई, इन्द्र का शरीर, भी
चारों ओर से स्त्री-योनि के चिह्नों से भर गया। दुश्चरित्रता किसकी दुर्गति का कारण
नहीं होती॥१४२-१४७॥

इसी प्रकार मनुष्य जीवन में जो भी कुकर्म करता है, उसका फल उसे जीवन में ही भोगना
है। जो जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है॥१४८॥

इसलिए उदार चित्तवाले व्यक्ति दूसरों के विरुद्ध कार्यों में प्रवृत्त नहीं होते। उच्च
कोटि के व्यक्तियों का यह स्वाभाविक नियम है॥१४९॥

तुम दोनों महारानियां पूर्वजन्म की दिव्य बहिनें या किसी शाप के कारण मर्त्यलोक
में आ गई हो, उसी प्रकार तुम दोनों के हृदय परस्पर सन्देह-रहित एवं शुद्ध हैं॥१५०॥

वसन्तक से इस प्रकार सुनकर दोनों रानियां के हृदय में जो थोड़ी ईर्ष्या की क्षीण रेखा-सी
थी वह भी उन्होंने मिटा दी॥१५१॥

महारानी वासवदत्ता भी पति को दोनों के लिए समान मानकर पद्मावती को इसमें उसी
प्रकार उद्यत रखती थी जैसे आत्महित में॥१५२॥

मन में कुछ शंकित मगध-नरेश ने भी रानी की महानुभावता का परिचय उसके भेजे
हुए दूतों से जानकर सन्तोष प्रकट किया॥१५३॥

किसी दिन महामन्त्री यौगन्धरायण महारानियां तथा अन्य स्नेही मित्रों के साथ बैठे
हुए नरराज के समीप आकर बोला—'महाराज ! अब कौशाम्बी क्यों नहीं चलते ? अब
तो डरे हुए भी मगध-नरेश से किसी प्रकार की शंका नहीं है॥१५४-१५५॥


१. वर = उत्तम, अंग स्त्री की जननेन्द्रिय।
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