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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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तृतीय लम्बक २९१
आग्रहपूर्वक बार-बार पूछने पर गृहचन्द्र ने कुञ्जित मन से उस सोमप्रभा का सारा वृत्तान्त
सुना दिया ॥१९६॥
सारा समाचार सुनकर उस पर दयालु ब्राह्मण ने उसे कहा कि मैं तुम्हें अग्नि की
उपासना का मन्त्र देता हूँ जिससे तुम्हारी कामना पूरी होगी ॥१९७॥
इस प्रकार एकान्त में जप करते हुए गृहचन्द्र के सम्मुख अग्नि के मध्य से एक पुरुष
निकला ॥१९८॥
वह ब्राह्मण-रूपी अग्नि देवता चरण में पड़े हुए गृहचन्द्र से बोला— आज मैं तुम्हारे
घर में भोजन करूँगा और रात में यहीं रहूँगा और तुम्हें तत्त्व बताकर तुम्हारा कार्य
सिद्ध करूँगा ॥१९९ ॥
इस प्रकार दूसरे ब्राह्मणों की भाँति गृहचन्द्र के यहाँ भोजन करके वह ब्राह्मण उसी
के पास सावधानता से एक पहर तक सोया। कुछ समय के अनन्तर घर के सब लोगों के गाढ़ी
निद्रा में सो जाने पर गृहचन्द्र की स्त्री सोमप्रभा रात में घर से निकली ॥१ १ २॥
उसी समय उस ब्राह्मण ने गृहचन्द्र को जगाया और कहा कि जाओ अपनी स्त्री का हाल
देखो। योगशक्ति से उसे और अपने को भौंरे का रूप बनाकर उसके घर से निकली हुई उसकी
स्त्री को दिखाया ॥१ १ ३॥
वह सुन्दरी घर से निकलकर, नगर के बाहर दूर तक चली गई। वह ब्राह्मण भी गृह
चन्द्र के साथ उसके पीछे-पीछे चला ॥१ १ ५॥
नगर के बाहर गृहचन्द्र ने विशाल विस्तृत तनोबाले तथा छायावाली शाखाओ से
युक्त और निकलती हुई मधुर संगीत-ध्वनि से युक्त एक वट-वृक्ष को देखा। उस वृक्ष
के नीचे उसने वीणा और बाँसुरी के मधुर स्वर से युक्त दिव्य संगीत-ध्वनि सुनी।
उस वृक्ष की एक विशाल शाखा पर अपनी पत्नी (सोमप्रभा) के समान आकृतिवाली
दिव्यकन्या को एक ऊँचे आसन पर बैठे हुए देखा। वह दिव्यकन्या अपनी उज्ज्वल कान्ति से
चाँदनी को जीत रही थी और उसके दोनों ओर चवल चँवर डुल रहे थे। वह कन्या मानो
चन्द्रमा के लावण्य-कोष (खजाने) की अधिष्ठात्री देवी थी ॥१ १-१ ॥
गृहचन्द्र ने देखा कि उसकी पत्नी सोमप्रभा भी वृक्ष पर चढ़कर उसी प्रकार उसके साथ
आसन पर जा बैठी ॥१२१ ॥