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सर्वकोश
काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

काशिका वृत्ति (आचार्य वामन एवं जयादित्य - अष्टाध्यायी सूत्र-वृत्ति सम्पूर्ण सान्वय सटीक)

Kasika Vritti of Vamana and Jayaditya on Panini Sutras

आचार्य वामन एवं जयादित्य (सम्पादक: पण्डित बालशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished828 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

२५० ॥ काशिका ॥ ३ ॥ ४ ॥
लोट इत्येव। लोट्संबन्धिन उत्तमपुरुषस्याडागमो भवति, स चोत्तमपुरुषः
पिद्भवति। करवाणि। करवाव। करवाम। करवै। करवावहै। करवामहै॥
एत ऐ ॥ ९३ ॥
लोडोत्तमस्येति वर्तते। लोडोत्तमसंबन्धिन एकारस्य ऐकारादेशो भवति।
आमोपवादः। करवै। करवावहै। करवामहै। इह कस्मान्न भवति। पचा-
वेदं, पचामेदम्। बहिरङ्गलक्षणत्वादुत्त्वस्य॥
लेटो ऽडाटौ ॥ ९४ ॥
लेटो ऽडाटावागमौ भवतः पर्यायेण। जोषिषत्। तारिषत्। मन्दि-
षत्। पताति विद्युत्। उदधिं च्यावयाति॥
आत ऐ ॥ ९५ ॥
लेट् इत्येव। लेट्संबन्धिन आकारस्य ऐकारादेशो भवति। प्रथमपुरुष-
मध्यमपुरुषात्मनेपदद्विवचनयोः। मन्त्रयैते। मन्त्रयैथे। करवैते। करवैथे।
आटः कस्मान्न भवति। विधानसामर्थ्यात्॥
वैतो ऽन्यत्र ॥ ९६ ॥
लेट इत्येव। लोट्संबन्धिन एकारस्य वा ऐकारादेशो भवति। अन्य-
त्रेत्यनन्तरो विधिरपेक्ष्यते। आत ऐ इत्येतद्विषयं वर्जयित्वा एत ऐ भवति।
सप्ताहानि शयै। अहमेव पशूनामीशै। मदया एव वो यहा गृहान्तै। मङ्गे-
रुत्तान्येव वः पात्राण्युच्यन्तै। न च भवति। यत्र क्व च ते मनो दत्तं दध-
सउत्तरम्। अन्यत्रेति किम्। मन्त्रयैते। मन्त्रयैथे॥
इतश्च लोपः परस्मैपदेषु ॥ ९७ ॥
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