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कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

৮ম সর্গ ] আচারব্যবस्थापन। ৫১
सातटि करिया प्रकृति आछे, अतएव सर्व्वसमेत एकविंशति प्रकृति ॥३३॥
मौलिक राजा—अरि, विजिगीषु, मध्यम ओ उदासीन--चारिजन। इहादिगेर
प्रत्येकेर मित्र पृथक् धरिले आठजन हय। एइ आठजनेर प्रत्येकेर
अमात्यादि पञ्चप्रकृति पृथक् धरिले जगती अक्षर परिमित अर्थात् मूल राजा
चारिजन ओ बन्धु चारिजन, एइ आटेर अमात्यादि द्रव्य-प्रकृति चल्लिश, मोट
आठचल्लिश; इहार नाम जगती-मण्डल ॥३४॥ मण्डलज्ञेरा बलिया थाकेन
ये, विजिगीषु ओ ताहार पुरोभागेर अरि, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र ओ
मित्रारिमित्रमित्र एइ पाँचजन एव पश्चाते पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, आक्रन्दासार
ओ पार्ष्णिग्राहासार एइ चारि, एइ सकलके लइया दशक-मण्डल हय ॥३५॥ एइ
दशजन राजार अमात्यादि प्रकृतिर पृथक् पृथक् गणना करिले षष्टि संख्या हय
(१० × ५ = ५० + १० = ६०), इहाकेई मण्डलवित् पण्डितेरा षष्टिसंख्याक-
मण्डल बलेन ॥३६॥ विजिगीषुर सम्मुखे शत्रु एव मित्र एइ दुइ, स्वयं
विजिगीषु एव पश्चाते शत्रु ओ मित्र एइ दुइ, एकूने पाँच; इहादेर
प्रत्येकेर अमात्यादि प्रकृति पृथक् धरिया पँचिश; एइ पँचिश ओ पूर्व्वोक्त
पाँच मोट त्रिश, इहाके त्रिंशत्-मण्डल कहे ॥३७॥
बहुदर्शीगण विजिगीषुर मण्डलेर विभागेर न्याय शत्रुरओ मण्डलेर विभाग
देखिया थाकेन। मनीषिगण [ शत्रुर मण्डलविभाग सम्बन्धे ] पञ्चक-मण्डलई
उपयुक्त बलेन एव त्रितय-मण्डलेर कथाओ बलेन। ( पाठान्तरे—मनीषिगण
बलेन ये शत्रुर पाँचटाई मण्डल एव त्रिंशत्-मण्डलओ आछे अर्थात् पाँचटाई
राजप्रकृति एव ५ × ५ = २५टि द्रव्यप्रकृति ) ॥३८॥ पराशर बलेन ये
प्रकृतपक्षे प्रकृति दुइटि—एकटि अभियोक्ता, अन्यटि अभियुक्त। अभियोग-
कारी बलियाइ अभियोक्ता प्रधान, आर याहार उपर अभियोग करा हय
सेइ अभियुक्त अप्रधान। फलतः विजिगीषु ओ अरि एइ दुइ प्रकृति ॥३९॥
विजिगीषु एव अरि परस्पर परस्परेर प्रति अभियोग कराय उभयेर
अवस्था एक प्रकारइ हवाय प्रकृतपक्षे एकइ प्रकृति ॥४०॥ एइरूपे

৫২ কামন্দকীয় নীতিসার।
বহুপ্রকার মণ্ডলের নির্দেশ হয়। তাহার মধ্যে দ্বাদশরাজক-মণ্ডল স্পষ্টভাবে
সকলের পরিজ্ঞাত ॥৪১॥ আটটি শাখা (মিত্রাদি চারি ও পার্শ্বিগ্রাহাদি
চারি); চারিটি মূল (অরি, বিজিগীষু, মধ্যম ও উদাসীন); ষাট্টি পত্র
(১২ x ৫ = ৬০ দ্রব্য-প্রকৃতি); দৈব ও মানুষ এই দুই প্রকৃতিতে অবস্থিত;
ছয়টি ফুল (সন্ধি, বিগ্রহ, যান, আসন, দ্বৈধ ও সংশ্রয় এই ছয় গুণ); তিনটি
ফল (ক্ষয়, স্থান ও বৃদ্ধি); যে ব্যক্তি এইরূপ বৃক্ষকে জানেন তিনিই
নীতিজ্ঞ ॥৪২॥ ইতি মণ্ডলযোনি।
মণ্ডলচরিত।
পার্শ্বিগ্রাহ ও পার্শ্বিগ্রাহাসার ইহারা শত্রুর মিত্র বলিয়া কথিত এবং
আক্রন্দ ও আক্রন্দাসার ইহারা বিজিগীষুর মিত্র বলিয়া উক্ত হইয়াছে ॥৪৩॥
পশ্চিমের (পশ্চাতের) অরিদ্বয় সহিত মিত্রদ্বয়ের অর্থাৎ পার্শ্বিগ্রাহের সহিত
আক্রন্দের এবং পার্শ্বিগ্রাহাসারের সহিত আক্রন্দাসারের যুদ্ধ বাধাইয়া দিয়া,
ঠিক ঐ ভাবেই পূর্ব্বভাগের (সম্মুখের) শত্রু ও শত্রুর মিত্র এই উভয়ের
সহিত মিত্র ও মিত্রমিত্রের যথাক্রমে বিগ্রহ বাধাইয়া স্বয়ং বিজিগীষু
অগ্রসর হইবেন ॥৪৪॥ মিত্র ও মিত্রমিত্র ইহারা যখন অরিমিত্রের মিত্রকে
যুদ্ধে স্তম্ভিত করিয়াছে, তখনই ঐ কৃতকার্য্য প্রায় উভয় মিত্রের পশ্চাৎ
দাঁড়াইবেন অর্থাৎ বিজিগীষু ঐ সময়ে প্রকাশ্যভাবে মিত্রপক্ষের নরপতির
সাহায্য করিবেন [ইহা পূর্ব্বভাগের কথা] ॥৪৫॥ আক্রন্দ এবং স্বয়ং
পার্শ্বিগ্রাহকে পীড়িত করিবেন। এবং আক্রন্দ ও আক্রন্দাসার দ্বারা
পার্শ্বিগ্রাহাসারকে পীড়িত করিবেন। [ইহা পশ্চিমভাগের কথা] ॥৪৬॥ স্বয়ং
ও মিত্র উভয়ে মিলিয়া রিপুর উচ্ছেদ করিবেন, আর মিত্র ও মিত্রমিত্রের
সাহায্যে রিপুমিত্রকে প্রপীড়িত করিবেন ॥৪৭॥ পৃথিবীপতি শত্রুর মিত্রের
মিত্রকে নিজের মিত্র এবং মিত্রের মিত্র এই উভয় মিত্রের সাহায্যে পীড়িত
করিবেন ॥৪৮॥ সৰ্ব্বদা উত্থানশীল বিজিগীষু নরপতি পূর্ব্বোক্তক্রমে মধ্যে মধ্যে
নিজদিগের অহিতাচরণকারী শত্রুদিগকে পীড়িত করিবেন ॥৪৯॥ উদ্যোগী

৮শ সর্গ ] মণ্ডলচরিত। ৫৩
নীতিজ্ঞগণ শত্রুকে সর্ব্বদা উভয়দিকে পীড়িত করিবেন, ইহাতে রিপুর উচ্ছেদ
হয় অথবা ঐ শত্রু বশবৰ্ত্তী হইয়া থাকে ॥৫০॥ স,ধারণ কারণে মিত্ৰতাকারী
এবং সামান্য কারণে মিত্রত,ভঙ্গকারী, ইহাকেই সামান্য কহে। সামান্য-মিত্রকে
সর্ব্বপ্রকার উপায় অবলম্বন করিয়া আত্মসাৎ করিবে অর্থাৎ মিত্র করিয়াই
রাখিবে—মিত্রতাভঙ্গ করিতে দিবে না; এইরূপ মিত্র দ্বারা শত্রুকে উচ্ছিন্ন
করিবে; তাহা হইলে শত্রুগণ অনায়াসেই উচ্ছেদ যোগ্য হয় ॥৫১॥ কারণ
দ্বারাই মিত্র এবং শত্রু হয়। যে কারণে শত্রু হয় সেই কারণ পরিত্যাগ
করিবে ॥৫২॥ রাজা প্রধানতঃ সকল স্থানেই সকল প্রজার সহিত মেলা
মেশা করিবেন। তাহাদের সহিত মিলিত হইলে সম্পত্তি সর্ব্বাঙ্গীন ভোগ
হয়। (পাঠান্তরে—রাজা শত্রু এবং মিত্রের রাজ্যের সকল লোককে অনুরক্ত
করিবেন এবং ঐ প্রজাগণকে নিজ রাজ্যে সংস্থাপন করিলে সর্ব্বপ্রকার
শ্রীলাভ হয়) ॥৫৩॥ বিজিগীষু নরপতি দূরবর্ত্তী অর্থাৎ স্বীয় মণ্ডলের বাহিরের
মাণ্ডলিক-রাজাগণ এবং অন্যান্য অনুচ্ছেদ্য দুর্গবাসী-রাজাগণ ইহাদিগকে
মিত্র করিবেন, তাহা হইলে ইহাদিগের সহিত বিশেষ বন্ধুতা-সূত্রে
আবদ্ধ রাজারা বিজিগীষুর মণ্ডলের সাধন করিবে অর্থাৎ সহায়ক হইবে
॥৫৪॥ মধ্যম জয় করিবার ইচ্ছায় অভিযানে উন্মুখ হইলে বিজিগীষু শত্রুর
সহিত মিলিত হইয়া (অর্থাৎ সন্ধি করিয়া) এক হইয়া থাকিবেন; তাহা
হইলে মধ্যম আপনাকে অসক্ত দেখিয়া বিজিগীষুর সহিত সন্ধি করিবেন ॥৫৫॥
উদাসীন অভিযান করিলে সমস্ত মাণ্ডলিকগণ (অর্থাৎ অরি, বিজিগীষু ও
মধ্যম) পরস্পর সঙ্ঘবদ্ধ হইয়া (সন্ধি করিয়া মিলিত হইয়া) থাকিবেন কিন্তু
পরস্পর মিলিত হইয়া না থাকিতে পারিলে উদাসীনের নিকট পরাজিত হইবে
॥৫৫। ক *। প্রবল বিপদ উপস্থিত হইলে স্বার্থসিদ্ধির জন্য মিলিতভাবে
অবস্থান করিবেন। সঙ্ঘধর্ম্ম অর্থাৎ মিলিতভাবে থাকাই সম্পূর্ণ-আপদ
নিবারণের উপায়। ৫৫ খ *॥

  • ৫৫ ক ও খ এই দুইটি শ্লোক টুভাঙ্কুরের সংস্করণে অতিরিক্ত (৫৬—৫৭ সংখ্যা)।

५४ कामन्दकीय नीतिसार।
सहजशत्रु ओ कार्य्यजशत्रु, एइ दुइ प्रकार शत्रु हय़। स्वकुलोत्पन्न शत्रुकेइ
सहज-शत्रु बले—एतद्भिन्न ये शत्रु हय़, ताहार नाम कार्य्यज-शत्रु ॥२६॥
उच्छेद, अपचय़, पीड़न एबं कर्षण—एइ चारि प्रकार ब्यबहार शत्रु-विषय़े
आछे, इहा नीतिशास्त्र-बेत्तारा बलिय़ा थाकेन ॥२७॥ समस्त प्रकृत‍िर नाशकेइ
उच्छेद कहे। योग्य-पुरुषगणके नष्ट कराकेइ पण्डितगण अपचय़
कहेन ॥२७ क *॥ पण्डितेरा कोष रिक्त करा, दण्डसामर्थ्ये़र हानि करा
• एबं प्रधान मन्त्रीर बध कराकेइ कर्षण कहेन। एतद्भिन्न अनिष्‍ट-साधनके
पीड़न कहेन ॥२८॥ शत्रु यखन आश्रय़बिहीन (प्रबल पृष्ठपोषक-बिहीन)
हय़ अथवा दुर्ब्बलके आश्रय़ करे एइरूप अवस्थाय़ ऐ शत्रु सम्पद्युक्त हइलेओ
उच्छेद-योग्य हय़ ॥५९॥ निजेकेइ आश्रय़ बलिय़ा मने करे एमन
आश्रय़ाभिमानीके काले (अर्थात् सुयोग बुझिय़ा) कर्षण ओ पीड़न करिबेन।
बास्तविक आश्रय़ बलिते दुर्ग अथवा साधु-सम्मत-मित्र। फलतः आश्रय़ाभिमानी
निराश्रय़ ॥६०॥ सकल तन्त्रेर अपहारी बलिय़ा बिभीषणेर सहजशत्रु
सहोदर रावण एबं सूर्य्यपुत्र सुग्रीबेर सहजशत्रु सहोदर बाली उच्छेद
हइय़ाछिल। सेइरूप सर्व्वतन्त्र हरण करिले निजशत्रु (अर्थात् सहज ज्ञातिशत्रु)
उच्छेदयोग्य हय़ ॥६१॥ सहजशत्रु छिद्र, मर्म्म, (पाठान्तरे—कर्म्म) ओ
वीर्य्य (बल) (पाठान्तरे—वित्त) जाने; अतएब अन्तर्गत अग्नि येमन शुष्क
वृक्षके दग्ध करे सेइरूप समस्त वृत्तान्त अबगत बलिय़ा सहजशत्रु सर्व्वनाश
साधन करे ॥६२॥
ये मित्र शत्रुरओ मित्र एबं बिजिगीषुरओ मित्र, एइरूप उभय़ात्मक मित्र
यदि [उदासीनभाबे ना थाकिय़ा] शत्रुर पक्षपातित्व करे, ताहा हइले इन्द्र
येमन त्रिशिराके सत्वर हइय़ा बध करिय़ाछिल सेइरूप बिजिगीषुओ एइ
पक्षपाती मित्रके शीघ्रइ बिनष्ट करिबेन (१) ॥६३॥ *। बिजिगीषु आपनार

  • २७ क श्लोकटि टुभाङ्कुर संस्करणे अतिरिक्त आछे। (उहाते ६० संख्या)
    (१) एइ श्लोकटि टुभाङ्कुर संस्करणे ७५ संख्यक श्लोक।

८म सर्ग ] प्रकृति सम्पत् । ५५
उच्छेद आशङ्काय बलवान् कर्तृक निगृहीत हइयाछे एइरूप कष्टे पतित शत्रुर
अपचय करिबैन। (पाठान्तरे—विजिगीषु आपनार उच्छेदेर आशङ्काय बलवान्
कर्तृक निगृहीत एवं कष्टे पतित शत्रुर उपचय अर्थात् ताहार पृष्ठपोषण करिया
ताहारके रक्षा करिबैन। तात्पर्य्य एइ ये अन्य बलवान् राजा यखन पार्श्ववर्त्ती
शत्रुक़े ध्वंस करिते आरम्भ करियाछे तखन ओइ शत्रुक़े रक्षा करा आवश्यक,
केनना, ओइ बलवान् राजा शत्रु-राज्य-ग्रहण करिते पारिलेइ एइ विजिगीषुर
राज्य आक्रमण करिबे, एइ भये एखाने शत्रुरओ साहाय्य करिते हइबे)
॥६४॥ * विजिगीषु ये शत्रुर उच्छेद करिले अन्यान्य नूतन शत्रु जन्माय सेइ
नूतन शत्रुर उच्छेद करिबैन ना; एइ नूतन शत्रुक़े निजेर अधीन करिया
राखिबैन। इहार तात्पर्य्य एइ ये, विजिगीषु भूम्यनन्तर शत्रुर राजत्व ग्रहण
करिले पूर्वे विजिगीषुर ये स्वाभाविक मित्र छिल अर्थात् शत्रुर ये भूम्यनन्तर
शत्रु छिल सेइ राजा एखन विजिगीषुर भूम्यनन्तर हओयाय स्वाभाविक शत्रुर स्थान
ग्रहण करिल, सुतरां एइ नूतन शत्रुर सहित शत्रुता ना राखिया उहाके हस्तगत
करिया राखिबैन ॥६५॥ वंशपरम्परागत शत्रु दुर्द्दमनीय हइले (पाठान्तरे—
वशवर्त्ती शत्रु अन्येर साहाय्ये विद्रोही हइले) इहाके वशीभूत करिवार जन्य
ताहार विपक्षे ताहारइ वंश्याय एकजनके दाँड़ कराइबैन ॥६६॥ विष विष
द्वाराइ प्रशमित हय, हीरकेर द्वारा हीरकेर छिद्र करा याय एवं परीक्षित
सामर्थ्यसम्पन्न गजेन्द्र द्वाराइ अन्य गजेन्द्र নিহত हय ॥६७॥ मत्स्य मत्स्यकेइ
खाइया फेले, सेइरूप ज्ञाति ज्ञातिके निश्चयइ नष्ट करे, देखा याय राम
रावणके बध करिवार जन्य विभीषणके सम्मान प्रदान करियाछिलेन ॥६८॥
ये कार्य्य करिले मण्डलेर क्षोभ उपस्थित हय, बुद्धिमान् राजा ताहा करिबैन
ना, किन्तु प्रकृतिर अनुरञ्जन करिबैन ॥६९॥ साम दान ओ मान द्वारा आत्मीय
प्रकृतिर अनुरञ्जन करिबैन एवं भेद ओ दण्ड प्रयोगे परकीय अर्थात्
शत्रु ओ शत्रु-प्रकृतिर भेद-सम्पादन करिबैन ॥७०॥

  • टुभाटुरेर संस्करणेर एइ पाठान्तरइ समीचीन।

৫৬ কামন্দকীয় নীতিসার।
সমস্ত দ্বাদশ মণ্ডল মিত্র ও শত্রুতে পরিপূর্ণ। সকল লোকই স্বার্থপর।
কোথাও যে মধ্যস্থতা দেখা যায় তাহাও প্রকৃত পক্ষে মধ্যস্থতা নয় অর্থাৎ
স্বস্বার্থ উপস্থিত হইলেই এই মধ্যস্থতা আর থাকে না ॥৭১॥ ভোগপ্রাপ্ত
অর্থাৎ অতি বৃদ্ধিপ্রাপ্ত হইয়া তদ্ব্যুদয় সম্পন্ন মিত্রও বিরুদ্ধ কার্য্য করিলে
তাহাকে পীড়ন করিতে হইবে; এবং ঐ মিত্র অত্যন্ত বিরক্ত হইলে তাহার
নিধন সাধন করিতে হইবে, যেহেতু ঐ মিত্র পাপী এবং রিপুর মধ্যে
গণনীয় ॥৭২॥*॥ বিজিগীষু নিজের বৃদ্ধির সহায়তাকারী শত্রুকেও মিত্র
করিবেন; কিন্তু মিত্রও অহিত-সাধনে প্রবৃত্ত হইলে ঐ মিত্রকে পরিত্যাগ
করিবেন ॥৭৩॥ হিতবিষয়ে যে সর্ব্বদা অত্যন্ত যত্ন করে সেই বন্ধু। [ সাধারণ
কার্য্যে ] তদনুরক্তই হউক আর বিরক্তই হউক তাহাতে কিছু আসে যায়
না, যে উপকারী সেই মিত্র ॥৭৪॥ মিত্রের দোষ জানিতে পারিলে তাহার
বিষয় বহুবার বিচার করিয়া (স্পষ্টভাবে দোষ প্রমাণিত হইলে) ঐ মিত্রকে
ত্যাগ করিবেন; যাহার কোন দোষ নাই এমন মিত্রকে যে ত্যাগ করে সেই
ব্যক্তি নিজের ধর্ম্ম এবং অর্থের হানি করে ॥৭৫॥ রাজা স্বয়ং ভৃত্য, মিত্র ও
বন্ধুদিগের সর্ব্বদা দোষ ও গুণের অন্বেষণ করিবেন। স্বয়ং অনুসন্ধান করিয়া
দোষ জানিতে পারিলে তখন দণ্ডপ্রয়োগ প্রশস্ত বলিয়া স্থির করিবেন ॥৭৬॥
তত্ত্বতঃ দোষ না জানিয়া কাহারও প্রতি কদাচ কোপ করিবেন না; যেহেতু
নির্দোষ ব্যক্তির উপর ক্রোধকারীকে লোক সকল সর্পের ন্যায় মনে
করে ॥৭৭॥ মিত্রদিগের মধ্যে কে উত্তম, কে মধ্যম এবং কে অধম তাহা
জানিতে হইবে; যেহেতু উত্তম মিত্রের মধ্যম মিত্রের এবং অধম মিত্রের
প্রত্যেকের কার্য্যই পৃথক পৃথক। তাৎপর্য্য এই যে, যে যেমন মিত্র তাহাকে
সেইরূপ কার্য্যে নিয়োগ করিবেন ॥৭৮॥ মিত্রদের সম্বন্ধে মিথ্যা অভিযোগ
করিবেন না এবং সেইরূপ অর্থাৎ মিথ্যা অভিযোগাদিও শুনিবেন না;

  • তাঞ্জাবুর সংস্করণে এই স্থানে 'বর্ত্ততে ইত্যাদি' করিয়া ৭৪ সং যে শ্লোকটি আছে,
    তাহা কলিকাতা সংস্করণের ৬০ শ্লোক এবং সেই স্থানেই উহা ধরা হইয়াছে।

৮ম সর্গ ] মণ্ডলচরিত। ৫৭
পক্ষান্তরে—যাহারা মিত্রভেদ করায় তাহাদিগকে পরিত্যাগ করিবেন ॥৭৯॥
প্রায়োগিক অর্থাৎ সাধারণের ব্যবহার্য্য বাক্য, মাৎসরিক অর্থাৎ পরশ্রী-
কাতরের বাক্য, মধ্যস্থ অর্থাৎ নিরপেক্ষ লোকের কথা, পক্ষপাতিক অর্থাৎ
পক্ষপাতী বাক্য, সোপন্যাস অর্থাৎ অর্থলিপ্সুর কথা এবং সানুশয় অর্থাৎ
বিশ্বাস উৎপাদনের উপযুক্ত কথা (পাঠান্তরে - সংশয়িত বাক্য অর্থাৎ
সন্দেহজনক বাক্য)—এই সকল বাক্য বিশেষরূপে বুঝিবেন ॥৮০॥ বন্ধুদের
মধ্যে [বিবাদ উপস্থিত হইলে] রাজা প্রকাশ্যে কোন পক্ষই অবলম্বন
করিবেন না এবং বন্ধুদিগের মধ্যে পরস্পর পরশ্রীকাতরতা ঘটিলে রাজা স্বয়ং
শীঘ্রই তাহা নিবারণ করিবেন ॥৮১॥ কার্য্যের গুরুত্বপ্রযুক্ত কালজ্ঞ-নরপতি
নীচলোকদিগের বিদ্যমান দোষকেও ঢাকিয়া অবিদ্যমান গুণেরও কীর্ত্তন
করিবেন অর্থাৎ নীচলোকদিগকে হাতে রাখিবার আবশ্যক হইলে তাহাদের
দোষ উপেক্ষা করিয়া অযথা গুণেরই উল্লেখ করিবেন। ফলতঃ একটু তোষা-
মোদ করিতে হইবে ॥৮২॥ রাজা উত্তম মধ্যম ও অধম সকল অবস্থার লোককেই
মিত্র করিবেন। যাঁহার অনেক মিত্র তিনি শত্রুদিগকে বশবর্ত্তী করিয়া রাখিতে
পারেন ॥৮৩॥ লোকের বিপদ্ উপস্থিত হইলে প্রকৃত মিত্র যে ভাবে প্রতীকার
করিতে দাঁড়ায় সেইরূপভাবে ভ্রাতা বা অন্য কোন ব্যক্তিই দাঁড়াইতে
পারে না ॥৮৪॥ দৃঢ়ব্রত মিত্রগণ দ্বারা সর্ব্বতোভাবে শত্রুদিগকে নিগৃহীত
করিবেন; মণ্ডলজ্ঞগণ ইহাকেই বিজীগীষুর মণ্ডলচরিত বলিয়া থাকেন ॥৮৫॥
মিত্র উদাসীন এবং শত্রু ইহাদের লইয়াই বিজীগীষুর মণ্ডল এবং ইহাদের
সম্যক্ প্রকারে আয়ত্তীভূত করাই মণ্ডলশোধন্ ॥৮৬॥ রাজা নীতিপথে
থাকিলে, উদ্যোগী হইয়া মণ্ডলের শুদ্ধি সম্পাদন করিলে এবং বিশুদ্ধমণ্ডল
হইয়া প্রজাবর্গের অনুরঞ্জন করিলে শারদীয় শশধরের ন্যায় সুন্দররূপে শোভা
পাইতে থাকেন ॥৮৭॥ ইতি কামন্দকীয় নীতিসারে মণ্ডলযোনি মণ্ডলশোধন
-নামক অষ্টম সর্গ ॥

নবম সর্গ।
সন্ধি বিকল্প।
বলবান্ কর্তৃক নিগৃহীত হইয়া আর কোনরূপ প্রতীকারের উপায়
না পাইয়া বিপদগ্রস্ত হইয়া সন্ধির চেষ্টা করিবেন এবং এই উপায়ে
কালবিলম্ব করিবেন ॥১॥
কপাল, উপহার, সন্তান, সঙ্গত, উপন্যাস, প্রতীকার, সংযোগ, পুরুষান্তর,
অদৃষ্টনর, আদিষ্ট, আত্মামিষ, উপগ্রহ, পরিক্রয়, উচ্ছিন্ন, পরিলক্ষণ (পরভূষণ
—পাঠান্তর) ও স্কন্ধোপনেয় এই ষোল প্রকার সন্ধির কথা সন্ধিবিচক্ষণ-ব্যক্তি-
গণ বলিয়াছেন ॥২-৪॥ (এই ষোল প্রকার সন্ধি অবান্তর ভেদে অনেক প্রকার
হইয়া থাকে।)* কেবল উভয় পক্ষে যে সমানভাবে সন্ধি তাহাকে কপাল-
সন্ধি কহে। যে সন্ধিতে কিছু দিতে হয় তাহার নাম উপহার-সন্ধি।
কন্যাদান পূর্ব্বক যে সন্ধি স্থাপিত হয় তাহার নাম সন্তান-সন্ধি। বন্ধুতা-
স্থাপনপূর্ব্বক যে সন্ধি স্থাপিত হয় নীতিজ্ঞগণ তাহাকে সঙ্গত-সন্ধি বলিয়াছেন।
[ এক্ষণে সঙ্গত-সন্ধির বিশেষত্ব নির্দেশ করা হইতেছে।] এই সন্ধিতে উভয়
পক্ষের যাবজ্জীবন সমান স্বার্থ বর্ত্তমান থাকে এবং সম্পদে ও বিপদে কোন
কারণেই এই বন্ধুত্ব নষ্ট হয় না সুতরাং এই সঙ্গত-সন্ধির উৎকৃষ্টতা হেতু
অপর সন্ধিকুশল পণ্ডিতেরা এই সন্ধিকে সোণার ন্যায় নির্ম্মল দেখিয়া
ইহার কাঞ্চন-সন্ধি নাম দিয়াছেন ॥৫-৮॥ উভয়ের কল্যাণকারী একমাত্র
উদ্দেশ্য সিদ্ধির নিমিত্ত যে সন্ধি করা হয় তাহাকে উপন্যাস-কুশল-পণ্ডিতগণ
উপন্যাস-সন্ধি বলেন ॥৯॥ 'আমি পূর্ব্বে উপকার করিয়াছি এখন তুমি আমার
প্রত্যুপকার করিবে' এই সর্ত্তে যে সন্ধি তাহার নাম প্রতীকার-সন্ধি ॥১০॥
অথবা 'আমি এখন উপকার করিতেছি এবং কালক্রমে এ আমার উপকার
* এই অংশটুকু ভট্টাচার্য্যের সংস্করণে বন্ধনীর মধ্যে আছে এবং কথিত হইয়াছে যে
জয়মঙ্গলা-ব্যাখ্যাকার ইহা ধরেন নাই।

১ম সর্গ ] সন্ধিবিকল্প। ৫৯
করিবে’ এই সর্ভে যে সন্ধি হয় তাহাকেও প্রতীকার-সন্ধি কহে। ইহার দৃষ্টান্ত
রাম ও সুগ্রীব ॥১১॥ একই প্রয়োজন উদ্দেশ্য করিয়া দুই রাজা মিলিত-
ভাবে অভিযান করিবার জন্য যে সন্ধি করেন তাহার নাম সংযোগ-সন্ধি ॥১২॥
‘আমাদের উভয়ের সেনাপতি মিলিয়া আমার এই কার্য্যটি সম্পন্ন করিবে’,
এই সর্ত্তে যে সন্ধি হয় তাহাকে পুরুষান্তর-সন্ধি কহে ॥১৩॥ ‘আমার এই
প্রয়োজনট তুমি একাই সম্যকরূপে সাধিত করিবে’ এই সর্ত্তে শত্রুর সহিত
যে সন্ধি তাহাকে অদৃষ্টনর-সন্ধি কহে ॥১৪॥ যেখানে রাজ্যের কিয়দংশ দিয়া
বলবন্ রিপুর সহিত সন্ধি করা হয়, সন্ধিবিৎ পণ্ডিতগণ এই সন্ধিকে আদিষ্ট-
সন্ধি কহে ॥১৫॥ নিজের সৈন্যের সহিত আপনাকে তর্পণ করিয়া যে সন্ধি করা
হয় তাহাকে আত্মামিষ-সন্ধি কহে অর্থাৎ এই সন্ধিতে আপনাকে তামিষ
রূপে দেওয়া হয়। নিজের প্রাণ রক্ষার জন্য সমস্ত রাজ্য প্রদান করিয়া
যে সন্ধি করা হয় তাহার নাম উপগ্রহ-সন্ধি। ফলতঃ এখানে শত্রু উপগ্রহ
স্বরূপে বর্তমান বলিয়া ইহার নাম উপগ্রহ ॥১৬॥ অবশিষ্ট-প্রজারক্ষার জন্য
ধনাগারের অংশ অথবা কুপ্য (স্বর্ণ রৌপ্য ব্যতিরিক্ত বস্ত্র কম্বল প্রভৃতি ধন)
কিংবা সমস্ত ধনাগার দিয়া যে সন্ধি করা হয় তাহাকে পরিক্রয়-সন্ধি
কহে ॥১৭॥ সারবান্ ভূমি দিয়া যে সন্ধি করা হয় তাহার নাম উচ্ছিন্ন-সন্ধি।
সমস্ত ভূমি হইতে সমুৎপন্ন ফল (শস্য) দান করিয়া যে সন্ধি করা হয়
তাহাকে পরিভূষণ বা পরদূষণ সন্ধি কহে ॥১৮॥ যেখানে লাভের অংশ
ভাগাভাগি করিয়া লওয়া হইবে এই সর্ত্তে সন্ধি হয়, সন্ধিবেত্তারা তাহাকে
স্কন্ধোপনেয়-সন্ধি কহে। [পুরুষান্তর-সন্ধি হইতে স্কন্ধোপনেয়-সন্ধি পর্য্যন্ত নয়টি
সন্ধি অভিযোক্তার প্রতি জানিতে হইবে; আর উপন্যাস, প্রতীকার ও সংযোগ
অনভিযোক্তার প্রতি বুঝিতে হইবে। বাকি কপাল, উপহার, সন্তান ও সঙ্গত
এই চারিটি অভিযোক্তার প্রতি যোজনীয়] ॥১৯॥
পরস্পরের উপকার, মৈত্র, সম্বন্ধ (বৈবাহিক সম্বন্ধ) এবং উপহার
কেবল এই চারি প্রকার সন্ধিই অপর পণ্ডিতেরা স্বীকার করেন ॥২০॥

৬০ কামন্দকীয় নীতিসার।
একমাত্র উপহার-সন্ধিই সন্ধি, ইহা আমাদিগের মত। মৈত্র-সন্ধি ভিন্ন অন্য
যত প্রকার সন্ধি আছে, সবই উপহার-সন্ধির ভেদমাত্র ॥২১॥ যখন
বলবান্ অভিযোক্তা (আক্রমণকারী) কিছু না লইয়া নিবৃত্ত হয় না তখন
উপহার ব্যতীত আর অন্য প্রকার সন্ধিই নাই ॥২২॥
বালক, বৃদ্ধ, দীর্ঘরোগী, জ্ঞাতি-বহিষ্কৃত, ভীরু, ভীরুক-জন (ভীরু
প্রকৃতিবর্গ), লোভী, লুব্ধজন (লোভী প্রকৃতিবর্গ), বিরক্ত-প্রকৃতি (যাহার
প্রকৃতিবর্গ বিরক্ত), অত্যন্ত বিষয়াসক্ত, অনেক চিত্তমন্ত্র (যাহার মন্ত্রগুপ্তি
নাই), দেব-ব্রাহ্মণের নিন্দাকারী, দৈবোপহতক (যাহার দৈব প্রতিকূল),
দৈবচিন্তক (যিনি ভাগ্যের উপর নির্ভর করিয়া কোন চেষ্টা করেন না),
দুর্ভিক্ষ-রূপ বিপদগ্রস্ত, বল-ব্যসন-সঙ্কুল (যাহার সৈন্যেরা ব্যসনী), অদেশস্থ
(যিনি নিজের রাজ্যে থাকেন না—অথবা অপ্রশস্ত স্থানে স্থিত), বহুশত্রুযুক্ত,
যিনি কাল যুক্ত নন্ অর্থাৎ যিনি সময় বুঝিয়া চলিতে জানেন না, সত্যরূপ ধৰ্ম্ম-
ভ্রষ্ট—এই বিংশতি প্রকার ব্যক্তির সহিত সন্ধি না করিয়া ইহাদিগের
সহিত কেবল বিগ্রহই করিবে; কারণ ইহাদের সহিত যুদ্ধ করিলে ইহারা শীঘ্রই
শত্রুর বশবর্ত্তী হয় ॥২৩-২৭॥
বালক নিজের প্রভাব শূন্য, কেবল অন্যের প্রভাবে প্রভাবান্বিত, অতএব
লোকে তাহার হইয়া যুদ্ধ করিতে চাহে না; স্বয়ং যুদ্ধ করিতে না পারিলে
পরের জন্য কে যুদ্ধ করিবে? ॥২৮॥ বৃদ্ধব্যক্তি ও দীর্ঘরোগী-ব্যক্তি ইহাদের
উৎসাহ শক্তি নাই সুতরাং ইহারা নিশ্চয়ই স্বয়ং অথবা আত্মীয় দ্বারা
পরাভূত হইয়া থাকে ॥২৯॥ সকল জ্ঞাতি কর্তৃক বহিষ্কৃত ব্যক্তি অনায়াসেই
উচ্ছেদ্য হয়, কারণ শত্রু কর্তৃক অর্থ দ্বারা বশীভূত জ্ঞাতিরাই ইহার বিনাশ-
সাধন করিয়া থাকে ॥৩০॥ ভীরু-ব্যক্তি যুদ্ধ-পরাঙ্মুখ হয় বলিয়া শীঘ্রই
বিনাশ প্রাপ্ত হয়। স্বয়ং বীর হইলেও সৈন্যগণ ভীরু হইলে, ঐ সৈন্যগণ
যুদ্ধক্ষেত্রে উহাকে ত্যাগ করে ॥৩১॥ লুব্ধ-নরপতি ভাগের সময় অবিচার
করেন বলিয়া তাঁহার অনুজীবীগণ তাঁহার পক্ষে যুদ্ধ করে না। অনুজীবীগণ

১ম সর্গ ] সন্ধি বিকল্প । ৬১
লোভী হইলে শত্রুর দানে বশীভূত হইয়া ঐ লোভী অনুজীবীগণই প্রভুকে
বিনষ্ট করে ॥৩২॥ বিরক্ত-প্রকৃতি-রাজার প্রকৃতিবর্গ যুদ্ধকালে রাজাকে
ত্যাগ করে। অত্যন্ত বিষয়াসক্ত-রাজা অনায়াসেই উচ্ছেদনীয় হয় ॥৩৩॥
যাহার মন্ত্র অনেকে জানিতে পারে এমন অনেক ভিন্নমন্ত্র-রাজা মন্ত্রীদিগের
বিদ্বেষ-ভাজন হয়; রাজার অব্যবস্থিত চিত্ততা হেতু মন্ত্রীরা কার্য্যে উপেক্ষা
করে ॥৩৪॥ ধর্ম্ম বলবান্ বলিয়া দেবব্রাহ্মণনিন্দক ব্যক্তি স্বয়ই অবসন্ন
হইয়া পড়ে। যাহার দৈবপ্রতিকূল (অর্থাৎ অনুষ্ঠিত দৈবকার্য্যের শুভ ফল
যে পায় না) এইরূপ দৈবোপহতক রাজাও অবসন্ন হইয়া পড়েন ॥৩৫॥
সম্পদ ও বিপদের কারণ একমাত্র দৈব, ইহাই ভাবিয়া যিনি স্বয়ং চেষ্টা (অর্থাৎ
পুরুষকার প্রকাশ) করেন না, এইরূপ দৈবপর ব্যক্তি স্বয়ংই অবসন্ন হয় ॥৩৬॥
দুর্ভিক্ষব্যসনগ্রস্ত অর্থাৎ দুর্ভিক্ষপীড়িত ব্যক্তি স্বয়ংই অবসন্ন হয়। যাহার
সৈন্যগণ ব্যসনী তাহার যুদ্ধ করিবার শক্তি নাই ॥৩৭॥ অদেশস্থ রাজাকে
ক্ষুদ্র শত্রুও বধ করিতে পারে, যেমন ক্ষুদ্র কুম্ভীর জলে গজেন্দ্রকেও
আকর্ষণ করিতে পারে। (জলশূন্য স্থানে অবস্থিত কুম্ভীরকে কুকুরও
পরাভূত করে) * ॥৩৮॥ যাহার অনেক শত্রু তিনি অত্যন্তভীত, শ্যেনপক্ষীর
মধ্যে পায়রার ন্যায় তিনি যে পথে যান সেই পথেই বিনষ্ট হন ॥৩৯॥ যেমন
নিশীথ সময়ে হতজ্যোতি অর্থাৎ দৃষ্টিহীন বায়সকে পেচক মারিয়া ফেলে
সেইরূপ যিনি অসময়ে সৈন্যের অভিযান করেন তিনি যথাকালে সৈন্য-
চালনাকারী ব্যক্তি কর্তৃক নিহত হন ॥৪০॥ সত্যরূপ-ধৰ্ম্মভ্রষ্ট ব্যক্তির সহিত
কোনরূপেই সন্ধি করিবে না, কারণ তাহার সহিত সন্ধি করিলে সে স্বয়ং
অসাধু অর্থাৎ মিথ্যা আচরণকারী বলিয়া অচিরাৎ ঐ সন্ধি ভঙ্গ করে ॥৪১॥
সত্য, আর্য্য, ধাৰ্ম্মিক, অনার্য্য, বহুভ্রাতৃক, ধনী ও অনেক-বিজয়ী—এই
সাতজনের সহিত সন্ধি করা যাইতে পারে ॥৪২॥ সত্য অর্থাৎ সত্যপালন-
কারী ব্যক্তির সহিত সন্ধি হইলে সে ব্যক্তি সত্যই পালন করে কখনও বিকৃত

  • ভাষান্তর সংস্করণে এই অংশটুকু অতিরিক্ত আছে।

৬২ কামন্দকীয় নীতিসার।
হয় না। আর্য্য-ব্যক্তি স্পষ্ট ভাবে প্রাণ-সঙ্কট উপস্থিত হইলেও অনাৰ্য্যভাব
প্রাপ্ত হয় না ॥৪৩॥ ধাৰ্ম্মিক-রাজাকে [ শত্রুরা ] আক্রমণ করিলে তাঁহার
হইয়া সকলেই (অর্থাৎ শত্রু মিত্র ও উদাসীন) যুদ্ধ করে ; প্রজাগণের অনুরাগ
এবং ধর্ম্ম হেতু ধাৰ্ম্মিক রাজাকে উচ্ছেদ করা দুঃসাধ্য অর্থাৎ ধাৰ্ম্মিকের
উচ্ছেদ হয় না ॥৪৪॥ অনাৰ্য্যের (অর্থাৎ অযুক্তকার্য্যকারীর ) সহিত
সন্ধি করিবে ; অনাৰ্য্য প্রায়ই রেণুকা-পুত্র পরশুরামের ন্যায় শত্রুকে ত নষ্ট
করেই এমন কি তাহার মূল অর্থাৎ শত্রুর ঝাড়বংশও বিনষ্ট করে ॥৪৫॥
যেরূপ ঝাড়বাঁধা নিবিড় কাঁটাযুক্তবাঁশ কাটা যায় না, সেইরূপ ভ্রাতৃসংঘাতবান্
(বহু ভ্রাতায় মিলিত ) রাজার উচ্ছেদ করা যায় না ॥৪৬॥ সিংহ কর্তৃক
আক্রান্ত হরিণের ন্যায় বলবান্ বিপক্ষ আক্রমণ করিলে দুর্ব্বল আক্রান্ত-
ব্যক্তি নিজের রক্ষার জন্য সর্ব্বপ্রকার যত্ন করিলেও তাহাকে কেহই রক্ষা
করিতে পারে না ॥৪৭॥ সামান্য চেষ্টাতেই সিংহ [ যেমন ] মত্ত হস্তীকে
বধ করে, সেইরূপ বলবান্ অল্প আয়াসেই দুর্ব্বলকে নিহত করে; অতএব
নিজের মঙ্গলের জন্য বলবানের সহিত সন্ধি করিবে ॥৪৮॥ বলবানের সহিত
যুদ্ধ করিবার কোন দৃষ্টান্ত পাওয়া যায় না; দেখা যায়, মেঘ কখনও বায়ুর
বিপরীত দিকে যায় না ॥৪৯॥ নদী যেমন প্রতিকূলে অর্থাৎ নীচপথ ব্যতীত
উঁচুদিকে যায় না, সেইরূপ প্রবল বিপক্ষের নিকট প্রণত হইবে এবং সুযোগ
পাইলে বিক্রম প্রকাশ করিবে তাহা হইলে সম্পত্তি কদাচ বিনষ্ট হয় না ॥৫০॥
জমদগ্নি-পুত্র পরশুরামের ন্যায় অনেক-যুদ্ধ-বিজয়ী ব্যক্তির প্রতাপে সকল প্রকার
—বলবান্, সমবল ও দুর্ব্বল—শত্রু সৰ্ব্বত্র ( দুর্গ তদুর্গ সৰ্ব্বত্রই ) সৰ্ব্বদা
( সময়ে ও অসময়ে ) পরাভূত হয় অর্থাৎ বিনা যুদ্ধেই বশ্যতা স্বীকার করে
॥৫১॥ অনেক-যুদ্ধ-বিজয়ী-ব্যক্তি যাহার সহিত সন্ধি করে সেই সন্ধিত-ব্যক্তির
প্রতাপে শত্রুগণ শীঘ্র বশীভূত হইয়া পড়ে ॥৫২॥ বুদ্ধিমান্ ব্যক্তি সন্ধি
করা সত্তেও [ শত্রুকে ] কখনও বিশ্বাস করিবে না। ইহার দৃষ্টান্ত এই যে,
পুরাকালে ইন্দ্র সন্ধি করিয়াও সন্ধিনাশী বৃত্রাসুরকে বধ করিয়াছিলেন ॥৫৩॥

৯‍ম সর্গ ] সন্ধি বিকল্প । ৬৩
রাজ্যের আস্বাদ পাইলে পিতা এবং পুত্র উভয়েই বিকার প্রাপ্ত হয়, অতএব
সাধারণ লোকচরিত্র হইতে রাজচরিত্র স্বতন্ত্র বলিয়া বলা হয় ॥৫৪॥
বলবান্ বিপক্ষ কর্তৃক আক্রান্ত হইয়া যত্ন সহকারে দুর্গ আশ্রয় করিয়া
আপনার মুক্তির জন্য শত্রু অপেক্ষায় বলবান্ নরপতিকে আহ্বান করিবে
অর্থাৎ অবরোধ মোচনের জন্য অন্য বলবান্ রাজার সাহায্য গ্রহণ
করিবে ॥৫৫॥ ভরদ্বাজ বলেন যে সিংহ যেমন হস্তীর সহিত লড়াই করে
সেইরূপ আপনার শক্তি ও উৎসাহ পর্যালোচনা করিয়া বলবানের সহিত
যুদ্ধ করিবে ॥৫৬॥ সিংহ একাই হাজার হাতীর দল-কে বিদলিত করে,
অতএব আপনাকে সিংহের ন্যায় প্রবল পরাক্রান্ত বুঝিতে পারিলে শত্রুকে
আক্রমণ করিবে ॥৫৭॥ যে রাজা সৈন্যের সহিত বল প্রকাশ করিয়া বিক্রম
সহকারে বলবান্ বড় রাজাকে নিহত করে, তাহার প্রতাপের উৎকর্ষ দেখিয়া
সকল স্থানেই অন্য রাজারা তাহার শত্রু হইয়া যায় অর্থাৎ দুর্ব্বলকে প্রবল
হইতে দেখিলে সকলেই ঈর্ষান্বিত হয় ॥৫৮॥ বল-বিক্রম-প্রকাশ করিয়া
স্বল্পসৈন্য-রাজা প্রবল রাজাকে নিহত করিলে তাহার প্রতাপ প্রকাশ পায়,
তখন শত্রুগণ সকল স্থানেই তাহার বশবর্ত্তী হয় ॥৫৮ ক ॥ * বৃহস্পতি
বলেন যে, যুদ্ধে জয়লাভের সন্দেহ; অতএব তুল্যবল ব্যক্তির সহিতও
সন্ধি করিবে; যাহাতে সন্দেহ তাহা করিবে না ॥৫৯॥ বৃদ্ধিকামী নরপতি
যে পর্যন্ত নিজের সম্পূর্ণ মনের মত বৃদ্ধিলাভ করিতে না পারেন, ততদিন
পর্য্যন্ত সমান বলশালী ব্যক্তির সহিতও সন্ধি করিবেন; যেহেতু দুইটি
কাঁচা ঘটে পরস্পর সমান ভাবে আঘাত লাগিলে দুইটাই ভাঙ্গিয়া যায় ॥৬০॥
কখন কখন যুদ্ধে উভয়েরই বিনাশ হয়—সমান বল সুন্দ ও উপসুন্দ উভয়েই
কি যুদ্ধে বিনষ্ট হয় নাই ? ॥৬১॥
হিতালয়ের বারিবিন্দু উচ্চ প্রদেশ হইতে ক্ষত স্থানে পড়িলে অল্পমাত্র

  • টীকাস্তর সংস্করণে ইহা ৫৯ শ্লোক, ইহা আদর্শ পুস্তকের ৫৮ শ্লোক। এখানে
    উভয়ের পাঠের প্রভেদ দেখান হইল। টীকাকারের পাঠ সমীচীন বলিয়া বোধ হয়।

६४ कामन्दकीय नीतिसार।
হইয়াও যেমন দুঃখদায়ক হয়, সেইরূপ বিজিগীয়ুর বিপদকালে যে শত্রুর
সহিত সন্ধি করা আছে এইরূপ দুর্ব্বল শত্রুও বিজিগীয়ুর বিপক্ষে অভিযান
করিয়া, বিজিগীযুর দুঃখের কারণ হয় ॥৬২॥ হীন ব্যক্তির সহিত সন্ধি
করিবে না, তাহার নিঃসন্দেহ কারণ আছে; হীনের সহিত সন্ধি করিলে
হীনের উপর বিশ্বাস জন্মে, তখন ঐ হীন ব্যক্তি বিশ্বাস বুঝিতে পারিয়া
[নিজের লাভে] निःস্পৃহ হইয়া (পাঠান্তরে—নির্দয় হইয়া) বিজিগীযুকে
প্রহার করে অর্থাৎ অনিষ্টাচরণ করে ॥৬৩॥ প্রতাপী-ব্যক্তি [কোন ব্যক্তি
—পাঠান্তর] বলবান্ ব্যক্তির সহিত ছল পূর্ব্বক সন্ধি করিয়া অত্যন্ত যত্ন সহকারে
ঐ বলবান্ ব্যক্তির অন্তরে প্রবেশ করিয়া তাহার বিশ্বাস উৎপাদনের জন্য
উত্তমরূপে তাহার অনুসরণ করিবে ॥৬৪॥ বিশ্বাস জন্মিলে সর্ব্বদা উদ্যোগী
থাকিয়া আকার ইঙ্গিত গোপন করিয়া কেবল প্রিয়বাক্যই বলিবে কিন্তু যাহা
মনোগত কাৰ্য্য তাহা করিবেই করিবে ॥৬৫॥ বিশ্বাসী হইতে পারিলেই
প্রিয় হওয়া যায়; এবং বিশ্বাসী হইতে পারিলেই স্বকাৰ্য্য সাধনও করা যায়।
[দেখা যায়] ইন্দ্র বিশ্বাসী হইয়াছিলেন বলিয়াই দিতির গর্ভ বিনষ্ট করিতে
সমর্থ হইয়াছিলেন ॥৬৬॥
যুবরাজ অথবা প্রধান পুরুষের সহিত সন্ধি করিয়! (ষড়যন্ত্র করিয়া)
অভিযোেগের নিমিত্ত দৃঢ়সঙ্কল্প বিজিগীযুর অন্তঃকরণে কোপ জন্মাইয়া দিবে।
[ফলতঃ ইহাতে বিজিগীযু অভিযোগ বিষয়ে শিথিল-প্রযত্ন হইয়া পড়ে।
অভিযুক্ত ব্যক্তির যখন বিক্রম-শক্তির অভাব হয় এবং অভিযোক্তা তাহার
সহিত সন্ধি করিতে অনিচ্ছুক, তখন অভিযুক্তের আত্মরক্ষার্থে ইহাই প্রকৃষ্ট
উপায়] ॥৬৭॥ [অন্তঃপ্রকোপের উপায় প্রদর্শন।] প্রধান পুরুষকে
[উপলক্ষণে যুবরাজকেও] প্রচুর অর্থ উপহার দ্বারা এবং প্রগাঢ় অর্থ সম্পন্ন
(অর্থাৎ দেশ-রাজ্য-প্রাপ্তির প্রলোভন যুক্ত) বহুতর পত্রদ্বারা তাহার ধন-
বিষয়ে অবিশুদ্ধি প্রকাশ করিবে ॥৬৮॥ বুদ্ধিমান্ ব্যক্তি [উক্তরূপে]
বিজিগীষুর মহামাত্র অর্থাৎ প্রধান অমাত্যকে দূষিত করিয়া ফেলিলে ঐ

১ম সর্গ ] সন্ধি বিকল্প । ৬৫
প্রধান শত্রু নিজের পক্ষকে অবিশ্বাস করে এবং এইরূপে যুদ্ধ-ব্যাপারে
নিশ্চেষ্ট হইয়া পড়ে ৷৷ ৬৯ ৷৷ বিপক্ষের অমাত্যদিগের সহিত সন্ধি করিয়া
তাহার উদ্যোগ প্রশমিত করিবে; অথবা তাহার বৈদ্যকে ভাঙ্গাইয়া উহার
দ্বারা বিষপ্রদান-পূর্ব্বক শত্রু-নিপাত করিবে ৷৷ ৭০ ৷৷ অনন্তর সকল প্রকার
চেষ্টা দ্বারা শত্রুর কোপ জন্মাইবে, কোপের পর শত্রু অনিষ্ট করিবে, ঐ
অনিষ্ট অনুসরণ করিয়া শত্রুর ধর্ষণ করিবে ৷৷ ৭১ ৷৷ সেই রাজার রাজ্যে
বাস করে এমন নিমিত্তজ্ঞের অর্থাৎ জ্যোতিষী বা শকুনজ্ঞের ছলধারী
অথবা সিদ্ধপুরুষের ছলধারী (কৃত্রিম উল্কাপাত রক্তপাত বা বৃষ্টিপাত
করিতে সক্ষম) এইরূপ চর দ্বারা অভিযানে উদ্যত বিপক্ষ-রাজার ভবিষ্যৎ-
বিপদের আশঙ্কা জানাইয়া দিবে অর্থাৎ এই সময়ে যুদ্ধযাত্রা অত্যন্ত
অনিষ্টকর ইহা বুঝাইয়া দিয়া অভিযান নিবারণের চেষ্টা করিবে ৷৷ ৭২ ৷৷
সৈন্যক্ষয়, অর্থব্যয়, নিজের শরীরের ক্লেশ এবং আত্মীয়-বন্ধু-বান্ধবগণের
বিনাশ প্রভৃতি যুদ্ধের দোষ বিবেচনা করিয়া যিনি বিচক্ষণ ব্যক্তিদিগের
কার্যপর্যালোচনা করিয়াছেন তিনি বরং অল্পমাত্র পীড়নও স্বীকার করিবেন
কিন্তু যুদ্ধে ঐ সমুদয় দোষ ঘটে বলিয়া যুদ্ধ করিবেন না। ফলতঃ অল্পক্ষতি
স্বীকার করিলে যেখানে যুদ্ধ হইতে অব্যাহতি পাওয়া যায় সেখানে ঐ ক্ষতি
স্বীকার করিবে ৷৷ ৭৩ ৷৷ স্ত্রী (পাঠান্তরে—সৈন্য), স্বয়ং, সুহৃৎ এবং অর্থ এই
সমস্তই ক্ষণমাত্রেই বৃথা হইয়া যায় অর্থাৎ মরিলেই সব ফুরাইয়া যায়;
এবং ঐ সমুদয়ই মুহুর্মুহু ব্যাকুল হইয়া উঠে অর্থাৎ যুদ্ধকালে কে মরিবে
কে বাঁচিবে ইহা লইয়া সকলেই কাতর হইয়া পড়ে; অতএব বিচক্ষণ ব্যক্তি
অবিরত যুদ্ধ-ব্যাপারে আসক্ত হইবে না ৷৷ ৭৪ ৷৷ এমন পণ্ডিত ব্যক্তি কে
আছে যে যুদ্ধে ব্যাপৃত হইয়া সুহৃৎ, ধন, রাজ্য, নিজকে ও কীর্ত্তিকে সন্দেহ-
দোলায় আরোপিত করে? ৷৷ ৭৫ ৷৷ সম্যকরূপে আক্রান্ত হইয়া সাম, দান,
বা ভেদ নীতি প্রয়োগ করিয়া সন্ধি করিবে কিন্তু যদি সমবলশালী সামন্ত-
রাজা সন্ধিভঙ্গ করিয়া অভিযান করে, তাহা হইলে তাহার সহিত সন্ধি
৫

৬৬ কামন্দকীয় নীতিসার।
করিবার জন্য দূর হইতেই তাহাকে সন্তাপিত করিবে ॥৭৬॥ ধীর ব্যক্তি
শত্রুর আচরণে ] অত্যন্ত সন্তপ্ত হইয়া আপনাকে সর্ব্বতোভাবে সুরক্ষিত
করিয়া অন্যের অভেদ্য সৈন্যের সাহায্যে শত্রুকে সন্তাপিত করিবে, যেহেতু
তপ্তবস্তু তপ্তবস্তুরই সহিত মিলিত হয় অর্থাৎ উভয়ে পীড়িত হইয়া পড়িলেই
সন্ধি হয় ॥৭৭॥ সন্ধি-বিশারদ প্রাচীন মহর্ষিগণ এইরূপে সন্ধির বিষয়
বলিয়াছেন। অতএব এই নিয়মে গুরু এবং লঘু দুই প্রকার বলাবল
পর্যালোচনা করিয়া রাজা বিজয়লাভ করেন ( পাঠান্তরে—বিনয়ী হইতে
পারেন ) ॥৭৮॥ ইতি কামন্দকীয় নীতিসারে সন্ধি-বিকল্প নামক নবম-সর্গ ॥
দশম-সর্গ।
বিগ্রহ-বিকল্প।
পরস্পর অপকার করিলে তাহা হইতে যে অমর্ষ অর্থাৎ ক্রোধ জন্মায়
অথবা হৃদয়ে যে দুঃখ জন্মায় তাহা হইতেই মনুষ্যগণের বিগ্রহ অর্থাৎ যুদ্ধ
ঘটিয়া থাকে ॥১॥ [ রাজা ] নিজের অভ্যুদয়ের আকাঙ্ক্ষায় অথবা শত্রুকর্ত্তৃক-
পীড়িত হইয়া দেশ বুঝিয়া (অর্থাৎ শত্রুর রাজ্যের প্রজাবর্গ তাহাদের নিজের
রাজার প্রতি বিরূপ হইয়াছে এইরূপ অবস্থায় ) এবং কাল বুঝিয়া (অর্থাৎ
অমাত্যাদি বিরূপ হওয়ায় শত্রু যখন আন্তরিক দুর্ব্বল হইয়া পড়িয়াছে )
ও নিজের শক্তি অর্থাৎ সৈন্যবলাদি বুঝিয়া বিগ্রহ আরম্ভ করিবেন ॥২॥
[ শত্রুর পীড়নে যুদ্ধের কারণ দেখাইতেছেন । ] শত্রুকর্ত্তৃক রাজ্য, স্ত্রী, স্থান
( দুর্গ ), দেশ, যান ( পাঠান্তরে—জ্ঞান ), ধন ( পাঠান্তরে—সৈন্য ), গর্ব্ব,
এবং মান এই সমুদয়ের হানি, বৈষয়িক পীড়া, জ্ঞানের অর্থের শক্তির
( মিত্র-শক্তির ) ও ধর্ম্মের ব্যাঘাত, দুর্দ্দৈব, মিত্রের জন্য অপমান, বন্ধুর
বিনাশ, প্রজাবর্গের প্রতি রাজার অনুগ্রহের বিচ্ছেদ, মণ্ডলের দোষোৎপাদন

১০ম সর্গ] বিগ্রহ-বিকল্প। ৬৭
এবং একটি বিষয় লাভের জন্য উভয়ের আকাঙ্ক্ষা—এই সমুদয় বিগ্রহের
উৎপত্তি স্থান ॥২-৫॥
রাজ্য, স্ত্রী, স্থান ও দেশের অপহরণ জনিত যে যুদ্ধ বাধে তাহা দানদ্বারা
( অর্থাৎ কোষ, অশ্বাদি অথবা ভূমি প্রদান দ্বারা ) কিংবা দম দ্বারা (অর্থাৎ
গুপ্তদণ্ডদ্বারা ) প্রশমন হয়, ইহাই যুক্তিজ্ঞ ব্যক্তিগণের অভিমত ॥৬॥ স্বার্থ
এবং ধর্ম্মহানিতে যে যুদ্ধ উপস্থিত হয় তাহা দান অথবা দম দ্বারা প্রশমিত
হইয়া থাকে। বিষয় ধ্বংস হইতে যে যুদ্ধ উপস্থিত হয় তাহা শত্রুর বিষয়ের
ধ্বংস দ্বারা প্রশমিত হয় ॥৭॥ যানের (পাঠান্তরে—জ্ঞানের) অপহরণ
হইতে যে যুদ্ধ হয় তাহা উপেক্ষা দ্বারা, জ্ঞানের ব্যাঘাত অর্থাৎ শিক্ষাহানি
হইতে যে যুদ্ধ হয় তাহা ক্ষমা দ্বারা এবং শক্তির হানিপ্রযুক্ত যে যুদ্ধ হয়
তাহা ঐ শক্তির পরিত্যাগ দ্বারা শান্তি হইয়া থাকে ॥৮॥ অধার্ম্মিক
অনিষ্ট-চিন্তাকারী মিত্রকে লইয়া যুদ্ধ উপস্থিত হইলে উপেক্ষা করিবে;
আর আত্মতুল্য মিত্রকে লইয়া যুদ্ধ উপস্থিত হইলে তাহার জন্য প্রাণ
পর্য্যন্ত বিসর্জ্জন দিবে ॥৯॥ অপমান হইতে যে যুদ্ধ উপস্থিত হয়
সম্মান প্রদান করিয়া তাহার উপশম করিবে। আর অভিমান হইতে যে যুদ্ধ
উপস্থিত হয়, সাম পূর্ব্বক উপায় অর্থাৎ সাম ও দান দ্বারা অথবা নম্রতা স্বীকার
করিয়া তাহার শান্তি-বিধান করিবে ॥১০॥ বন্ধুর বিনাশ হইতে যে বিগ্রহ
জন্মে তাহা ধীরব্যক্তি গুপ্তভাবে সামাদি নীতিপ্রয়োগ দ্বারা অথবা রহস্য-করণ
(অর্থাৎ ঐন্দ্রজালিক মায়া) দ্বারা প্রশমিত করিবে ॥১১॥ উভয়ের এক
বস্তু লাভের জন্য যে বিগ্রহ উপস্থিত হয়, বিচক্ষণ ব্যক্তি তাহার পরিহারের
জন্য ঐ বস্তুর লাভেচ্ছা ত্যাগ করিবে ॥১২॥ শত্রুকর্তৃক ধনের অপচয়
ঘটিলেও যুদ্ধ করা উচিত নয়, কেননা সময় সময় যুদ্ধে লোকের সর্ব্বনাশও
হইয়া থাকে। (প্রসিদ্ধদৃষ্টান্তযুক্তদানাদি দ্বারা) * এবং ভেদ-সাধন দ্বারা
মহাজন জনিত (অর্থাৎ শৌর্য্যবীর্য্যশালী মদোদ্ধত ব্যক্তির সহিত) বিরোধের

  • এই বন্ধনীর অংশ ট্রি ভাক্কুর সংস্করণে ১৪ সংখ্যক শ্লোকে অতিরিক্ত আছে।

প্রশমন করিবে ॥১৩॥ প্রাণিবর্গের রক্ষাই রাজধর্ম্ম। ঐ ধর্ম্মের হস্তারক হইলে
যে বিগ্রহ উপস্থিত হয়, তাহা মিষ্ট বাক্যে প্রশমিত করিবে (পাঠান্তরে—
জিতেন্দ্ৰিয় ব্যক্তি ঐরূপ বিগ্রহের শান্তি-স্থাপন করিবেন অর্থাৎ মধ্যস্থ
হইয়া মীমাংসা করিবেন)। দৈব-হেতুক বিগ্রহের দৈবশান্তি প্রভৃতি উপায়
দ্বারা প্রশমন করিবে; ইহাই সাধুদিগের সম্মত ॥১৪॥ মণ্ডলের ক্ষোভ-জনিত-
বিগ্রহ উপস্থিত হইলে তাহা সামপ্রভৃতি উপায় দ্বারা প্রশান্ত করিবে ॥১৪১/২॥
সাপত্ন্য ( একার্থাভিনিবেশ জন্য ), বাস্তুজ (বাসভূমির হরণ জন্য),
স্ত্রীহরণ জন্য, অজ্ঞাত কারণে উপস্থিত (পাঠান্তরে—বাগ্‌জাত, বাক্য হইতে
উৎপন্ন) এবং অপরাধ হইতে উৎপন্ন—এই পাঁচ প্রকার বৈর অর্থাৎ বিরোধের
স্থান, ইহা শত্রুতার প্রভেদ-বিষয়ে দক্ষ পণ্ডিতগণ স্বীকার করেন॥ ভূমির
অবরোধ, শক্তির ব্যাঘাত, ভূম্যন্তর অর্থাৎ পাশাপাশি ভূমি
থাকা এবং মণ্ডলের ক্ষোভ হইতে শত্রুতা জন্মে; এই চারি প্রকারই
শত্রুতার স্থান, ইহা বাহুদন্তীপুত্র স্বীকার করেন ॥১৫-১৭॥ কুলজ অর্থাৎ
একার্থাভিনিবেশের অন্তর্গত সহজ-বৈর এবং অপরাধজ অর্থাৎ অপরাধ
হইতে উৎপন্ন কৃত্রিম-বৈর, এই দুই প্রকার শত্রুতার স্থান মনুশিষ্যগণ
স্বীকার করেন ॥১৭১/২॥
যে যুদ্ধ অল্প ফলপ্রদ ১, যে যুদ্ধ নিষ্ফল ২, যে যুদ্ধে ফলের সন্দেহ ৩, যে
যুদ্ধে তৎকালে (বর্ত্তমানে) দোষজনক ৪, যে যুদ্ধ উত্তরকালে নিষ্ফল ৫,
যে যুদ্ধ বর্ত্তমানে ও ভবিষ্যতে দোষজনক ৬, যে যুদ্ধ অপরিজ্ঞাত-বীৰ্য্যশালী-
শত্রুর সহিত ৭, যে যুদ্ধ শত্রু কর্তৃক স্তম্ভিত হইয়াছে ৮, যে যুদ্ধ অপরের জন্য
৯, যে যুদ্ধ সাধারণ স্ত্রীর নিমিত্ত ১০, যে যুদ্ধ দীর্ঘকালব্যাপী ১১, যে যুদ্ধ
উৎকৃষ্ট-ব্রাহ্মণগণের সহিত ১২, যে যুদ্ধে শত্রু হঠাৎ দৈববল যুক্ত ১৩, যে যুদ্ধে
শত্রু বলবান্ মিত্রযুক্ত ১৪, যে যুদ্ধ বর্ত্তমানে ফলজনক কিন্তু ভবিষ্যতে ফল
শূন্য ১৫, এবং যে যুদ্ধ ভবিষ্যতে ফলযুক্ত কিন্তু বর্ত্তমানে নিষ্ফল ১৬, এই
ষোড়শ প্রকার যুদ্ধ করিবে না ॥১৮-২২॥

১০ম সর্গ ] বিগ্রহ-বিকল্প । ৮৯
বিচক্ষণ ব্যক্তি তৎকালে ও উত্তরকালে যাহা বিশুদ্ধ তাহাই আরম্ভ
করিবেন এবং যে সকল কার্য্য তৎকালে ও ভবিষ্যতে বিশুদ্ধ অর্থাৎ দোষ-
শূন্য তাহারই চিন্তা করিবেন। এইরূপে উভয়কালে বিশুদ্ধ কার্য্য করিলে
নিন্দনীয় হইতে হয় না ॥২৩॥ বিদ্বান্ ব্যক্তি ইহলোকে ও পরলোকে অবিরুদ্ধ
উত্তম কার্য্য করিবেন। সামান্য অর্থের লোভে, ইহলোক অর্থাৎ এই
জগতের মান সম্ভ্রম হারাইবেন না; পরলোক-বিরুদ্ধ-কার্য্যকারী ব্যক্তিকে দূরে
পরিহার করিবেন। উক্ত প্রমাণগুলি আগম-(শাস্ত্র)সিদ্ধ, অতএব উভয়
লোকে যাহা সাধু কল্যাণকর কার্য্য তাহাই করিবেন ॥২৪-২৫॥
বুদ্ধিমান্ ব্যক্তি যখন নিজ সৈন্য সামন্তকে হৃষ্ট পুষ্ট অর্থাৎ উৎসাহযুক্ত
ও বলবান্ দেখিবে এবং শত্রুর ইহার বিপরীত দেখিবে তখন যুদ্ধ আরম্ভ
করিবে ॥২৬॥ যখন নিজের প্রকৃতি-মণ্ডল স্ফীত অর্থাৎ অতিবলবান্ ও
অনুরক্ত দেখিবে, আর শত্রুকে ইহার বিপরীত ভাবাপন্ন দেখিবে তখন
বিগ্রহ করিবে ॥২৭॥ যখন দৈব অনুকূল বলিয়া স্পষ্টই লক্ষিত হইতেছে অর্থাৎ
যখন অল্পমাত্র পুরস্কার দ্বারা দুঃসাধ্যকার্য্যও অনায়াসে সাধিত হইতেছে এবং
শত্রুর ইহার বিপরীত দেখা যাইতেছে তখন বিগ্রহ করিবে ॥ক॥ যখন মিত্র,
আক্রন্দ ও আসার ইহারা অত্যন্ত অনুগত এবং শত্রুর ইহার বিপরীত তখন
বিগ্রহ করিবে ॥খ॥ *। ভূমি, মিত্র ও হিরণ্য—এই তিনটি বিগ্রহের ফল।
যখন এই তিনটি অবশ্যই পাইবার নিশ্চয় হয় তখন বিগ্রহ করিবে ॥২৮॥
প্রথমতঃ অর্থই শ্রেষ্ঠ, তদপেক্ষায় মিত্র শ্রেষ্ঠ, তদপেক্ষায় ভূমি শ্রেষ্ঠ; এই
সমস্তই ভূমির বিভব; এই সকল ভূমির বিভূতি অপেক্ষায় বন্ধু (প্রিয়ব্যক্তির
বিচ্ছেদ অসহিষ্ণু) এবং সুহৃৎ (সতত অনুমত সঙ্গী) শ্রেষ্ঠ ॥২৯॥ বিপক্ষ যদি
সকলপ্রকার ঐশ্বর্য্যে সমান হয় তাহা হইলে বিচক্ষণ ব্যক্তি সেই শত্রুর প্রতি
সাম প্রভৃতি উপায় প্রয়োগ করিবে। আর যদি নিজের উপায় গুলি শত্রু

  • ট্রাভাঙ্কুর সংস্করণে ক, খ, ইহাদের সংখ্যা ২৯ ১/২, ৩০ ১/২, এই দুইটি শ্লোক কলিকাতা
    সংস্করণে নাই।

৭০ কামন্দকীয় নীতিসার।
প্রতিহত করিতে সমর্থ না হয় তাহা হইলে ঐ সমবল শত্রুর প্রতি দণ্ড
প্রশস্ত ॥৩০॥ বিদ্বান্ ব্যক্তি বিগ্রহ উপস্থিত হইলে সামাদি উপায় দ্বারা
উহা প্রশমিত করিবেন এবং জয়লাভ অনিশ্চিত বলিয়া সবেগে অগ্রসর হইবেন
না ॥৩০॥ প্রবল শত্রু কর্তৃক আক্রান্ত হইয়াও যিনি অবিনাশী সম্পৎ লাভ
করিতে ইচ্ছা করেন, তিনি বৈতসী-বৃত্তি অবলম্বন করিবেন অর্থাৎ বেতকে
যেমন ইচ্ছামত ঘোরান ফেরান ও বাঁকান যায় সেইরূপ প্রবল শত্রুর মতানুবর্ত্তী
হইয়া চলিবেন; কিন্তু ভুজঙ্গের বৃত্তি অনুসরণ করিবেন না অর্থাৎ সাপের ন্যায়
তেড়ে কামড়াইতে যাইবেন না ॥৩২॥ বেতসবৃত্তি অবলম্বনকারী ব্যক্তি ক্রমশঃ
(কালক্রমে) অতুল ঐশ্বর্য্য প্রাপ্ত হয় এবং ভুজঙ্গবৃত্তি অবলম্বনকারী ব্যক্তি
কেবল বধ প্রাপ্ত হয় ॥৩৩॥ (বেতসবৃত্তি অবলম্বনকারী) নীতিজ্ঞ ব্যক্তি
মত্তপ্রমত্তের ন্যায় থাকিয়া সুযোগ উপস্থিত হইলে ঐ অপরিদৃশ্যমান (দুর্নিবার)
শত্রুকে সিংহের ন্যায় লম্ফ দিয়া গ্রাস করিবে ॥৩৪॥ বুদ্ধিমান্ ব্যক্তি
(অকালে) কূর্ম্মের ন্যায় সঙ্কুচিত হইয়া পীড়নও সহ্য করিবে কিন্তু সময় পাইলেই
ক্রূরসর্পের ন্যায় দাঁড়াইবে ॥৩৫॥ কালবিশেষে পর্ব্বতের ন্যায় সহিষ্ণু হইতে হয়
এবং কালবিশেষে অগ্নির ন্যায় অসহিষ্ণু হইতে হয়; আবার কালবিশেষেই
শত্রুকে মিষ্ট কথা বলিয়া স্কন্ধেও বহন করিতে হয় ॥৩৬॥ (পুনরায় সুযোগ
উপস্থিত হইলেই পাষাণে আছাড়িলে ঘট যেমন চূর্ণ হইয়া যায় শত্রুকেও
সেইরূপ বিনষ্ট করিতে হয়। লোক নিয়তই স্বার্থপর। যেরূপে স্বার্থসিদ্ধি
হয় সেইরূপভাবে পূর্ব্বোক্ত নিয়মানুসারে শত্রুর প্রতীকার করিবে।) *
লোক-প্রসিদ্ধ সুব্যবহার দেখাইয়া প্রসন্নতাবৃত্তি অনুসরণপূর্ব্বক
শত্রুর হৃদয়ে সর্ব্বদা প্রবেশ করিয়া (অর্থাৎ শত্রুর প্রতি অসন্দিগ্ধ-
সদাচরণ দেখাইয়া শত্রুর অত্যন্ত বিশ্বাসভাজন হইয়া) নীতি অবলম্বন
পূর্ব্বক থাকিবে এবং কাল উপস্থিত হইলেই বলপূর্ব্বক রাজলক্ষ্মীর

  • এই অংশ টূভান্তুর সংস্করণে ৩৯—৪০ সংখ্যার শ্লোকের মধ্যে অতিরিক্ত এবং
    ব্যাখ্যাকায় ও কলিকাতা সংস্করণে এ দুটি ধরে নাই।