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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६७
रूप-गन्ध-रस-स्पर्श-शब्दाद्या भूतपञ्चकाः ।
चरन्ति यदधिष्ठानात्सोऽद्य कल्कि. परात्मक ।२५।
कल्किजी के वचन सुन कर म्लेच्छ-पत्नियां हँस पडी । उन्होने
कहा—हे विभो ! जब तुम्हारे द्वारा हमारे पति ही नाश को प्राप्त हो
गये, तब हम भी नष्ट हो चुकी । यह कह कर वे नारियाँ कल्किजी की
मारने को तत्पर हुई । उन्होने जो अस्त्र छोडने चाहे, वे अस्त्र उनके
हाथो मे ही रुके रह गये ।२१। खड्ग, शक्ति, धनुष-बाण, शूल, तोमर,
यष्टि आदि शस्त्रास्त्रो के स्वर्ण-सज्जित देवता साक्षात् प्रकट हो कर उन
म्लेच्छ-पत्नियो के प्रति बोले ।२२ देव रूपी अस्त्रो ने कहा—हे नारियो ।
हम जिस तेज के द्वारा जीवो का सहार करते रहते हैं, वह तेज हमे
जिनसे प्राप्त हुआ है, वह सर्वमय ईश्वर यही हैं, यह समझ लो ।२३।
हे स्त्रियो ! हम इन्ही परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त कर गतिशील होते हैं
तथा इनके द्वारा ही हम नाम-रूप को पाकर जाने जाते हैं ।२४। रूप,
गन्ध, रस, स्पर्श तथा शब्दादि पचगुण के आश्रय रूप पञ्चभूत जिनके
अधिष्ठान से अपने-अपने कार्य मे उद्यत रहते है, यह कल्किजी वही
ईश्वर है ।२५।
काल स्वभाव-सस्कार-नामाद्या प्रकृति परा ।
यस्येक्षया सृजत्यण्ड महदहङ्कारकादिकान् ।२६।
य-मायया जगद्यात्रा सर्गस्थित्यन्तसञ्जिता ।
य एवाद्यः स एवान्ते तस्याय सोऽयमीश्वर ।२७।
असौ पतिर्मे भार्याहमस्य पुत्राप्तबान्धवाः ।
स्वप्नोपमास्तु तन्निष्ठा विविधाश्चैन्द्रजालवत् ।२८।
स्नेहमोनिबन्धना यातायात्वशा मतम् ।
न कल्किसेविना रागद्वेषविद्वेषकारिणाम् ।२६।
कुतः कालः कुतो मृत्यु क्व यमः क्वास्तिदेवताः
स एव कल्किर्भगवान्मायया बहुलीकृत. ।३०।