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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

५८ ☫ श्रीकालिका पुराण ☫
रीति से सम्भाषण किया था। इसके अनन्तर उन सब लोकों के ईश से
वहाँ पर आगमन का कारण दक्ष ने पूछा था। हे विप्रेन्द्रों! वह दक्ष
चिन्ता से आविष्ट भी था किन्तु हर्षित हो रहा था। दक्ष ने कहा-हे
जगतों के गुरुवर! यहाँ पर आपके आगमन का कारण बतलाइए ?
आप पुत्र के स्नेह से अथवा किसी कार्य के वश में इस आश्रम में
समागत हुए हैं। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से महात्मा दक्ष के
द्वारा पूछे गये सुरश्रेष्ठ (ब्रह्माजी) ने उस प्रजापति दक्ष को आनन्दित
करते हुए हँसकर यह वाक्य कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा-हे दक्ष! सुनिए, मैं तुम्हारे जिस कार्य के लिए
यहाँ पर समागत हुआ हूँ वह कार्य लोकों का हितकर है तथा पथ्य है
और आपका भी अभीप्सित है। तेरी पुत्री ने जगत् के पति महादेव की
समाराधना करके जो वर प्राप्त करने की उनसे प्रार्थना की थी वह आज
स्वयं ही गृह में समागत हुए है। शम्भु ने आपकी पुत्री के लिए आपके
समीप में मुझे पुनः प्रस्थापित किया है जो कृत्य परम श्रेय है उसका
अवधारण करिए। जिस समय वरदान देने को वे आए थे तभी से
लेकर आपकी पुत्री के वियोग से शीघ्र ही कल्याण की प्राप्ति नहीं कर
रहे हैं, कामदेव ने भी उस समय अत्यधिक बेधन किया था उसे जगत्
के प्रभु का बेधन सभी पुष्कर बाणों से एक ही साथ किया था। वह
कामदेव के द्वारा बाणों से बिद्ध होकर आत्मा का परिचिन्तन त्याग कर
जैसे कोई सामान्य जन हो उसी भाँति अतीव व्याकुल वाणी को
भुलाकर विप्रयोग से गणों के आगे अन्य कृति में भी 'सती कहाँ है'
यह बोला करते हैं।
मैंने जो पूर्व में चाहा था और आपने तथा कामदेव ने इच्छा की थी
एवं मरीचि आदि मुनिवरों ने जिसकी इच्छा की थी। हे पुत्र! वह कार्य
अब सिद्ध हो गया है। आपकी पुत्री के द्वारा शम्भु की आराधना की
गई थी और वे भी उस तुम्हारी पुत्री विचिन्तन से हिमवद्गिरि में
अनुमोदन करने के लिए इच्छुक हैं। जिस प्रकार से अनेक प्रकार के
भावों के द्वारा सती ने नन्दा के व्रत से शम्भु की आराधना की थी ठीक

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ५९
उसी भाँति उनके द्वारा सती की आराधना की जा रही है। इसलिए हे
दक्ष! शम्भु के लिए परिकल्पित अपनी पुत्री सती को बिना विलम्ब
किए हुए उनको दे दो उसी से आपकी कृतकृत्यता अर्थात् सफलता है।
मैं उनको नारद द्वारा आपके आलय में ले आऊँगा। उसके लिए आप
भी इस सती को जो कि उन्हीं के लिए परिकल्पित है उन्हें दे दो।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-दक्ष ने 'ऐसा ही होगा', यह दक्ष ने ब्रह्माजी
से कहा था और ब्रह्माजी भी वहाँ से उसी स्थान पर चले गए थे जहाँ
पर भगवान् शम्भु विराजमान थे। ब्रह्माजी के चले जाने पर दक्ष
प्रजापति भी अपनी दारा और तनया के साथ आनन्दयुक्त हो गया था
और पीयूष से परिपूरित की ही भाँति पूर्ण देह वाला हो गया था।
इसके अनन्तर कमलासन ब्रह्माजी भी मोद से प्रसन्न होकर महादेवजी
के समीप प्राप्त हो गये थे जो कि हिमालय पर्वत पर संस्थित थे।
वृषभध्वज ने उन आते हुए लोकों के स्रष्टा को देखकर वे सती की
प्राप्ति में बारम्बार मन में संशय कर रहे थे। इसके अनन्तर दूर ही ही
से साम से समन्वित ब्रह्माजी को महादेवजी ने जो कामवासना को भस्म
में धारण किए थे और कामदेव के द्वारा उन्मादित हो गये थे, कहा था।
ईश्वर ने कहा-हे ब्रह्माजी ! आपके पुत्र (दक्ष) ने सती के अर्थ में स्वयं
क्या कहा था ? आप मुझे बतलाइए जिससे कामदेव के द्वारा मेरा हृदय
विदीर्ण न किया जावे। बाधमान विप्रयोग सती के बिना मुझको हनन
कर रहा है। हे सुरश्रेष्ठ! यह कामदेव अन्य सब प्राणियों का त्याग कर
मेरे ही पीछे पड़ा हुआ है। हे ब्रह्माजी! वह सती जिस तरह से भी मुझे
प्राप्त हो जावे वही आप शीघ्र ही करिए। ब्रह्माजी ने कहा-हे
वृषभध्वज! सती के अर्थ में जो मेरे पुत्र (दक्ष) ने कह दिया था उसको
आप सुनिए और अपना साध्य सिद्ध हो गया, यही अवधारित कर
लीजिए।
उसने कहा था कि मुझे मेरी पुत्री उन्हीं के लिए देने के योग्य है
और उनके लिए ही वह परिकल्पिता है। यह कर्म तो मुझे भी अभीष्ट
था ही किन्तु अब आपके वाक्य से पुनः अधिक अभीप्सित हो गया है।

६० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
मेरी पुत्री के द्वारा शिव समाराधित किए गए हैं और इसी के लिए उसने
स्वयं ही ऐसा किया है और वे शिव भी उनकी इच्छा करते हैं अर्थात्
सती को भार्या के रूप में पाना चाहते हैं। इसी कारण से मुझे इसको
हर के ही लिए देना चाहिए। अर्थात् मैं उन्हीं को दूँगा। वे शिव किसी
शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न में मेरे समीप में आ जावें। हे ब्रह्माजी, उसी
समय में मैं भिक्षार्थ में शम्भु के लिए अपनी पुत्री सती को दे दूँगा।
हे वृषभध्वज ! दक्ष ने यही प्रसन्नता के साथ कहा था। इसलिए
आप किसी परम शुभ मुहूर्त में उस सती की अनुयाचना करने के लिए
उन (दक्ष) के समीप में गमन कीजिए। ईश्वर ने कहा-मैं आपके साथ
तथा महात्मा नारद जी के साथ ही यहाँ से गमन करूँगा। हे जगतों के
द्वारा पूज्य! इस कारण से आप शीघ्रताशीघ्र ही नारद जी का स्मरण
करिए। मरीचि आदि दस मानस पुत्रों को भी स्मरण करिए उन सबके
ही साथ मैं अपने गणों सहित दक्ष के निवास स्थान पर जाऊँगा। इसके
अनन्तर कमलासन प्रभु के द्वारा वे सब स्मरण किए गए थे जो मन के
समान वेग वाले ब्रह्माजी के पुत्र नारद के ही सहित थे।
तीनों देवों का एकत्व प्रतिपादन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-फिर वहाँ पर देवर्षि नारद जी के सहित
सभी मानस पुत्र समागत हो गये थे। ये सब ब्रह्माजी के द्वारा किए हुए
केवल स्मरण से ही बात के द्वारा विशेष प्रेरित जैसे होवें वैसे ही सब
वहाँ उपस्थित हो गए थे। उनके साथ और ब्रह्माजी के साथ में अपने
गणों के साथ में लेकर भगवान् शम्भु मोह से संगत होते हुए दक्ष के
निवास मन्दिर में गये थे। इसके अनन्तर उनके कर्म के योगी काल के
आने पर गणों ने शंख, पट्टह, डिण्डिम, सूर्यवंशी को वादित किया
था और आनन्द से युक्त हुए वे सब शंकर का अनुगमन करते हैं। कुछ
ताल बजा रहे थे और कोई करतलों के द्वारा अघ्रितल की ध्वनि कर
रहे थे। वे सब अपने अति वेग वाले विमानों के द्वारा वृषभध्वज का
अनुगमन करते हैं। अनेक तरह की आकृतियों वाले गण भारी

൵ श्रीकालिका पुराण ൵ ६१
कोलाहल करते हुए तथा बुरी तरह की ध्वनि को करने वाले शब्दों के
योग से ही वहाँ से अर्थात् शिव के आश्रम से निर्गत हुए थे। इसके
उपरान्त आनन्द से युक्त देव, गन्धर्व और अप्सराओं के गण वाद्यों के
द्वारा मोह को करते हुए तथा नृत्यों से समन्वित हुए वृषभध्वज का
अनुगमन कर रहे थे। हे विपेन्द्रों ! गन्धर्वों तथा गणों के उस शब्द से
सब दिशायें तथा समस्त वसुन्धरा परिपूरति हो गए थे अर्थात् वह ध्वनि
सर्वत्र फैलकर भर गई थी।
कामदेव भी अपने गणों के सहित शृंगार रस आदि के साथ काम
को मोहित करता हुआ अनुगत हुआ था। भार्या के लिए भगवान् हर
के गमन करने पर उस समय में समस्त सुर ब्रह्मा आदि स्वयं ही मनोहर
शब्द कर रहे थे। हे द्विजश्रेष्ठों! सभी दिशायें सुप्रसन्न हुई थीं। परम
शान्त अग्नयाँ प्रज्वलित हो गयी थीं और आकाश से पुष्पों से समन्वित
हो गए थे। जो कोई अस्वस्थ भी थे वे भी सभी प्राणी स्वस्थ हो गये
थे। हंस और सारसों के समुदाय नील कम्बु और चकोर ईश्वर की
प्रेरणा करते हुए के ही समान परम मधुर शब्दों को कर रहे थे।
शिवजी को भुजंग (सर्प), बाघम्बर, जटाजूट, चन्द्रकला भूषणता को
प्राप्त हुए थे वह इन भूषणों से भी अधिक दीप्त हो रहे थे। इसके
अनन्तर एक क्षण में बलवान् और वेग वाले बलीवर्द (बैल) के द्वारा
ब्रह्मा और नारद आदि के सहित शिव दक्ष के निवास स्थान पर पहुँच
गए थे।
इसके उपरान्त महान तेजस्वी प्रजापति दक्ष ने स्वयं शिव का
स्वागत करके ब्रह्मा आदिक के लिए उनके लिए जैसे भी उचित थे,
आसन दिए थे। उसी भाँति अर्घ्य, पाद्य आदि से उन सबकी समुचित
पूजा करके जैसी भी योग्य थी फिर दक्ष मानस मुनियों के साथ संविद
किया था। हे द्विज सत्तमोँ! इसके उपरान्त शुभमुहूर्त्त और लग्न में
प्रजापति दक्ष ने बड़े ही हर्ष से अपनी पुत्री सती को शम्भु भगवान् के
लिए प्रदान किया था। शम्भु ने भी सभी विधि से हर्षित होकर सती
का परिग्रहण किया था। वृषभध्वज ने परम श्रेष्ठ तनु वाली दाक्षायणी

६२ 𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍
से उस समय में पाणि का ग्रहण किया। ब्रह्मा और नारद आदि मुनियों
ने सामवेद की गीतियों से ऋचाओं से तथा सुश्राव्य यजुर्वेद के मन्त्रों से
ईश्वर को तोषित किया था। सब गणों ने वाद्यों का वादन किया था
और अप्सराओं के गणों ने नृत्य किया था। आकाश में संगत मेघ ने
पुष्पों की वृष्टि की थी। इसके अनन्तर भगवान् गरुड़ध्वज कमला
(लक्ष्मी) के साथ में अत्यन्त वेग वाले गरुड़ द्वारा भगवान् शम्भु के
समीप उपस्थित होकर यह वचन बोले थे।
श्री भगवान् ने कहा-हे हर! जिस प्रकार से लक्ष्मी के साथ से मैं
शोभायमान होता हूँ ठीक उसी भाँति स्निग्ध नीलअंजन के समान श्वास
शोभा से समन्वित दाक्षायणी के साथ आप शोभा को प्राप्त हो रहे हैं।
आप इसी सती के साथ में विराजमान होकर देवों की अथवा मानवों
की रक्षा करो। इस सती के साथ संसार वालों का सदा मंगल करो।
हे शंकर! यथायोग्य दस्युओं का हनन करेगा। अभिलाषा के सहित जो
भी इसको देखकर अथवा श्रवण करेगा। हे भूतेश! उसका हनन करोगे
इसमें कुछ भी विचारणा नहीं है अर्थात् इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजो! प्रीति से प्रसन्न मुख वाले सर्वज्ञ प्रभु
ने प्रसन्न मन वाले परमेश्वर से 'ऐसा ही होवे' यह कहा था। इसके
अनन्तर उस समय से ब्रह्माजी ने चारु (सुन्दर) हास वाली दक्ष की
पुत्री सती का दर्शन करके कामदेव से आविष्ट मन वाले होते हुए
उसके मुख को देखने लगे थे। उस समय ब्रह्माजी ने बारम्बार सती के
मुख का अवलोकन किया था और फिर अवश होते हुए उस समय में
इन्द्रियों के विकार को प्राप्त हुए थे।
हे द्विजोत्तमों! इसके अनन्तर उनका तेज शीघ्र ही भूमि पर गिर
गया था जो कि मुनि के आगे उस समय में वह जल दहन की आभा
वाला था। हे द्विजसत्तमों! इसके उपरान्तं उससे मेघ शब्द से संयुत हो
गए थे। अब उन सुसज्जित मेघों के नाम बतलाए जाते हैं-सम्वर्त्त,
अवर्त्त, पुष्कर और द्रोण। वे गर्जना करते हुए और जलों को मोचित
करने वाले थे। उन मेघों के द्वारा आकाश के संच्छादित हो जाने पर

௰ श्रीकालिका पुराण ௰ ६३
अर्थात् सर्वआकाश मेघों के द्वारा घिरा हुआ हो जाने पर भगवान् शंकर
कामवासना से मोहित होते हुए दाक्षायणी देवी को अतीव देखते हुए
कामदेव के द्वारा मोहित हुए । इसके उपरान्त उस समय में भगवान्
विष्णु के वचन का स्मरण करते हुए शंकर ने शूल को उठाकर ब्रह्माजी
का हनन करने की इच्छा की थी। हे द्विजोत्तमोँ! शम्भु के द्वारा ब्रह्माजी
को मारने के लिए त्रिशूल के उद्यमित करने पर अर्थात् उठाये जाने पर
मरीचि और नारद आदि सब उस समय में हाहाकार करने लगे थे ।
प्रजापति दक्ष ऐसा मत करो, ऐसा मत करो, कह कहते हुए शंकित होते
हाथ को उठाकर शीघ्र ही आगे समागत होकर भूतेश्वर प्रभु को
निवारित किया था। इसके उपरान्त उस समय में महेश्वर ने दक्ष को
मलिन देखकर भगवान् विष्णु की वाणी को स्मरण कराते हुए यह प्रिय
वचन बोला था।
ईश्वर ने कहा-हे विपेन्द्र! नारायण ने जो इस समय में कहा था,
हे प्रजापते! वह यहाँ पर ही मैंने भी अंगीकार किया था। जो भी इस
सती को कामवासना की अभिलाषा से युक्त होते हुए देखता है उसको
आप मार डालेंगे। मैं इस वचन को इसका हनन करे सफल करता हूँ।
ब्रह्माजी ने अभिलाषा अर्थात् कामवासना की इच्छा से समन्वित होकर
क्यों सती का अवलोकन किया था। वह तेज के त्याग करने वाले हो
गये थे इसी से उसका हनन मैं करता हूँ क्योंकि वे अपराध ( पाप )
करने वाले हैं। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस रीति से बोलने वाले उनके
आगे स्थित होकर भगवान् विष्णु ने बड़ी शीघ्रता की थी। समस्त जगत
के प्रभु ने उनको मारने का निवारण करते हुए यह वचन कहा था। श्री
भगवान् ने कहा-हे भूतेश्वर ! जगतों के सृजन करने वाले और परमश्रेष्ठ
ब्रह्माजी का हनन नहीं करोगे क्योंकि इन्होंने ही आपको भार्या के लिए
सती को परिकल्पित किया था। हे शम्भो ! यह चतुर्मुख ( ब्रह्माजी )
प्रजाओं के सृजन करने के लिए प्रादुर्भूत हुए थे। इनके मारे जाने पर
जगत का सृजन करने वाला अन्य कोई अब प्राकृत नहीं है। फिर हम
किस तरह से सृजन, पालन और संहार के कर्मों को करेंगे क्योंकि

६४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
इनके द्वारा वह मेरे आपके द्वारा ही सामञ्जस्य से ये कर्म हुआ करते
हैं। एक के निहित हो जाने पर इनमें कौन हैं जो उस कर्म को करेगा।
हे वृषभध्वज! इस कारण से आपके द्वारा विधाता वध करने के योग्य
नहीं है।
ईश्वर ने कहा-मैं इन चतुरानन ब्रह्मा को मारकर अपनी प्रतिज्ञा
को पूर्ण करूँगा। बाकी रही प्रजा सृजन की बात सो मैं अकेला ही
प्रजाओं का जो भी स्थावर और जंगम हैं सृजन कर दूँगा। मैं अन्य
विधाता का सृजन कर दूँगा अथवा मैं ही अपने तेज से कर दूँगा और
मेरे द्वारा निर्मित एवं सृजित विधाता सृष्टि के करने वाले होंगे जो
सर्वदा मेरी अनुज्ञा से ही करेगा। वे विभो! मैं ही उसको मारकर अर्थात्
ब्रह्मा का वध करके अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए हे चतुर्भुज!
एक सृजन करने वाले का सृजन करूँगा। आप मुझे वारित न करिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-भगवान् चतुर्भुज ने गिरीश के इस वचन का
श्रवण करके मन्द मुस्कान से युक्त प्रसन्न मुख वाले होते हुए फिर भी
'ऐसा मत करो'-यह कहते हुए बोले की प्रतिज्ञा की पूर्ति आत्मा में
करना योग्य नहीं होता है। हे द्विजोत्तमोँ! ईश्वर के मुख के सामने ही
विष्णु ने कहा था। इसके उपरान्त शिव ने कहा था कि मेरे शम्भु के
रूप से ब्रह्मा मेरी आत्मा किस तरह से हैं। यह तो प्रत्यक्ष रूप से आगे
स्थित होते हुए भिन्न ही दिखलाई दे रहे हैं। इसके अनन्तर उस समय
में मुनियों के सामने भगवान् ने हँसकर गरुड़ध्वज ने महादेव को दोष
देते हुए कहा था।
श्री भगवान् ने कहा-ब्रह्माजी आपसे भिन्न नहीं हैं और न शम्भु ही
ब्रह्माजी से भिन्न हैं और दोनों से मैं भी भिन्न नहीं हूँ। यह हम तीनों
की अभिन्नता तो सनातन अर्थात् सदा से ही चली आने वाली है। भाग
अभाग स्वरूप वाले प्रधान और अप्रधान का ज्योतिर्मय का मेरा भाग
आप दोनों हैं और मैं अशांक हूँ। कौन तो आप हैं, कौन मैं हूँ, कौन
ब्रह्मा हैं वे तीनों ही परमात्मा मेरे ही अंश हैं। सृजन, पालन और संहार
के कारण ये भिन्न होते हैं। आप अपनी आत्मा में ही संस्तव करो।

६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ ६५
ब्रह्मा, विष्णु और शम्भु को एकत्रित हुए हृद्गत करो। जिस तरह एक
ही धर्मी के शिर, ग्रीवा आदि के भेद से अंग होते हैं। हे हर! ठीक उसी
भाँति मेरे एक के ही ये तीनों भाग हैं। जो ज्योति सबसे उत्तम है, जो
अपने और पराये प्रकाश रूप हैं, कूटस्थ, अव्यक्त और अनन्त रूप
से युक्त हैं और नित्य हैं तथा दीर्घ आदि विशेषणों से हीन तथा वह
पर है उसी रीति से हम तीनों अभिन्न हैं।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उन भगवान् के इस वचन को श्रवण
करके महादेव विमोहित हो गये थे। वह अभिन्नता का ज्ञान रखते हुए
भी अन्य चिन्तन से सदा ही विस्मृति होने से ही उनको अभिन्नता का
ज्ञान नहीं हो रहा था। उन्होंने फिर भी गोविन्द से त्रिभेदियों की
अभिन्नता को पूछा था। ब्रह्मा, विष्णु और त्र्यम्बकों का और एक का
विशेषक को पूछा। इसके अनन्तर पूछे गए नारायण ने शम्भु से कहा
था और तीनों देवों का अनन्यता और एकता को प्रदर्शित किया था।
इसके उपरान्त विष्णु भगवान् के मुख कमल से कोश से अनन्यता का
श्रवण करके तथा विष्णु-विधि और ईश के तत्व में स्वरूप को
देखकर मृड (शिव) ने पुष्प, मधु से प्रकाश विधाता इसको नहीं
मारा था।
तीनों देवों का अनन्यत्व
ऋषिगणों ने कहा-भगवान् जनार्दन ने तीनों देवों की जो अनन्यता
को कहा था। हे द्विजोत्तम! शम्भु के लिए सदा अद्वय के श्रवण करने
की इच्छा रखते हैं अथवा गरुड़ध्वज ने कैसे एकत्व को दिखाया था ?
हे विप्रेन्द्र! उसको बतलाइए। हमको बहुत ही अधिक कौतूहल है।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे मुनिगणों! आप लोग श्रवण करिए। यह
तीनों देवों की अनन्यता अर्थात् उनके एकत्व का दर्शन परम गोपनीय
है। भगवान् हर ने भगवान् गोविन्द से पूछा था और बहुत ही आदर
के साथ सम्भाषण करके ही पूछा था। हे मुनिश्रेष्ठों! इन्होंने इनकी
अभिन्नता का प्रतिपादन करने वाला यहीं कहा था। श्री भगवान् ने

६६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
कहा-यह जब भुवन वर्जिततमोमय अर्थात् तम से परिपूर्ण था। यह
अप्रज्ञात, अलक्ष्य और सभी ओर से प्रसुप्त के ही तुल्य था। यहाँ पर
दिन रात्रि का भाग नहीं है, न आकाश है और न काश्यपी ही है, न
ज्योति है, न जल है और न वायु है अन्य किञ्चित् संस्थित नहीं है।
परमब्रह्म एक ही था जो सूक्ष्म, नित्य और इन्द्रियों की पहुँच से परे हैं,
यह अव्यक्त और ज्ञानरूप से द्वैत से ही परिपूर्ण है।
प्रकृति और पुरुष ये दोनों सर्व सहित नित्य हैं। हे भूतेश! काल
भी स्थित है जो एक ही जगत् का कारण है। हे हर! जो एक परमब्रह्म
है वह स्वरूप से परे है उसी जगत के पति के यह तीनों रूप नित्य हैं।
काल नाम वाला दूसरा रूप है जो अनाद्य है और वह तो कारण है वह
सब भूतों का अवच्छेद से संगत होता है। फिर वह अपने प्रकाश से
भास्वरूप वाला प्रकाशित होता है। पहले सृष्टि की रचना करने के
लिए अतुल रूप से स्वयं प्रकृति से क्षोभयुत करता हुआ था। प्रकृति
के संक्षुब्ध हो जाने पर महत्तत्व की उत्पत्ति हुई थी। पीछे महत्तत्व से
तीन प्रकार का अहंकार समुत्पन्न हुआ था। अहंकार के समुत्पन्न होने
पर शब्द तन्मात्रा से विष्णु ने आकाश का सृजन किया था जो आकाश
अनन्त है और मूर्ति से रहित है अर्थात् आकाश की कोई भी मूर्ति नहीं
है। इसके उपरान्त महेश्वर ने रस तन्मात्र से जल का सृजन किया था।
उस समय वह अपनी माया से निराधार ने स्वयं ही धारण किया था।
इसके अनन्तर प्रभु ने तीनों गुणों की अर्थात् सत्व, रज, तम इनकी
समता ने संस्थित प्रकृति को परमेश्वर ने पुनः सृष्टि की रचना के लिए
संक्षोप्ति किया था। इसके पश्चात् उस प्रकृति ने उस जल में त्रिगुण
के भाग वाले निराकुल जगत् के बीच स्वरूप बीज को भली-भाँति
सृजन किया था। वही निश्चत रूप से क्रम से ही वृद्ध महान् सुवर्ण
का अण्ड हुआ था। उस अण्ड ने गर्भ में ही उस सम्पूर्ण जल को ग्रहण
कर लिया था और अण्ड के गर्भ में जल के स्थित हो जाने पर भगवान्
विष्णु ने उस अण्ड को आपकी ही माया से इस अतुल ब्रह्माण्ड को
धारण कर लिया था। जल, अग्नि, वायु तथा नभ से वह अण्डक

൵७२ श्रीकालिका पुराण ७२൵ ६७
बाहिर सब पार्श्व में और सभी ओर आछन्न हो गया था। सात सागरों
के मान से जैसे नदी आदि के मान से ब्रह्माण्ड के अन्दर जल है उसी
तरह से उसके अन्दर यह भगवान् विष्णु स्वयं ही ब्रह्मा के रूप के
धारण करने वाले हैं। एक वर्ष तक निवास करके ही मैंने उस अण्ड
का भेदन किया था।
हे महेश्वर! उससे इसमें मेरु हुआ था। उस जल से जरायु पर्वत
हुए और सात समुद्र हुए था। उसके मध्व में गन्ध की तन्मात्रा से पृथ्वी
समुत्पन्न हुई थी। ईश्वर के द्वारा और प्रवृत्ति से वह त्रिगुणात्मिका
ज्योति की थी। पहले ही पर्वत आदि से वसुन्धरा समुत्पन्न हुई थी।
ब्रह्माण्ड के खण्ड के संयोग से वह अत्यन्त दृढ़ हो गई थी। उसमें ही
सब लोकों के गुरु ब्रह्माजी स्वयं संस्थित हैं। तब ही से सब लोकों के
गुरु ब्रह्माजी स्वयं संस्थित हैं। जब ब्रह्माजी ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित
थे तो वह व्यक्त नहीं हुए थे। उसी समय में रूप की तन्मात्रा से
भली-भाँति तेज उत्पन्न हुआ था। प्रकृति के द्वारा विनियोतिज स्पर्श
तन्मात्रा से वायु उत्पन्न हुआ था जो वायु सभी ओर से समस्त प्राणियों
का प्राणभूत हुआ था। अतुल जलों से, तेजों से, वायुओं से तथा नभ
से उस अण्ड के अन्दर और बाहर व्याप्त था और गर्भ में गमन करने
वाला था। इसके अनन्तर महेश्वर ने ब्रह्मा के शरीर को तीन भागों में
विभक्त कर दिया था। हे शम्भो! स्वभाव की इच्छा के वश से त्रिगुण
त्रिगुणीकृत हो गया।
उसका जो उर्ध्वभाग था चतुर्मुख और चतुर्भुज हो गया था। पद्म
केशर के समान और रंग काया वाला ब्रह्म महेश्वर था। उसका जो
मध्य भाग था वह नीले अंगों वाला, एक मुख से युक्त चार भुजाओं
वाला था। शंख, चक्र, गदा और पद्म हाथों में लिए हुए वह काम
वैष्णव था। उसका अधोभाग पाँच मुखों से समन्वित, चार भुजाओं
वाला था। वह स्फटिक के तुल्य शुक्ल था और वह काम चन्द्रशेखर
था। इधर-उधर ब्रह्म के कार्य में सृष्टि की शक्ति नियोजित किया था
और वह लोकभूत ब्रह्म के रूप से सृष्टा हो गया था। महेश ने वैष्णव

६८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
काम में अपनी ज्ञान की शक्ति को महेश्वर में ही स्थिति अर्थात् पालन
का करने वाला विष्णु हो गया था। सर्वशक्तियों के नियोग से मेरा
सदा ही तद्रूपता है।
वही परमेश्वर संहार करने वाले शम्भु हो गये थे। इनका वे फिर
तीनों शरीरों में अर्थात्-ब्रह्मा, विष्णु, शिव इन तीनों में वह स्वयं ही
प्रकाश किया करते हैं। ज्ञानरूप परमात्मा भगवान् प्रभु अनादि हैं।
सृजन, पालन और संहार के करने से एक ही हैं। वही ब्रह्मा, विष्णु
और महेश पृथक्-पृथक् नहीं हैं। इस प्रकार से शरीर, रूप और ज्ञान
हमारा अन्तर होता है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से शिव
भगवान् ने उन अमित तेज वाले भगवान् विष्णु के वचन का श्रवण
करके अतिरेक से विकसित मुख वाले होकर पुनः जनार्दन प्रभु से
बोले-यदि ज्योति स्वरूप वाला और निरञ्जन महेश ही है, कौन सी
माया है अथवा कौन काल है अथवा कौन प्रकृति कही जाया करती
है? कौन से पुरुष उनसे भिन्न-अभिन्न हैं यदि ऐसा है तो फिर एकता
किस रीति से होती हैं? हे गोविन्द! उनके प्रभाव को मुझे बतलाइए।
श्री भगवान् ने कहा-आप ही सदा ध्यान में समवस्थित होकर
परमेश्वर को देखा करते हैं जो आत्मा में आत्मस्वरूप हैं और वह
ज्योति के रूप वाला सहक्षर है। हे विभो! माया को, प्रकृति को, काल
को और पुरुष को आप स्वयं जानने वाले हैं जब आप ध्यान का भोग
करते हैं तो उसी के द्वारा ज्ञाता हैं। इसीलिए आप ध्यान में तत्पर हो
जाइए क्योंकि इस समय में आप हमारी माया से मोहित हो रहे हैं। इसी
कारण से आप निश्चय ही परम ज्योति का विस्मरण करके वनिता में
निरत हो रहे हैं। अब आप कोप से युक्त हैं अतएव कोप को भूलकर
हे प्रथमों के स्वामिन्! प्रकृति के आदिरूप जिसको आप पूछ रहे हैं।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-फिर तो वहाँ पर महादेवजी ने इस परम
सुनिश्चित वाक्य का श्रवण करके समस्त मुनियों के देखते हुए ये योग
से युक्त होकर ध्यान में परायण हो गये थे। इस समय में बन्ध का
आसाद न करके विर्निमीलित लोचनों वाले महेश्वर ने सब आत्मा का

चिन्तन किया था। परमपुरुष का चिन्तन करते हुए उनका शरीर बहुत
अधिक कान्तियुक्त होकर चमक रहा था। तेज से उज्ज्वल उनको
देखने के लिए उस समय में मुनिगण भी समर्थ नहीं हुए थे। उसी क्षण
में जब ये शम्भु ध्यान से मुक्त हो गये तो भगवान् विष्णु की माया ने
भी उनका परित्याग कर दिया था उस समय वे तप के तेज से अतीव
उज्ज्वल एवं कान्तिमान् होकर चमक रहे थे।
जो-जो भी गण उस अवसर पर सेवा करने के लिए शंकर के
समीप में स्थित रहते थे वे सब भी उन शंकर अथवा दिवाकर के देखने
में समर्थ नहीं थे अर्थात् उन्हें देख नहीं सकते थे। उस काल में स्वयं
ही भगवान् विष्णु समाधि में मन लगाने वाले शिव के शरीर के अन्दर
ज्योति के स्वरूप से प्रविष्ट हुए थे। उन शंकर ने जठर में प्रवेश करके
जैसे पहले सृष्टि का क्रम था ठीक उसी भाँति स्वयं अव्यय नारायण
ने दिखा दिया था। वह न तो स्थूल है और न सूक्ष्म ही हैं, न विशेषण
के गोचर हैं, वह नित्य आनन्दरूप हैं, निरानन्दन हैं, एक हैं, शुद्ध हैं
और इन्द्रियों की पहुँच के बाहर हैं वह अस्पृश्य हैं और सब का दृष्टा
अर्थात् देखने वाला है, वह निर्गुण है, परमपद हैं, परमात्मा में गमन
करने वाला आनन्द हैं और जगत् के कारण का भी कारण हैं। सबसे
प्रथम शम्भु ने तत्स्वरूपी आत्मा को देखा था। वह पर प्रविष्ट हुए मन
में बाहर के ज्ञान से विवर्जित उसी के रूप प्रकृति को जो सृष्टि की
रचना के लिए भिन्नता को प्राप्त हुई थी। उसी के समीप एक उसको
पृथक् भूत हुई की भांति देखा था।
फिर इनमें जिस रीति से वास कर रहे पुरुषों को देखा था। हे
द्विजसत्तमोँ! जैसे स्थूल अग्नि के कण से निरन्तर होवें। वह ही काल
के रूप से बारम्बार भासित होता है। सृष्टि, पालन और अहंकार के
योगों का अवच्छेद से कारण है। प्रकृति और पुरुष ही काल भी जो
अभिन्न थे और सर्ग के लिए भिन्नता को प्राप्त हुए भी समान थे। इन
सबको पृथक भूत और अभिन्न चन्द्रशेखर प्रभु ने देखा था। एक ही
ब्रह्म है जो द्वैत से रहित और यहाँ पर कुछ भी नानारूप वाला नहीं है।

७० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
वह ही प्रधान रूप से और काल के स्वरूप से भासमान होता है तथा
पुरुष के रूप में संसार के लिए प्रवृत्त हुआ करता है।
भोग करने के लिए निरन्तर वह प्राणधारियों के शरीर में प्रवृत्तित
होता है। वह ही माया या प्रकृति हैं जो शंकर भगवान् को मोहित
करती है। वह ही हरि को और ब्रह्माजी को मोहयुक्त करती हैं। ठीक
उसी भाँति से आप अन्य जन्म वाले हैं। माया के नाम वाली प्रकृति
जात हुई और जन्तु को सम्मोहित भी किया करती है। वह सदा स्त्री
के स्वरूप से लक्ष्मीभूता हुई हरि भगवान् की प्रिया है। वह ही
सावित्री, रति, सन्ध्या, सती और वारिणी है। वह देवी स्वयं बुद्धि के
रूप वाली है जो चण्डिका इन नाम से गायन की जाया करती है। यह
ध्यान के मार्ग में गमन किए हुए भगवान् हर ने शीघ्र स्वयं ही देखा था।
महत्तत्व आदि के भेद से फिर सृष्टि के क्रम को स्वयं देखा था।
भगवान् ने काल-प्रकृति तथा पुरुषों को दिखलाकर हे द्विजोत्तभों! उसी
प्रकार से उनके शरीर को अन्य दिखलाया था।
हर कोप शमन वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर भगवान् ने शम्भु के लिए
ब्रह्माण्ड का संस्थान दिखलाया था जिस प्रकार से पहले ब्रह्माण्ड जो
जल की राशि में स्थित होता हुआ बढ़ा था। उसके मध्य में पद्मगर्भ
की आभा वाले जगत् के पति ब्रह्मा को जो ज्योति के रूप वाला
प्रकाश के लिए और सृष्टि की रचना करने के लिए पृथक्गत है और
शरीरधारी को देखा था। फिर ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत चार भुजाओं से
समन्वित ज्योतियों से प्रकाशित कमल पर आसन वाले को देखा था
और वहीं पर उन्होंने तीन भागों में स्थित वपु वाले ब्रह्मा को देखा था।
जो ऊर्ध्व, मध्य और अन्त भागों के द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के
स्वरूप वाला था। जिस रीति से वायु का ऊर्ध्व भाग उस समय में
ब्रह्मत्व को प्राप्त हो गया था जो मध्य भाग था। वह एक ही शरीर तीन
भागों में बार-बार हर भगवान् ने अपने गर्भ में इस सम्पूर्ण जगत् को

൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ ७१
उसी भाँति देखा था। कदाचित् वैष्णवकाय अर्थात् विष्णु का शरीर
ब्रह्मकाय में अर्थात् ब्रह्मा के शरीर में लय हो जाता है। किसी समय
में ब्रह्म वैष्णव में तथा शाम्भव वैष्णवकाय लीन हो जाता है। तात्पर्य
यह है कि कभी ब्रह्मा का शरीर विष्णु के शरीर में और शम्भु के शरीर
में विष्णु का शरीर लय को प्राप्त हो जाया करता है।
शम्भु का शरीर विष्णु के वपु में अथवा ब्रह्मा का वपु शम्भु के
शरीर में लीनता को प्राप्त होता हुआ तथा बार-बार एकता को प्राप्त
होने वाला शम्भु भगवान् ने देखा था। वामदेव की भिन्नता को अप्राप्त
पृथक्गत परमात्मा में गमन करते हुए अर्थात् लीनता को प्राप्त होते हुए
उसके वपु को स्वयं देखा था। शम्भु ने उसके मध्य में जल में वितत
अर्थात् विस्तृत पृथ्वी को देखा था। जो महान् पर्वतों के संघातों से
विरल है। फिर उन्होंने आदि से सर्ग की रचना करते हुए ब्रह्माजी को
देखा था तथा अपने आपको पृथक्भूत और गरुड़ पर आसन वाले
विष्णु को देखा था। वहाँ पर ही प्रजापति दक्ष को और उसी भाँति
अपने गणों को, प्ररीचि आदि दशों को, वैरिणी को, सती, सन्ध्या,
रति, कन्दर्प, वसन्त के सहित श्रृंगार, हावों को, भावों को, मारों को,
ऋषियों को, देवों को, गरुड़ गणों को देखा था। मेघों को, चन्द्र, सूर्य,
वृक्षगण, वल्ली और तृण, सिद्ध, विद्याधर, यक्ष, राक्षस और किन्नरों
को देखा था।
मनुष्यों को, भुजंगों को, ग्राह, मत्स्य, कच्छप, उल्का, निर्घात,
केतुकों को, कृमि, कीट और पतंगों को देखा था। वहाँ पर किसी
वनिता को देखा था जो द्वन्द्व भाव को कर रही थी। किसी को उत्पन्न,
उत्पत्ति को प्राप्त होते हुए विपद्ग्रस्त को देखा था। कुछ लोगों को
हास-विलास करते हुए और कुछ को विलाप करते हुए तथा कुछ दौड़
लगाते हुओं को परमेश्वर ने देखा था जो कि शम्भु की ओर ही भाग
रहे थे। कुछ लोग दिव्य अंलकारों से युक्त थे, कुछ माला और चन्दन
से चर्चित हुए थे, कुछ लोग वीक्षा करते थे और कुछ पुनः शम्भु के
साथ क्रीड़ित थे। कुछ लोग स्तुति कर रहे थे, कुछ शम्भु का स्तवन

करते हुए-विष्णु और ब्रह्मा का स्तवन करने वाले थे। उनके द्वारा कुछ
मुनि और तपस्वी गण भी देखे गये थे। कुछ लोग नदी के तट पर
तपोवन में तपस्या करते हुए देखे गये थे। कुछ लोग स्वाध्याय तथा
वेदों में रत देखे गये थे और कुछ पढ़ाते हुए देखे गये थे। वहीं पर सात
सागर, नदियाँ और देव सरोवर देखे गए थे। वही पर यह पर्वत पर
स्थित थे, ऐसा स्वयं शम्भु के द्वारा देखा गया था।
यह महालक्ष्मी के रूप से भगवान् हरि को पर्याप्त रूप से मोहित
किया करती है। सती के स्वरूप वाली उसी भाँति आत्मा को अर्थात्
अपने आप को मोहित करती हुई को शंकर ने देखा था। वे स्वयं सती
के साथ मेरु पर्वत कैलाश में रमण करते थे तथा मन्दिर में देव विपिन
में जो शृंगार रस से सेवित था। वह देवी सती के रूप का परित्याग
करके हिमवान् की सुता होकर समुत्पन्न हुई थी। जिस प्रकार से पुनः
उसने उन सती को प्राप्त किया था और जैसे अन्धक मारा गया था।
जैसे कार्तिकेय समुत्पन्न हुए और जिस तरह से तारक नाम वाले का
हनन किया था यह सब विस्तारपूर्वक भली-भाँति वृषभध्वज ने देखा
था। जिस रीति से नरसिंह के स्वरूप धारण करने वाले के द्वारा
हिरण्यकशिपु मारा गया था और जिस प्रकार से हिरण्याक्ष और
कालनेमि नष्ट हुआ था तथा जैसे पहले किया हुआ दानवों के समुदाय
के साथ विष्णु भगवान् के द्वारा युद्ध हुआ था तथा जो-जो भी वहाँ
पर निहित हुए थे यह सभी कुछ भगवान् हर ने देखा था। जगत् के
प्रपञ्चरूप ब्रह्मा आदि नक्षत्र ग्रह और मनुष्य, सिद्ध और विद्याधर आदि
को पृथक-पृथक देख-देखकर ईश्वर शम्भु ने उन सबका संहार करते
अपने आप को देखा था। इन्होंने फिर संहार के अन्त में ब्रह्मा, विष्णु,
महेश्वरी को देखा था। यह सम्पूर्ण चर और अचरों से समन्वित जगत्
शून्य हो गया था। इस समस्त शून्य जगत् में ब्रह्मा, विष्णु के शरीर में
गमन करने वाले तथा शम्भु लीन होते हुए उसी के शरीर में प्रवेश कर
गये थे। इन्होंने एक ही अव्यक्त रूप वाले विष्णु को देखा था और
इन्होंने अन्य कुछ भी नहीं देखा था जो उस समय में विष्णु के बिना

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ७३
होवें। इसके अनन्तर विष्णु भगवान् को देखा गया था। परमात्मा में
लय को प्राप्त, भासमान पर तत्व, सनातन ज्योति के रूप वाले
परमतत्व देखे गये थे। इसके अनन्तर ज्ञान से परिपूर्ण, नित्य, आनन्दमय,
ब्रह्म से पर, केवल ज्ञान के द्वारा ही जानने के योग्य को देखा था और
अन्य कुछ भी नहीं देखा था। परमात्मा में उस जगत् का एकत्व और
पृथक्त्व अपने शरीर के अन्दर मर्ग, स्थित और संयमों को देखा था।
प्रकाशरूप, शान्त, नित्य और इन्द्रियों की पहुँच से परे परमात्मा
को देखा था कि ब्रह्मा एक ही पर है। जो अद्वय द्वैत से रहित है। इससे
अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देखा था। कौन भगवान् विष्णु है, कौन
ब्रह्मा है अथवा क्या यह जगत् है ? शम्भु के द्वारा परमात्मा का यह भेद
ग्रहण नहीं किया गया था। इस प्रकार से देखते हुए उनके शरीर के
सुन्दर से बाहर माया आदि निर्गत हुए थे और वृषभध्वज (शिव) में
प्रवेश कर गए थे। जनार्दन प्रभु ने अनन्यत्व और पृथक्त्व दिखलाकर
शम्भु के लिए उनके शरीर से शीघ्र ही फिर बाहर हो गये थे। इसके
उपरान्त समाधि से परित्याग करने वाले चलित आत्मा से युक्त शिव
का मन सती की ओर गया था जो शिवमाया से मोहित हो गये थे। हे
द्विजोत्तमों! फिर भगवान् हर ने दाक्षायणी के मनोहर और विकसित
कमल के आकार वाले मुख को देखा था। इसके आगे दक्ष, मारीचि
आदि मुनियों को, अपने गणों को, कमलासन (ब्रह्मा) को और
भगवान् विष्णु को वहाँ पर देखकर भगवान् शंकर अत्यन्त विस्मित हो
गये थे। इसके अनन्तर विस्मय में स्मित (मन्द मुस्कराहट) से प्रफुल्लित
मुख से संयुत वृषभध्वज महादेव से भगवान् जनार्दन ने कहा।
श्री भगवान् ने कहा-हे शंकर! जो-जो भी आपने एकत्व में और
भिन्नता में देखा और आपने तीनों देवों को स्वरूप जान लिया है।
आपने अपने अन्तर में प्रकृति, पुरुष, काल और माया को अच्छी तरह
से जान लिया है। हे महादेव! वे फिर किस प्रकार वाले हैं ? ब्रह्म एक
ही हैं और वह शान्त, नित्य, परम महत् हैं। वह किस तरह से भिन्नता
को प्राप्त हुआ और कैसा हैं यह आपने देख लिया है। मार्कण्डेय मुनि

ने कहा- इस रीति से भगवान् वृषभध्वज जब भगवान् विष्णु के द्वारा
पूजे गये थे हे द्विजोत्तमों! हर ने हरि के लिए यह तथ्य वचन कहा था।
ईश्वर ने कहा- एक शिव परमशान्त, अनन्त, अच्युत ब्रह्म हैं और
उनसे अन्य ऐसा कुछ भी नहीं है उनसे अभिन्न सम्पूर्ण जगत् हरि के
कला आदि रूप से सृष्टि की रचना का हेतु होता है। वह समस्त
प्राणियों को प्रभव है और निरञ्जन है और हम सब उसके ही सदा
अंश स्वरूप वाले हैं। सृष्टि, स्थिति (पालन) और संयमन (संहार)
उसके द्वारा कथित भेद से तीनों रूप शोभित होते हैं। न तो मैं, न आप
और न हिरण्यगर्भ, न कालरूप, न प्रकृति और उसकी प्रेरणा करने के
लिए समर्थ है। यहाँ पर कुछ रूप के बिना भी उसका सत् भी है। श्री
भगवान् ने कहा-हे वृषभध्वज! यह तत्व आपने कहा और जान लिया
है। हम ब्रह्मा, विष्णु और पिनाकी (शिव) उसके अंशभूत ही हैं। इस
कारण आपके द्वारा ब्रह्मा वध के योग्य नहीं हैं। यदि आपको एकता
विदित है जो कि हे शम्भो! ब्रह्मा, विष्णु और पिनाकधारी शिव की
होती है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-अपरिमित तेज के धारण करने वाले
भगवान् विष्णु के इस वचन का श्रवण करके महादेव जी ने सबकी
एक स्वरूपता को देखकर ब्रह्मा का हनन नहीं किया। भगवान् विष्णु
ने जिस रीति से एकता को आदिष्ट किया था वह सब मैंने आपको
बतला दिया है।
शिव सती बिहार वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर मेघों के गर्जन करने पर श्री
महादेवजी सती के पति के विष्णु भगवान् प्रभृति सबको विदा करके
अथवा त्याग करके वे हिमवान पर्वत पर राज पर चले गए थे। उस
परमाधिक आमोद की शोभा वाली सती को अपने अत्युन्नत वृषभ पर
समारोपित कराके हिमालय के प्रस्थ को गमन किया था जिसमें परम
रम्य कुञ्जों का समुदाय था। इसके उपरान्त वह सुन्दर दन्त-पंक्ति
वाली चारुहार से समन्वित सती भगवान् शंकर के समीप शोभायमान

௹ श्रीकालिका पुराण ௹ ७५
हुई थी। वृषभ पर स्थित भी वह चन्द्र के मध्य में कलिका के समान
ही थी। वे सब ब्रह्मा आदिक और मरीचि आदि मानस पुत्र, दक्ष
प्रजापति भी सभी सुर और असुर परम प्रसन्न हुए थे अर्थात् उस
अवसर पर सभी को अत्यन्त हर्ष हुआ था। जो सब भगवान् शंकर के
साथ में गमन कर रहे थे। उनमें कुछ तो शंखों को बजा रहे थे और
कुछ सुमंगल करने वाले तालों का वादन कर रहे थे। कुछ हास्य ही
कर रहे थे। इसी रीति से सबने वृषभध्वज का अनुगमन किया था
अर्थात् शिव के पीछे-पीछे गये थे फिर ब्रह्मा आदि भी सब शम्भु के
द्वारा विदा कर दिए गए थे। वे सब परमाधिक आनन्द से कुछ दूर तक
शिव की पीछे-पीछे गये थे। इसके उपरान्त ब्रह्मा आदि और मानस
पुत्रों ने शम्भु के साथ सम्भाषण करके आशुगमन करने वाले रथों के
द्वारा अपने-अपने आश्रमों को चले गये थे। समस्त देवगण, सिद्ध और
उसी भाँति अप्सराओं के समुदाय और जो-जो भी वहाँ पर यक्ष,
विद्याधर आदि समागत हुए थे वे सभी भगवान् हर के द्वारा बिना किए
हुए अपने निवास स्थानों को चले गए थे तथा वृषभध्वज के द्वारा ग्रहण
करने पर सभी आमोद से समन्वित हुए थे। इसके अनन्तर भगवान्
शिव अपने गणों के सहित आनन्द देने वाले संस्थान पर पहुँचकर जो
कि कैलाश गिरि के नाम वाला था। वहाँ पर शिव ने अपनी प्रिया को
वृषभ ने नीचे उतार लिया था। फिर विरुपाक्ष प्रभु ने इस दाक्षायणी
सती की प्राप्ति करके अपने गणों को जो नन्दी आदिक थे उस गिरि
की कन्दरा से विदा कर दिया था। भगवान् शम्भु ने नन्दी आदि से
बहुत ही मधुर वाणी में उन सबसे कहा था कि यहाँ पर जिस समय
में भी मैं आप सबका स्मरण करूँ उसी समय में स्मरण से चलमानस
वाले आप लोग मेरे समीप में तब-तब ही आगमन करेंगे। इस प्रकार
से वामदेव के द्वारा कथन करने पर वे नन्दी भैरव आदिक सब हिमवान्
गिरि पर चल रहे थे। उन सबके जाने पर भगवान् ईश्वर भी उस सती
के साथ मोहित हो गये थे। हर भी एकान्त में प्रतिदिन उस दाक्षायणी
के साथ चिरकाल पर्यन्त बहुत ही अधिक रमण करने वाले हो गये थे।

७६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
किसी समय में वन में स्वाभाविक रूप से समुत्पन्न हुए पुरुषों का
समाहरण करके उनकी एक अतीव मन को हरण करने वाली सुन्दर
माला की रचना करके उन्होंने सती के हार के स्थान में नियोजित किया
था। किसी समय दर्पण में अपने मुख का अवलोकन करने वाली सती
का अनुगमन करके भगवान् शम्भु भी अपने मुख को देखा करते थे।
किसी समय उस सती के कुन्तलों को उल्लसित करके उल्लास में आए
हुए शिव बाँधा करते थे तथा किसी प्रकार मोचन किया करते थे और
बराबर उन केशों को काढ़ा भी करते थे अर्थात् कंघी भी काढ़ते थे।
अनुराग में निमग्न हर इस सती के स्वाभाविक लालिमा लिए हुए दोनों
चरणों को उज्ज्वल पावक के द्वारा निसर्ग रक्त किया करते थे। जो
दूसरों के आगे भी बार-बार ऊँचे स्वर के कथन करने के योग्य बात
होती थी उसको भी भगवान् हर सती के मुख को स्पर्श करने के विचार
में उनके कान में कहा करते थे। विशेष दूर भी न जाकर यह शम्भु
किसी समय में प्रयत्नपूर्वक समागत होकर पीछे के भाग में आकर अन्य
मन वाली इस सती की आँखों को बन्द कर दिया करते थे। वृषभध्वज
अपनी माया से वहाँ पर ही अन्तर्धान होकर उस सती का आलिंगन
किया करते थे। तब वह भय से चकित होकर अधिक व्याकुल हो
जाया करती थी।
उन हिमालय पर्वत में वृषभध्वज के प्रवेश किए जाने पर कामदेव
भी अपने मित्र वसन्त के तथा अपनी पत्नी रति के साथ वहाँ पर चला
गया था। उस कामदेव के प्रविष्ट हो जाने पर वसन्त ने भगवान् शंकर
के समीप में अपनी शोभा का वृक्षों में, जल में और भूमि में विस्तार
कर दिया था। वहाँ पर सभी वृक्ष फूलों से संयुत होकर पुष्पित हो गए
थे और अन्य लतायें भी पुष्पित हो गई थीं सब सरोवरों के जल खिले
हुए कमलों से युक्त हो गये थे तथा उन कमलों पर भ्रमर गुञ्जार कर
रहे थे। वहाँ पर सुरति के प्रविष्ट हो जाने पर मलय की ओर से आने
वाली वायु वहन कर रही थी। सुगन्धित पुष्पों के सहित योग को जाने
से सुरभियाँ मोहित हो गई थीं। उस समय में उस सुरभि ने मुनियों के

भी मन का प्रमथन कर दिया था। चक्र के समूह के ही घृत के समान
कृति कामदेव ने सार का समुद्धरण किया था। पलाश सन्ध्या काल में
आधे चन्द्रमा के सदृश शोभित हुए थे। पुष्प कामदेव के अस्त्र के ही
समान सदा प्रमोद के लिए हो गये थे। सरोवरों में कमल के पुष्प
शोभित हो रहे थे।
नागकेशर के वृक्ष स्वर्ण वर्ण वाले पुष्पों के शंकर से समीप में
मदन (कामदेव) के केतु की आभा वाले परम सुन्दर शोभित हो रहे
थे। चम्पक के वृक्ष बार-बार हेम पुष्पत्व को अर्थात् सुनहले पुष्पों को
प्रकट करते हुए विकसित प्रचुर पुष्पों से भली-भाँति शोभायमान हुए
थे। विकसित हुए अर्थात् खिले हुए पाटला के पुष्पों से दिशायें
पाटलांशु हो गईं थीं। जिस किसी तरह से वे पाटलनाभ वाले वृक्ष
पुष्पित हो रहे थे। अवंग वल्ली की सुरभि गन्ध के द्वारा वायु को
सुरभित करके कामीजनों में पूर्व चित्तों को बहुत ही अधिक सम्मोहित
करती है। वासन्ती से वासित वल्वज शोभित हो रहे थे उसकी गन्ध के
लालची भ्रमर मनोहर रति मित्र थे। सुन्दर पावक के वर्चस्व वाले आम्र
वृक्षों के शिखर कामदेव के वाणों के समूह से वंदनावृत होते हुए
शोभायुक्त थे। सरोवर तथा जलाशयों का जल फूले हुए कमलों के
द्वारा शोभित हुए थे जो अव्यक्त ज्योति के उद्गम से मुनिगणों के
चित्तों के ही तुल्य थे।
सूर्य की किरणों के संगम से तुषार क्षय को प्राप्त हो गये थे। उस
समय में उन तुषारों का क्षय विज्ञानशाली पुरुषों के हृदय से ममत्व की
ही भाँति हुआ था। उस समय में प्रतिदिन कोयल निःशंक होकर अपनी
मधुर ध्वनि का विचार कर रही थी। जो पुष्पों में बहुत ही अधिक
पुष्पों की ज्या (धनुष की डोरी) के शब्द की ही भाँति था। वहाँ पर
भ्रमर वनों के अन्तर्गत पुष्पों में गमन करने वाले भ्रमरकान्ता की लीला
को भूख वाले कामदेव रूपी व्याघ्र की ध्वनि की ही भाँति गुँजन कर
रहे थे। चन्द्र तुषार की भाँति था और भानु सकल कलाओं वाला नहीं
था। यह क्रम से स्वजनों के मोह के लिए कुशलतापूर्वक इन कलाओं