कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
इनके द्वारा वह मेरे आपके द्वारा ही सामञ्जस्य से ये कर्म हुआ करते
हैं। एक के निहित हो जाने पर इनमें कौन हैं जो उस कर्म को करेगा।
हे वृषभध्वज! इस कारण से आपके द्वारा विधाता वध करने के योग्य
नहीं है।
ईश्वर ने कहा-मैं इन चतुरानन ब्रह्मा को मारकर अपनी प्रतिज्ञा
को पूर्ण करूँगा। बाकी रही प्रजा सृजन की बात सो मैं अकेला ही
प्रजाओं का जो भी स्थावर और जंगम हैं सृजन कर दूँगा। मैं अन्य
विधाता का सृजन कर दूँगा अथवा मैं ही अपने तेज से कर दूँगा और
मेरे द्वारा निर्मित एवं सृजित विधाता सृष्टि के करने वाले होंगे जो
सर्वदा मेरी अनुज्ञा से ही करेगा। वे विभो! मैं ही उसको मारकर अर्थात्
ब्रह्मा का वध करके अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए हे चतुर्भुज!
एक सृजन करने वाले का सृजन करूँगा। आप मुझे वारित न करिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-भगवान् चतुर्भुज ने गिरीश के इस वचन का
श्रवण करके मन्द मुस्कान से युक्त प्रसन्न मुख वाले होते हुए फिर भी
'ऐसा मत करो'-यह कहते हुए बोले की प्रतिज्ञा की पूर्ति आत्मा में
करना योग्य नहीं होता है। हे द्विजोत्तमोँ! ईश्वर के मुख के सामने ही
विष्णु ने कहा था। इसके उपरान्त शिव ने कहा था कि मेरे शम्भु के
रूप से ब्रह्मा मेरी आत्मा किस तरह से हैं। यह तो प्रत्यक्ष रूप से आगे
स्थित होते हुए भिन्न ही दिखलाई दे रहे हैं। इसके अनन्तर उस समय
में मुनियों के सामने भगवान् ने हँसकर गरुड़ध्वज ने महादेव को दोष
देते हुए कहा था।
श्री भगवान् ने कहा-ब्रह्माजी आपसे भिन्न नहीं हैं और न शम्भु ही
ब्रह्माजी से भिन्न हैं और दोनों से मैं भी भिन्न नहीं हूँ। यह हम तीनों
की अभिन्नता तो सनातन अर्थात् सदा से ही चली आने वाली है। भाग
अभाग स्वरूप वाले प्रधान और अप्रधान का ज्योतिर्मय का मेरा भाग
आप दोनों हैं और मैं अशांक हूँ। कौन तो आप हैं, कौन मैं हूँ, कौन
ब्रह्मा हैं वे तीनों ही परमात्मा मेरे ही अंश हैं। सृजन, पालन और संहार
के कारण ये भिन्न होते हैं। आप अपनी आत्मा में ही संस्तव करो।