कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 442 में से
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बाहिर सब पार्श्व में और सभी ओर आछन्न हो गया था। सात सागरों
के मान से जैसे नदी आदि के मान से ब्रह्माण्ड के अन्दर जल है उसी
तरह से उसके अन्दर यह भगवान् विष्णु स्वयं ही ब्रह्मा के रूप के
धारण करने वाले हैं। एक वर्ष तक निवास करके ही मैंने उस अण्ड
का भेदन किया था।
हे महेश्वर! उससे इसमें मेरु हुआ था। उस जल से जरायु पर्वत
हुए और सात समुद्र हुए था। उसके मध्व में गन्ध की तन्मात्रा से पृथ्वी
समुत्पन्न हुई थी। ईश्वर के द्वारा और प्रवृत्ति से वह त्रिगुणात्मिका
ज्योति की थी। पहले ही पर्वत आदि से वसुन्धरा समुत्पन्न हुई थी।
ब्रह्माण्ड के खण्ड के संयोग से वह अत्यन्त दृढ़ हो गई थी। उसमें ही
सब लोकों के गुरु ब्रह्माजी स्वयं संस्थित हैं। तब ही से सब लोकों के
गुरु ब्रह्माजी स्वयं संस्थित हैं। जब ब्रह्माजी ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित
थे तो वह व्यक्त नहीं हुए थे। उसी समय में रूप की तन्मात्रा से
भली-भाँति तेज उत्पन्न हुआ था। प्रकृति के द्वारा विनियोतिज स्पर्श
तन्मात्रा से वायु उत्पन्न हुआ था जो वायु सभी ओर से समस्त प्राणियों
का प्राणभूत हुआ था। अतुल जलों से, तेजों से, वायुओं से तथा नभ
से उस अण्ड के अन्दर और बाहर व्याप्त था और गर्भ में गमन करने
वाला था। इसके अनन्तर महेश्वर ने ब्रह्मा के शरीर को तीन भागों में
विभक्त कर दिया था। हे शम्भो! स्वभाव की इच्छा के वश से त्रिगुण
त्रिगुणीकृत हो गया।
उसका जो उर्ध्वभाग था चतुर्मुख और चतुर्भुज हो गया था। पद्म
केशर के समान और रंग काया वाला ब्रह्म महेश्वर था। उसका जो
मध्य भाग था वह नीले अंगों वाला, एक मुख से युक्त चार भुजाओं
वाला था। शंख, चक्र, गदा और पद्म हाथों में लिए हुए वह काम
वैष्णव था। उसका अधोभाग पाँच मुखों से समन्वित, चार भुजाओं
वाला था। वह स्फटिक के तुल्य शुक्ल था और वह काम चन्द्रशेखर
था। इधर-उधर ब्रह्म के कार्य में सृष्टि की शक्ति नियोजित किया था
और वह लोकभूत ब्रह्म के रूप से सृष्टा हो गया था। महेश ने वैष्णव