कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
३७२ श्रीकालिका पुराण
को, राजपुत्र को तथा अन्य आमात्यों को और सैनिकों को दिखा करके
शिव शार्दूल कम्पन करते हुए सबको दिखावे । मिट्टी से शत्रु से हृदय
में शूल से वेध करे और शिर का खंड से छेदन करना चाहिए ।
आचार्य पीछे कवि को अभिमंत्रित करके फिर प्रभाकर ऐन्द्र मन्त्रों से
स्वयं के लिए मुख में देवे । उस समय में इस मन्त्र से नृप पर उस
समारूढ़ होकर अपने सम्पूर्ण बलों के सहित उत्तर पूर्व दिशा में गमन
करे ।
उस समय में ऋत्विक, पुरोहित, आचार्य सब ही नृप के पीछे
अनुगमन करें और अन्य निमित्तों का विलोकन करें । राजा तुमुल वाद्यों
की ध्वनियों से मेदिनी को मानों विदीर्ण करता हुआ नीराजन में गमन
करे । विविध मणि विद्रुम, मुक्ता आदि स्वर्ण रत्नों से सुभूषित होकर
केवल एक कोस गमन करके राजा पूर्व के द्वार से अपने पुर में प्रवेश
करे और पुरोहित विप्रों के साथ यज्ञ में गमन करे । वहाँ जाकर पीछे
द्विजों के लिए दक्षिणा सुवर्ण, गौ, तिल आदि शक्ति से दान देवे । इस
प्रकार से बलों का और राजाओं का नीराजन करके इस लोक में और
मृत्युगत होकर भी राजा सुस्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति किया करता है । हे
अश्व! आपका उद्भव सागर से हुआ है आप अश्वामृत से सज्जात हैं ।
शिव सत्त्व से इन्द्र का वहन किया करते हैं, उसी से मेरा वहन करें ।
जिस सत्य से रेवन्त का, जिस सत्य से भास्कर का वहन करते हो उसी
सत्य से विजय प्राप्त करने के लिए मेरा वहन करो । इन मूल मन्त्रों के
द्वारा अश्व पर आरोहण का समाचरण करना चाहिए ।
महिषी के आगे समारोहण करके फिर शुद्धान्तः पुर लम्बित करे ।
फिर वह महिषी ( पट्टाभिषक्ता रानी ) को पलंग पर संस्थित राजा का
सिद्धार्थ के सहित दूर्वा क्षतों से स्त्रियों के साथ अभ्यर्चन करना
चाहिए । यह तृतीया में नीराजन में भूमि के ग्रहण करने पर ही करे ।
हे राजन्! यह मैंने आपके सामने नीराजन का क्रम बता दिया है । अब
स्नान का विधान आप मुझसे श्रवण कीजिए ।
[राज्याभिषेक वर्णन]
௬०९ श्रीकालिका पुराण ௬०९ ३७३
[राज्याभिषेक वर्णन]
और्व ने कहा-हे राजन् अब मैं आपको पुण्य स्नान की विधि के
क्रम को बताऊँगा जिसके विधान से ही विघ्न निरन्तर नाश को प्राप्त
हो जाया करते हैं । पौष मास में चन्द्र के पुष्य नक्षत्रगत होने पर राजा
को पुण्य स्नान का समाचरण करना चाहिए । यह स्नान सौभाग्य और
कल्याण के करने वाला होता है और दुर्भिक्ष तथा मरण का अपहरण
करने वाला होता है । विष्टि ( भद्रा ) आदि दुष्ट करण में, व्यतीपात
और वैधृति में वज्र, शूल, हर्षण आदि योग में यदि इसका लाभ होता
है तो तृतीया से युक्त पुष्य नक्षत्र रवि, शौरि और मंगलवार में तब यह
समस्त दोषों की हानि करने वाला होता है । ग्रहदोष होते हैं और राज्यों
में ईतियाँ होती हैं । तब पुष्य नक्षत्र में मासान्तर में भी करना चाहिए ।
यह शान्ति पहले समय में ब्रह्माजी ने गुरु के लिए बताई थी और
जगत्पति ने शक्र आदि समस्त देवों की शान्ति के लिए ही कहा था ।
तुष, केश, अस्थि, वल्मीक, कीट देश आदि से वर्जित, शर्करा, कृमि,
कूष्माण्ड, बहु कृष्ट से रहित, काक, उलूक, कंक, ककोल, गृध्र,
शौनकी से रहित और जलोका आदि से वर्जित, चम्पक, अशोक,
वकुल आदि से विराजित अपने स्थान में हंस और कारण्वों से
समाकीर्ण अथवा शुचिसर के तट पर पुण्य स्नान के लिए राजा को
उत्तम स्नान का ग्रहण करना चाहिए । इसके अनन्तर राजा और पुरोहित
अनेक वाद्यों की ध्वनियों के साथ प्रदोष के समय में उस स्थान पर पूर्व
दिन में गमन करें । उस स्थान की कौबेरी दिशा में पुरोहित स्थित होकर
सुगन्धित चन्दन, पान कर्पूर आदि से अधिवासित गोरोचनाओं से
सिद्धार्थों से, अक्षतों से जो फल आदि के सहित हो, 'गन्ध द्वारा'
इत्यादि मन्त्रों के द्वारा सबके अधिसिक्तों से उस स्थान को अधिवासित
करके वहाँ पर देवगणों का पूजन करना चाहिए ।
भगवान् गणेश, केशव, इन्द्रदेव, ब्रह्मा, देव शंकर उमा के सहित
और समस्त गण देवता और मातृगणों का पुरोहित के साथ राजा अर्चन
करे । मंगल कलशों को स्थापित करे और अनेक प्रकार के नैवेद्यों के
समुदायों का, पायस, स्वादु फल और मोदक तथा यावक देवे । उस
स्थान से भी भूतों को मन्त्र का उच्चारण करते हुए अपसारित करना
चाहिए । जो भूत भूमि के पालक हैं वे यहाँ से अपसरण कर जावें ।
भूतों का विरोध न करते हुए मैं स्नान के कर्म करता हूँ । इसके अनन्तर
दोनों हाथों को पुटित करके राजा इस मन्त्र के द्वारा इन पूज्य देवों का
पुष्प के अभिषेक लिए आवाहन करे । जो यहाँ पर पूजा के अभिलाषी
देव हों वे सब सुरगण यहाँ पर आगमन करें । सब दिशाओं के पालक
हों और जो भी अभागी होंवे आगमन करें । फिर पुष्पों की अञ्जलि
देकर पुनः इस मन्त्र का पाठ करें ।
मेरे इस स्थान को प्राप्त करके आज यहाँ पर बिबुध गण स्थित
हों । रक्षा करने वाले आप पूजा प्राप्त करके और राजा को शान्ति
प्रदान करके स्थित हों । इसके उपरान्त राजा स्वप्न में शुभ और अशुभ
का ज्ञान प्राप्त करे । देवी की पूजा करके रात्रि में स्थान में नृप को स्वयं
ज्ञान करना चाहिए । दोषों के ज्ञाताओं द्वारा सम्मत स्वप्न में शुभ,
अशुभ के फल को जानना चाहिए । यदि बुरे स्वप्न का दर्शन हो तो
पुरुष के अभिषेचन में चौगुना हवन करना चाहिए और सौ गौओं का
दान भी दे । गौ, घोड़ा, हाथी, प्रसाद, पर्वत वृक्ष का आरोहण शुभ
करने वाला और राज्यश्री की वृद्धि करने वाला हुआ करता है । दधि,
देव, सुवर्ण, ब्राह्मण की प्रदर्शन, दुर्वा, वीणा, अक्षत, फल, पुष्प,
क्षत्र, विलेपन, शीतांशु (चन्द्र), चक्र, शत्रु का, पद्म का और सुहृद
का लाभ, रात्रि में क्षय करने वाले हैं । रत्नाकार, भूभृत और उपराग
को देखना, निबड़ के द्वारा बन्धन करने वाला होता है । माँस का
भोजन, पर्वत का विवर्त्तन, नाभि के मध्य में वृक्ष की उत्पत्ति और मृत
पुरुष उतरना, पर्वत को, नदी का तथा स्रोत लाँघना, अपने पुत्र का
मरण, रुधिर और मदिरा का पान, पायस का भोजन तथा मनुष्य पर
आरोहण हे नृप श्रेष्ठ! ये स्वप्न राजा के कल्याण, सुख, सौभाग्य,
राज्य और शत्रुओं का क्षय किया करते हैं । गधा, ऊँट, और महिष का
आरोहण राज्य के नाश करने वाले हैं । रक्त वस्त्र का परिधान,
रक्तमाला और रक्त अनुलेपन, रक्त तथा काली की कामना करता
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३७५
हुआ भी मृत्यु को प्राप्त किया करता है । कूप के अन्दर प्रवेश तथा
दक्षिण दिशा में गति, कीच में निमज्जन या स्नान, भार्या और पुत्र का
विनाश करने वाला होता है ।
अन्य राज्य की प्राप्ति करके महान् कल्याण को प्राप्त किया करता
है । बीस हाथ दीर्घ और सोलह हाथ विस्तार से युक्त सब लक्षणों से
युक्त उत्तम यज्ञ मण्डल की रचना करनी चाहिए । इसके उपरान्त दूसरे
दिन में पूर्वाह्न में मातृगणों की पूजा करे । भीत में लगी हुई वसोर्धारा
तथा वृद्धि, श्राद्ध अर्थात् नान्दीमुख नामक श्राद्ध करे । चन्दन, अगुरु,
कस्तूरी, धूप, कर्पूर के चूर्ण मण्डल स्थान की भली भाँति पूजा करके
उसमें 'हौं शाम्भवे नमः' 'अस्त्राय हूँ फट्' इन दो मन्त्रों को बुध को
लिखना चाहिए ।
मन्त्र का ज्ञाता और मण्डल के ज्ञान रखने वाला पुरुष कम्बल से
उत्पन्न सूत्रों से अथवा कौशेयों से प्रथम स्वस्तिका नामक मण्डल का
लेखन करे । फिर चार हाथ प्रमाण वाला मण्डल लिखना चाहिए ।
मण्डल का पद्म एक हाथ प्रमाण वाला कहा गया है । डेढ़ हाथ के
प्रमाण वाले द्वार होने चाहिए । वह पद्म कर्णिमा के केसरों से
समुज्ज्वल होवे । सफेद, लाल, पीला, कृष्ण और हरा और शीली के
चूर्ण से, कौसुम्भ से तथा हरिदुद्भव हान्द्रि से अन्जन के चूर्ण से
मण्डल की वृद्धि के लिए रचना करे । पद्म के अन्दर से आरम्भ
करके पश्चिमगामी ताल को और पश्चिम के द्वार के मध्य में सौ हाथ
विनिर्दिष्ट करना चाहिए । द्वार के मध्य में सौ हाथ विनिर्दिष्ट करना
चाहिए । द्वार मध्य में प्रत्येक आठ पत्रों वाला होना चाहिए । मण्डल
के भाग में ज्ञात को चूर्णों से पृथक्-पृथक् ही करना चाहिए । चूर्णों
के द्वारा मण्डल की रचना करके फिर सूत्रों को उत्साहित करे । सूत्र
का उत्सारण करके प्रथम मण्डल का अर्चन करना चाहिए । 'भवनाय
नमः' इससे फिर हाथ से विनियोजित करे । मध्यमा, अनामिका और
अंगुष्ठ से इच्छानुसार ऊपर नीचे की ओर मुख वाली अंगुलियों को
करके विचक्षण पुरुष पातन कर देवे ।
३७६ श्रीकालिका पुराण
रेखा समान करनी चाहिए जो विच्छिन्न और पुष्परंजित हो । ज्ञाता
पुरुष के द्वारा अंगुष्ठ के पर्व की निपुणता से समादी करनी चाहिए ।
संसक्त, विषय, स्थूल, विछिन्न, कृसराकृत, पर्यन्त, अर्पित और ह्रस्व
कभी भी नहीं लिखनी चाहिए । यदि रेखा संसक्त हो तो उससे कलह
जानना चाहिए और ऊर्ध्व रेखा में विग्रह होता है । अत्यधिक स्थूल होने
पर व्याधि होती है, विमिश्रत होने पर नित्य पीड़ा होती है । बिन्दुओं
से भय को प्राप्त हुआ करता है, जो कि शत्रु के पक्ष की ओर से हुआ
करता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है । कृपा में अर्थ की हानि होती
है और रेखा छिन्ना हो तो उसमें निश्चय ही मरण हुआ करता है अथवा
अभीष्ट द्रव्य या सुत का वियोग होता है । जो भी कोई न जानकर ही
इच्छा के ही अनुसार मण्डल का लेखन करे तो वह सभी दोषों को
प्राप्त किया करता है जो भी दोष पूर्व में बताये गए हैं । ज्ञान रखने वाले
पुरुष के द्वारा सफेद सरसों और दूर्वा से रेखा करनी चाहिए । मण्डल
बारह होते हैं, उनके नाम विमल, विजय, भद्र, विमान, सुभद्र, शिव,
वर्धमान, देव, शताक्ष, काम्यादक, रुधिर, स्वास्तिक, ये ही बारह
मण्डल हैं । विचक्षणों द्वारा स्थान और यज्ञ के अनुसार ही योजित
करना चाहिए ।
सुरों के समूहों द्वारा अमृत के लिए सागर के मन्थन लिए जाने पर
पीयूष के धारण के लिए विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित किए गए थे ।
क्योंकि देवी की कलींकला-कला पृथक्-पृथक् आसन करके वे किए
गए हैं इसी से वे कलश नाम से कीर्तित हुए हैं । कलश नौ ही बताये
गए हैं । अब इनको नाम से समझ लो । गोह्योयगोह्य मरुत, मयूख,
मनोहाचार्य, भद्र, विजय, तनुदूषक, इन्द्रिघन, विजय ये नौ कहे गए
हैं। हे भूप! उनके ही दूसरे नौ नाम भी हैं उनका श्रवण करो जो सदा
ही शान्ति प्रदान करने वाले हैं । प्रथम क्षितीन्द्र कहा गया है दूसरा
जनसम्भव होता है । दो दो पवन और अग्नि हैं, फिर यजमान है ।
कोषसम्भव नाभि में छठवाँ कहा गया है । सोम सातवाँ कहा गया है
और आदित्य आठवाँ है । विजय नाम वाला कलश है वह नवम कहा
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३७७
गया है । वह पंचमुख कहा गया है जो महादेव के स्वरूप का धारण
करने वाला है । घर को पाँच मुखों में पंचवक्त्र स्वयं स्थित है । दिशा
के अनुसार वामदेव आदि नाम से भली भाँति स्थित हैं । मण्डप के
पद्म के अन्दर पञ्चवक्त्र घट का न्यास करना चाहिए । पूर्व की ओर
क्षितीन्द्र का न्यास करके पश्चिम में जल सम्भव का न्यास करे । सोम
का यजन उत्तर में करे तथा सौर का न्यास दक्षिण में करना चाहिए ।
इस रीति से कलशों का न्यास करके उनमें इनका विचिन्तन करे ।
कलशों के मुख में ब्रह्मा है और उनकी ग्रीवा में शंकर स्थित रहते हैं ।
मूल में भगवान् विष्णु संस्थित है और मध्य में मातृगण विराजमान हैं ।
दिक्पाल सब देवता दशों दिशाओं को वेष्टित किया करते हैं ।
कुक्षि में सात सागर हैं और सात द्वीप संस्थित हैं । नक्षत्र, समस्त ग्रह
तथा कुल पर्वत गंगा आदि नव नदियाँ, चारों वेद कलम में ये सभी
विराजमान रहते हैं । रत्न, सब बीज, पुष्प, फल, वज्र, मौक्तिक,
वैदूर्य, महादृम, इन्द्र स्फटिक से युक्त सर्वधाममय विम्ब, नागरोहुम्वर,
बीजपूरक, जम्बीर, काश्मीर, आम्रत, दाड़िम, यश, शाली, नीवार,
गोधूम, जितसर्षय, कुंकुम, अगुरु, कपूर, मदन, रोचन, चन्दन, माँसी,
एला, कुष्ठ, कस्तूरी, पत्र, चूर्ण, जल, निर्यास, काम्बुद, शैलेय, बदर,
जातीपत्र, पुष्प, काल शाक, पृक्वा, देवीपणक वचा, धात्री, मंज्जिष्ठा,
मंगलाष्टक, दूर्वा, मोहिनका, भद्रा, शतावरी वर्णों की सरला, क्षुदास्रह,
देवी, गजाह्वा, पूर्ण, कोषासिता, पीठा, गूंजा, शिर, सक, अनल,
व्यामक, गजदन्त शतपुष्प, पुनर्नवा, ब्राह्मी, देवी, रुद्रा, सर्वसन्धानि इन
सबका समाहरण करके कलशों में निर्धापति करना चाहिए । कलश के
देश के अनुसार, ब्रह्मा, शम्भु, गदाधर का क्रम के अनुसार पूजन करके
मुख्यता से भगवान् शम्भु का यजन करना चाहिए । प्रासाद मन्त्र के
द्वारा शम्भु का और तन्त्र के द्वारा शंकर का प्रथम मध्य में अनेक प्रकार
के नैवेद्यों के निवेदन द्वारा पूजन करना चाहिए । दिक्पालों के घटों में
ही दिक्पालों का अर्चन करे । पूर्व में बाहर स्थापित कलशों में ग्रहों का
पूजन करना चाहिए ।
३७८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
नवग्रहों का और मातृघटों में मातृकाओं का पूजन करना चाहिए ।
सभी देवों का घट में यजन करना चाहिए । उनके घट पृथक्-पृथक्
होते हैं । हे नृप ! पूर्व में नौ ही कहे गए हैं जो मुख्य तथा वर्णित हैं ।
भक्ष्य, भोजन, पेय अनेक भाँति के पुष्प और फल-पावक पायस जो
भी सम्भव योजित हों उनके द्वारा राजा सकल सुरों का पुष्प स्नान के
लिए पूजन करे । मंडल के दक्षिण में कुण्ड का निर्माण करके पायस,
समिधा, शाली सिद्धार्थ, दूर्वा, अक्षत तथा केवल घृत से पूजित सकल
सुरों को ऋत्विक् पुरोहित के सहित नृप वृद्धि के लिए होम के द्वारा
सन्तुष्ट करे । होम के अन्त में मण्डप के उत्तर में वेदिका में पदक के
सहित, रोचना नामक तथा अलंकारों को सबको नियोजित करे । वृद्धि
में अंगुलि से छब्बीस अंगुलिका की अवधि पर्यन्त वृत्त अथवा चौकोर
त्रिकोण संज्ञा वाले पद्म को । फिर पद्म के मध्य में मुगोष्टिक से
रत्नेशों को, श्रीवृक्ष, वरारोहा, शुभावन्त उमा देवी को सब रत्नों से और
अलंकारों से दो हाथ यह बनाना चाहिए । वह एक साथ विस्तार वाला
और नौ हाथ दश अंगुल वाला ऊँचा स्नान के लिए, डेढ़ हाथ का वृत्त
तथा गुणों से अवलम्बित करे । शय्या चौगुनी दीर्घ बनावे और धनुष
के मान वाला पीठ करे । गज और सिंह के द्वारा किए हुए आरोप
वाला और हेम तथा रत्नों से विभूषित सिंह नामक सार्ध विस्तार से
दण्डासन को अथवा व्याघ्र चित्रक पदों के द्वारा उपधानों को करावे ।
अथवा अन्यों के द्वारा निर्मित्त चर्म मृदुतूल से पूरित चार हाथ वाली
परिमाण में सुन्दर लक्षण से युक्त दीर्घ विस्तार से युक्त शय्या गुरु
विद्या से नृप की वितस्ति से अधिक की इच्छा करते हैं ।
केवल सोलह ही वर्ण और चित्र से युक्त करने चाहिए । यान,
सिंहासन, पट्टशय्या के उपकरण आदि राजा के योग्य हो वह वेदी के
उत्तर की ओर न्यस्त करे । उनके पश्चिम में सब प्रकार के रत्नों के
समुदाय से स्वतिक श्रेष्ठ पर्यंक पर जो यज्ञ के काष्ठ के समूह से
निर्मित महान् आस्तरण वाले, अर्धच्छादन से संयुत हो तथा चर्म से
आवृत चतुष्टय वाले, वृषभ के तथा सिंह शार्दूलों के ऊर्ण से आवृत्त
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h
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
३७९
[/header]
रत्नों से समन्वित पादपीठ पर राजा अपने चरणों को समारोपित करके
उस पर्यंक के पीठ पर स्थित चर्म खंड चतुष्टय में रत्नों से शोभित
अनेक अलंकारों से युक्त नृपति का स्नपन करावे । ब्राह्मणों के साथ
सुख से संगत राजा को जो सम्वीन काम्बल वाला कृष्ण और बहुत से
वस्त्रों से शोभित हो उसको कलशों के द्वारा बलि पुष्पादि से और
शालिं चूर्णों से स्नान करावे । आठ, सोलह, बीस, एक सौ आठ
अथवा अधिक कलशों की संख्या बतायी गयी है ।
उस संख्या से उत्तरोत्तर अधिक भी होती है । जय और कल्याणप्रद
मंत्रों से कौर मातृकों से आज्य को तेज समुद्दिष्ट किया है । आज्य पापों
के हरण करने वाला है । आज्य ही सुरागणों का आहार और आज्य
में लोक प्रतिष्ठित है । भूमिगत, अन्तरिक्षस्थ, अथवा दिव्य अर्थात्
दिवलोकगत जो भी आपको कल्मष आ गया है वह सब आज्य के
संस्पर्श से विनाश को प्राप्त होवे । इसके अनन्तर शरीर से कम्बल और
वस्त्र को अलग करके पुष्पों और स्नानीयों से पूरित कलशों के द्वारा
भूप को स्नान करावे । हे नृप श्रेष्ठ! शरीर के तत्त्वार्थ के साधक इन
मन्त्रों से राजा को स्नान करावे । सुरगण आपका अभिषिञ्चन करे और
जो सिद्ध एवं पुरातन हैं, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण,
आदित्य, सुगण, भिषग्वर, दोनों अश्विनी कुमार, देवमाता अदिति,
स्वाहा, लक्ष्मी, सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, कुहू, दिति, सुरमा,
विनिता, कद्रु, जो देव पत्नियां कही गयी हैं वे और देव मातायें सिद्ध
और अप्सराओं के गण सब आपका अभिषिञ्चन करें । नक्षत्र, मुहूर्त्त,
पक्ष, अहोरात्र, सन्धि, सम्वत्सर, निमेष, कला, काष्ठा, क्षण, लव ये
काल के सब अवयव आपका अभिषिञ्चन करे और जो सिद्ध एवं
पुरातन हैं, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, आदित्य, सुगण,
भिषग्वर, दोनों अश्विनी कुमार, देवमाता अदिति, स्वाहा, लक्ष्मी,
सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, कुहू, दिति, सुरमा, विनिता, कद्रु, जो
देव पत्नियां कही गयी हैं वे और देव मातायें सिद्ध और अप्सराओं के
गण सब आपका अभिषिञ्चन करें । वैमानिक अर्थात् विमानों पर
३८० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
संस्थित रहने वाले सुरों के समुदाय, सागरों के सहित मनुगण सरिताएँ,
महानाग, नाग, किम्पुरुष, वैखानस, महाभाग द्विज और अपनी दाराओं
के साथ सप्तर्षि गण जो ध्रुव के स्थान वाले हैं, मारीच, अत्रि, पुलह,
पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा, भृगु, सनत्कुमार, सनक सनन्दन, दक्ष, जेगीषव्य,
अभिनन्दन ।
एक, दो और तीन, जाबालि, कश्यप, दुर्वासा, दुर्विनीत कण्ड,
कात्यायन, मार्कण्डेय, दीर्घतमा, शनुःशेप, विदूरथ, और्व, सवर्त्तक,
च्यवन, अत्रि, पराशर, द्वैपायन, यव, क्रीति, देवरात, सहात्मज, ये और
अन्य जो भी देव व्रत में परायण हैं वे अपने शिष्यों के सहित और
अपनी दाराओं के साथ तप के ही धन वाले आपका अभिषिञ्चन करें ।
पर्वत, वृक्ष, नदियाँ और परम, पुण्य आयतन, प्रजापति, क्षिति, गौयें,
विश्व की मातायें, दिव्य वाहन, सब लोक, चर और अचर, अग्नियाँ,
पितर, तारा, जहमूत, आकाश, दिशायें, जल, ये और अन्य बहुत से
पुण्य संकीर्तन वाले तथा शुभ सब उत्पातों के नियर्हण करने वाले जलों
के द्वारा आपका अभिषिञ्चन करें । इस प्रकार से इन शुभ प्रदाता दिव्य
मन्त्रों के द्वारा दूसरों के द्वारा अभिषेक करे ।
निम्नलिखित मन्त्रों से व नारायणों से, रौद्रों से, ब्रह्मा और इन्द्र से,
समुद्भवों से, 'आपोहिष्ठा' इत्यादि से, 'हिरण्य' इससे, 'सम्भव'
इससे, सुर, इससे 'मानस्तोके' इस मन्त्र से और 'गन्ध द्वार', इस मन्त्र
के द्वारा, सर्वमंगल मांगल्ये इससे, 'श्रीश्चते', इसके द्वारा और ग्रह
योगियों से इस प्रकार से स्नान का समादन करके कम्बलों से शरीर को
आवृत करके 'सर्व मंगल' इत्यादि मन्त्र के द्वारा कपास से निर्मित वस्त्र
को धारण करना चाहिए । इसके उपरान्त आचमन करके देवों का, गुरु
का और विप्रगणों का अभ्यर्चन करना चाहिए । फिर ध्वज, छत्र,
चामर, घण्टा, अश्व, गज को मन्त्र का जप करके धारण करे और
इसके अनन्तर हुताशन के समीप गमन करना चाहिए । वहाँ पर जाकर
राजा वह्नि के मध्य में वह्नि की श्री का निरीक्षण करें । वहाँ पर
बिन्दुओं के द्वारा निमित्तों की और अनिमित्तों को लक्षित करना
[Page-header: ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ \hfill ३८१]
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चाहिए। दैवज्ञ (ज्योतिर्विद) कञ्चुकि, अमात्य, बन्दीजन, पुरवासीजन
से आवृत्त होते हुए तुमुल वाद्यों की ध्वनियाँ से तथा शुभ तौर्यत्रिकों के
साथ युक्त होकर शेष में पुनः शान्ति करके और आशीर्वाच्य करके
द्विजों को विधिपूर्वक सुवर्ण से युक्तपूर्ण दक्षिणा देवे तथा धान्य और
वस्त्र देकर उन सबको विदा करे।
इसके अनन्तर पुरोहित शेष जल से समस्त अमात्यादिक का सेचन
करे तथा तुरंग का, बल का, राष्ट्र का सेचन करना चाहिए। इस
प्रकार से करके पीछे राजा तीन रात्रि पर्यन्त पूर्णतया संयम से युक्त
होकर रहे। माँस का अशन, मैथुन से रहित रहे और मांगल्यों का सेवन
करे। यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त तृतीया तिथि का लाभ है उसमें सदा
शंकर के साथ चण्डिका देवी का अर्चन करना चाहिए। पाञ्चायिकी
विहार आदि के द्वारा तथा शिशुओं के कौतुकों के, वैवाहिक विधि से
शिवा चण्डिका का मोहन करना चाहिए। समस्त चतुष्पथों (चौराहों)
में और देवों तथा देवियों के मन्दिरों में पताकाओं को लगाकर उन्हें
भूषित करे और ऐसा करता हुआ कभी भी दुःख नहीं पाया करता है।
इस रीति से शान्ति यज्ञ को सुसम्पन्न करके तथा पुष्य का अभिसेचन
करके चतुरंगों के साथ, भार्याओं और नरों के साथ राज्य मण्डल से
समन्वित यहाँ पर और परलोक में कभी भी दुखित नहीं हुआ करता
है और इससे बड़ा और श्रेष्ठ कोई भी न यज्ञ होता है और न इससे
उत्तम कोई उत्सव ही हुआ करता है।
इससे बढ़कर कोई भी शान्ति नहीं है और इससे अधिक कोई
कल्याण एवं मंगल नहीं होता है। इस विधान से ही नृप का अभिषेचन
होता है और राजपुरोहित को चाहिए कि इसी विधान से युवराज का
अभिषेक करे। यदि नृप को अभिषेक का समाचरण करना हो तो इसी
विधान से नृप सदा स्थिर होता है। प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने इन्द्रदेव
से यही यज्ञ कहा था। इसी भाँति राजा इस यज्ञ को करके यहाँ पर
और परलोक में कभी दुःख नहीं पाया करता है।
शकध्वजोत्सव वर्णन
३८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
शकध्वजोत्सव वर्णन
और्व ने कहा-इससे अनन्तर हे राजेन्द्र! अतएव आप शक्रोत्थान
ध्वजोत्सव का श्रवण कीजिए जिसको सम्पादित करके राजा किसी
समय में भी पराभव की प्राप्ति नहीं किया करता है । हरिस्थ परिवार
के दिन श्रवण से युक्त द्वादशी तिथि में राजा को इन्द्रदेव का समाराधन
करना चाहिए । इसको भली भाँति करने से सब प्रकार के विघ्नों की
उपशान्ति हुआ करती है । राज परिवार नाम वाला जिसका वासु नाम
दूसरा है, नृप इसे करे । यह पिछले समय में अतुल यज्ञ प्रवृत्त हुआ
था । नभ मास में, वर्षा ऋतु में, द्वादशी तिथि में, शुक्ल पक्ष में,
पुरोहित बहुत प्रकार के वाद्यों और तूर्यों से समन्वित हो । सबसे प्रथम
इन्द्र के केतु के लिए वृक्ष को आमन्त्रित करके उसको वर्धित करना
चाहिए । सम्वत्सर और वार्धकि मंगल कौतुक किया हुआ हो । उद्यान
में, देवता के आगार में, श्मशान में और मार्ग के मध्य में जो भी तरुवर
समुत्पन्न हों उनका वायस ध्वज में वर्जन कर देना चाहिए । जो बहुत
वल्लियों से संयुत हो, शुष्क हो, बहुत से काँटों से समन्वित हो, कुब्ज
अर्थात् टेढ़ा हो वृक्षादनीय युक्त हो तथा लताओं से छन्न तरु हो उसका
परित्याग कर देना चाहिए ।
जो वृक्ष पक्षियों के निवास से समाकीर्ण हो अर्थात् जिस पर बहुत
से पक्षियों के घोंसले हों, जो बहुत कोटरों से समन्वित हो, जो वायु
और अग्नि से विध्वस्त हो गया हो ऐसे तरु को यत्नपूर्वक वर्जन कर
देवे । जिन वृक्षों का नाम नारी वाला हो, जो अत्यन्त छोटा हो, जो
बहुत ही कृश हों । ऐसे इन सभी वृक्षों का धीर पुरुष इन्द्र के पूजन
में सदा ही वर्णन कर दे । अर्जन, अश्वकर्ण, प्रिय कोषरु, औदुम्बर,
ये पाँच वृक्ष केतु के लिए उत्तम बताए गए हैं, और अन्य देवदारु आदि
तथा शाल आदि वृक्ष जो भी प्रशस्त हैं उनका परिग्रहण करना चाहिए
और जो अप्रशस्त हैं उनका कभी भी ग्रहण न करे । वृक्ष को पकड़
करके रात्रि में स्पर्श करके इस निम्न कथित मंत्र का पाठ करना
चाहिए, जो प्राणी वृक्षों पर है उनके लिए कल्याण हो और आपको
नमस्कार है । राजा आपका वरण करता है । हे नृपोत्तम! कल्याण हो ।
देवराज इन्द्र की ध्वजा के लिए इस पूजा का परिग्रहण करिए । इसके
अनन्तर दूसरे दिन में उसका छेदन करके फिर आठ अंगुल मूल का
ग्रहण करे तथा आगे की ओर से चार अंगुल को छेदन करके उसे जल
प्रक्षिप्त कर देवे । फिर पुर के द्वार पर ले जाकर वहाँ पर केतु का
निर्माण करके भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में केतुका
वेदी प्रवेश करना चाहिए । बाईस हाथ के मान वाला केतु अधम कहा
जाता है । बत्तीस हाथ के मान वाला उससे ज्येष्ठ होता है । बयालीस
हाथ के मान वाला भी होता है । इससे भी अधिक बावन हाथ के मान
वाला उत्तम कहा गया है । हे नृप श्रेष्ठ! इन्द्र की पाँच कुमारियाँ करनी
चाहिए । वे सब शालमयी हों और दूसरी शक्र मातृकाऐं होनी चाहिए ।
केतु के सेतुपाद के प्रमाण वाला तथा मन्त्री के दो हाथ करे । इस रीति
से कुमारियों की रचना करके और मातृका तथा केतु को करके
एकादशी तिथि में शुक्ल पक्ष में उस यष्टि की अधिवासित न करे ।
फिर यष्टि का अधिवास करे तो जो 'गन्ध द्वारा' आदि मन्त्रों के द्वारा
किया जाना चाहिए ।
भगवान् अच्युत का अर्चन करके पीछे शुक्रदेव का पूजन करना
चाहिए । इन्द्रदेव की प्रतिमा का निर्माण के स्वर्ण द्वारा अथवा काष्ठ
के द्वारा करना चाहिए । अन्य किसी उत्तम धातु के द्वारा निर्माण करावे
अथवा सबके अभाव में मृत्तिका से परिपूर्ण करे । उस प्रतिमा को
मण्डल के मध्य में स्थापित करके विशेष रूप से अर्चन करे । इसके
अनन्तर किसी परम शुभ मुहुर्त में राजा केतु को उत्थापित करे । हे
पुरन्दर! आप हाथ में वज्र धारण किए हुए हैं । आप असुरों के हनन
करने वाले हैं, आपके बहुत नेत्र हैं । समस्त लोकों के कल्याण करने
वज्र के लिए यह पूजा ग्रहण कीजिए । हे अमरों के स्वामिन्! आप
सबके धारण करने वाले हैं और सभी देवगणों के द्वारा अभिष्टुत हैं
आप यहाँ पर आगमन कीजिए, यहाँ पदार्पण करिए । आप श्रवण के
आद्यपाद से समुत्थित हुए हैं, आप इस पूजा का ग्रहण कीजिए । हे
३८४ ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३
राजन् ! आपकी सेवा में नमस्कार समर्पित हैं । इस रीति से उत्तम तन्त्रों
में वर्णित दहन और पावन के आदि के द्वारा इस मन्त्र से और तन्त्र से
तथा अनेक नैवेद्यों के निवेदनों से, अपूपों से, पायस से, पान, गुड़ और
अनेक तरह के भक्ष्यों से, भोज्यों से श्री की विशेष वृद्धि के लिए पूजा
करनी चाहिए ।
घट दिक्पालों को और ग्रहों का अर्चन करे । अनुक्रम से साध्य
आदि समस्त देवों का और सब मातृकाओं का पूजन करना चाहिए ।
इसके अनन्तर किसी शुभ मुहूर्त में वर्धकि से समन्वित ज्ञानी यज्ञवेदी के
पश्चिम में केतूत्थापन की भूमि में विप्रों और पुरोहितों के साथ राजा
गमन करे । सुमंगल पाँच रज्जुओ से सुबुद्ध मन्त्र से श्लिष्टा मातृकाओं
के सहित, कुमारियों से संयुक्त और दिक्पालों के पादकों युत, वृहन्,
अतिकान्त सुपूरित अनेक द्रव्यों से यथावर्ण और यथादेश में वस्त्र से
वेष्टित किए हुए हैं । योजिंतों से युक्त उसको जो किंकिणी के जलों
से तथा बड़े घण्टाओं से और चामरों से भूषित तथा रत्नों की माला से
अलंकृत अद्भुत माल्यों और अम्बरों से तथा चारों तोरणों से राजकीयों
के द्वारा धीरे-धीरे महाकेतु को उत्थाथित करे । मण्डल में पूजित उस
महाकेतु को उठाकर इन्द्रदेव का चिन्तन करते हुए उस प्रतिमा को केतु
के मूल में ले जावे ।
वहाँ पर पूर्व की ही भाँति उसका यजन करे तथा शची माताल,
उसके पुत्र जयन्त और ऐरावत का भी अर्चन करना चाहिए । ग्रहों,
दिक्पालों, सर्पों, गणदेवों अश्वों, वलियों के द्वारा और पायस आदि से
पूजन करना चाहिए । अर्चन किए हुए देवों को निरन्तर होम का
समाचरण करे । होम के अन्त में बलि देवे जो महात्मा वासव के लिए
देनी चाहिए । हे नरोत्तम! तिल, घृत, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, इनके द्वारा
अपने-अपने मन्त्रों से देवों का हवन करना चाहिए । इसके उपरान्त होम
के अन्त में ब्राह्मणों को भोजन करावे । इस रीति से सात रात्रि पर्यन्त
दिन-दिन में नित्य भली भाँति अर्चन करना चाहिए । देवों और वेदांग
शास्त्रों के पारगामी विद्वान ब्राह्मणों के सहित राजा सर्वत्र इन्द्र की पूजा
६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ३८५
में कीर्तित किया गया है । 'त्रातारम्', यह मन्त्र इन्द्र का परम प्रिय है ।
इस प्रकार करके दिवा के भाग में शक्र का उत्थापन करे । श्रवण नक्षत्र
से युक्त द्वादशी तिथि में राजा को स्वयं भरणी के अन्तिम चरण में
रात्रि में शक्र का विसर्जन करना चाहिए ।
हे नृप शार्दूल! इस कारण से नृप शक्र का विसर्जन का यह मन्त्र
कहा गया । सुर-असुर गणों के साथ पुरन्दर क्रतु इस उपहार को ग्रहण
कर, हे महेन्द्रध्वज! गमन कीजिए । सूतक के उत्पन्न होने पर भौम
अथवा शनिवार में, भूकम्प आदि उत्पात के हो जाने पर वासव को
विसर्जन नहीं करना चाहिए । उत्पात होने पर तथा उपप्लव के दर्शन
होने पर सात रात्रि को व्यतीत करके तथा शनिवार और भौमवार को
छोड़कर अन्य नक्षत्र में भी विसर्जन कर देना चाहिए । सूतक के
सम्प्राप्त हो जाने पर सूतक के अन्त में जिस किसी भी दिन में विसर्जन
कर दे ।
राजा के द्वारा उसी भाँति क्रतु की रक्षा करनी चाहिए जिससे हे
नृप शार्दूल! क्रतु पर शकुन पतन न करें । जब तक उसका विसर्जन
न हो । जिस प्रकार से आदि से उत्थापन हो धीरे-धीरे पातन करना
चाहिए । क्रतु के भग्न होने पर मृत्यु की प्राप्ति होती है । हे नृप!
अलंकारों के सहित विसर्जन किए हुए शक्रकेतु को रात्रि में अगाध जल
में निम्न वर्णित मन्त्र के द्वारा प्रक्षिप्त कर दे । हे महाभाग केतु! आप
विघ्नों के विनाश करने वाले हैं । समस्त लोकों के भव के लिए आप
जब तक सम्वत्सर हो जल में स्थित रहें । समस्त लोकों के आगे सूर्य
की ध्वनि के साथ उत्पादन करे और एकान्त में केतु का विसर्जन करना
चाहिए । यही पूजन में विशेषता है । इस रीति से महात्मा वासव की
जो पूजा किया करता है वह बहुत समय तक पृथ्वी का उपयोग करके
अन्त में वासव (इन्द्र) के लोक की प्राप्ति किया करता है । उसके
राज्य में कभी दुर्भिक्ष नहीं हुआ करता है और कहीं पर भी व्याधियाँ
तथा आधियाँ नहीं होती हैं तथा मनुष्यों की अकाल में कभी मृत्यु भी
नहीं हुआ करती है । पार्थिव! उसके समान अन्य कोई भी इन्द्रदेव का
३८६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
प्रिय नहीं होता है । उसकी पूजा सब की पूजा है । भगवान् केशव आदि
वहाँ पर ही सब विराजमान रहा करते हैं । समस्त कलुषों का अपहरण
करने वाला व्याधि और दुर्भिक्ष का नाशक, सकल भवों का विशेष,
सब प्रकार के सौभाग्य का सम्पादन करने वाला, शक्रकेतु का सुरपति
के गृह की वाणियों से वाचनप्रिय शरत्काल में अनेकोपचारों के द्वारा
श्री वृद्धि के लिए पूजन करना चाहिए ।
राजा के पालनीय नियम
और्व ने कहा-हे नृप! ज्येष्ठ मास के दशहरा में भगवान् विष्णु की
इष्टि के विषय में अब आप श्रवण जिस विधि से नृप को सदा
भगवान् विष्णु इष्टि करनी चाहिए । प्रतिवर्ष राजा को भगवान् हरि की
सुवर्ण की प्रतिमा का निर्माण करना चाहिए अथवा किसी अन्य उत्तम
धातु के द्वारा बनवाये या काष्ठ की अथवा शिलामयी प्रतिमा की रचना
करानी चाहिए । शिल्पों के द्वारा उसका निर्माण करावे और मानोन्मानो
से उसकी विधि के साथ प्रतिष्ठा करनी चाहिए । उसकी संस्थापना
किसी देवालय में करावे या स्वयं द्वारा निर्मित देवालय में करे । पूर्व
में वर्णित विधि से वासुदेव के बीच से सभी उपचारों के द्वारा भक्ति
के द्वारा वासुदेव भगवान् का अभ्यर्चन करे । पूजा के अन्त में संस्कार
किए हुए अग्नि में जो कि कुण्ड के मध्य में स्थित होवे फिर द्विज घृत
से हरि भगवान् की प्रिय एक सहस्र आहुतियों से हवन करे । द्विज
भली भाँति वासुदेव का पूजन करके फिर होम करे । नृप की अनुमति
से उस प्रतिमा को मण्डल में ले जावे । प्रतिमा के दोनों कपोलों का
दाहिने हाथ से स्पर्श करना चाहिए ।
उस प्रतिमा में हरिदेव की प्राण प्रतिष्ठा करे । हे नृप श्रेष्ठ! प्राणों
की प्रतिष्ठा के करने पर भगवान विष्णु के प्राण नियत रूप से उस
प्रतिमा में आ जाया करते हैं । प्राणों के समागत हो जाने पर इस प्रतिमा
में नियत रूप से देवत्व हो जाया करता है । प्राणों की प्रतिष्ठा न करने
पर प्रतिमाओं में जैसा पहले भाव होता है वैसे ही स्वर्ण आदि भाव
बना रहता है और उनमें विष्णु का भाव नहीं होता है । हे पार्थिव! अन्य
देवों की भी प्रतिमाओं में भी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए तभी उसमें
देवत्व की सिद्धि हुआ करती हैं। प्राण स्थान के बिना सदा सुवर्ण-सुवर्ण
ही रहता है, शिला-शिला है और काष्ठ केवल काष्ठ ही रहा करता
है । सभी अपने ही स्वरूप में रहते हैं । वासुदेव के बीज से,
'मद्विष्णोः' इत्यादि से तथा अंग, अंगी मन्त्रों के द्वारा भगवान हरि की
प्रतिष्ठा का समाचरण करना चाहिए । उसी भाँति मन्त्रों का ज्ञान रखने
वाला हृदय में निरन्तर अंगुष्ठ को देखकर इन मन्त्रों के द्वारा प्रतिष्ठा
करके हृदय में भी समाचरण करे । इसके लिए प्राण प्रतिष्ठा हों, इनके
लिए प्राण क्षरण करें, यह देवत्व की संख्या के लिए स्वाहा, यह यजु
का उच्चारण करें, वैदिक अंग मन्त्रों से और मन्त्रों से और इनके द्वारा
सर्वत्र प्रतिमाओं में प्राणों की प्रतिष्ठा का समाचरण करना चाहिए ।
मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले पुरुष की प्रतिमा के पूजन में आत्मा में भी
करना चाहिए । पूजा के भाग की विशुद्धि के लिए प्रथम प्राण प्रतिष्ठा
करनी चाहिए । इसमें प्राण प्रतिष्ठा का प्रतिमा के पूजन के बिना किसी
भी बुध पुरुष को नहीं करना चाहिए ।
नृपश्रेष्ठ दशमी में इस भगवान विष्णु की इष्टि को करके उसके
पूर्ण हो जाने पर ही फिर उस प्रतिमा को स्थापित करे । इस प्रकार से
राजा दशहरा में हरि भगवान् की इष्टि को करके सभी मनोरथों की
प्राप्ति कर लिया करता है और वह विघ्नों से भी रहित होता है । श्री
पञ्चमी में भी देवी का कुन्द के पुष्पों के द्वारा उस समय में प्रकृष्ट रूप
से पूजन करना चाहिए । गजराज पर संस्थित वासव का उत्तम उपहारों
के द्वारा अर्चन करे ।
यहाँ पर पूजन में भी वासव का पहले कहे हुए लक्ष्मी के महातन्त्र
का ग्रहण करना चाहिए और क्रम के अनुसार मण्डल आदि का भी
ग्रहण करे । इस प्रकार से पूजन के करने पर और श्री पञ्चमी में विशेष
रूप से किए जाने पर नृप श्री से समन्वित होता है और कभी भी श्री
की हानि को नहीं प्राप्त किया करता है । हे पार्थिव! यह समाचार
३८८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
विशेष मैंने आपके सामने वर्णित कर दिया है और निषेध में विशेषों
का श्रवण कीजिए जिससे श्री के द्वारा इष्ट किया जाता है । भगवान्
विष्णु का भली-भाँति पूजन न करके तथा दान न देकर राजा को कभी
भी भोजन नहीं करना चाहिए । पुरोहितों के द्वारा नित्य अग्निहोत्र का
हवन करना चाहिए । अग्निहोत्र न करके भोजन करने वाला नरक की
प्राप्ति किया करता है । रत्नदीप से रहित अरक्षित गृह में राजा को स्त्री
के साथ शयन नहीं करना चाहिए और कभी वहाँ बैठना भी नहीं
चाहिए । अन्न खाकर श्रीफल का अशन न करके तथा नृप धात्री फल
को भी न खावें । माष, आसन और मृत्तिका ये सब बुद्धि का क्षय
करने वाले होते हैं ।
नृपों में उत्तम को प्रतिदिन बुद्धि के जो हेतु हों उन्हीं का भक्षण
करना चाहिए । राजा को यान पर विहीनआसन प्रारोहण नहीं करना
चाहिए । जो आसनों से हीन हो ऐसे यान पर, अश्व और हाथी पर भी
आरोहण नृप न करे । किसी भी समय में राजा एक अकेला निर्जन वन
में विचरण न करे । राजा को चाहिए किसी भी समय भोजन में मद
के कारण पदार्थ का अशन न करे । अष्टमी तिथि में कभी भी माँस
और मैथुन का सेवन न करे । दशश्राद्ध, गया श्राद्ध, तिलों से तर्पण,
वह राजा न करे जिसका पिता जीवित हो । ऐसा करके पाप को प्राप्त
किया करता है । राजा को राज्य पर क्षेत्रज्ञ तनयों का अभिषेक नहीं
करना चाहिए जबकि और सुपुत्र हो तो उसके होते हुए पितृगणों की
शुद्धि के लिए और सुपुत्र का ही अभिषेक करे । औरस, क्षेत्रज,
दत्तक, कृत्रिम, गूढ़ोत्पन्न अपविद्ध ये पुत्र भाग के योग्य हुआ करते हैं ।
कानीन् (कन्या से उत्पन्न), सहोढ़, क्रीत (धन देकर खरीदा हुआ),
पौनर्भव, स्वयंदत्त और दास, ये छः पुत्र पाँसुल होते हैं । पूर्व पूर्वों के
अभाव में दूसरों का अभिषेक करे । जो पौनर्भव स्वयंदत्त और दास हो
उसका कभी भी राज्य में योजन नहीं करे । दत्तक आदि पुत्र भी जो
निज गोत्र के द्वारा संस्कार किए गए हों वे अन्य के वीर्य से समुत्पन्न
हुए पुत्रता को प्राप्त हुआ करते हैं । पिता के गोत्र से राजा का जो पुत्र
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३८९
संस्कार किया हुआ है वह चूड़ाकर्म संस्कार निजगोत्र से संस्थित होंवे
वे दत्तक आदि पुत्र होते हैं अन्यथा दास कहा जाया करता है । हे नृप!
पाँचवे वर्ष से ऊपर दत्तक आदि पुत्रों को ग्रहण करके प्रथम पाँच
वर्षीय पुत्रेष्टि का समाचरण करना चाहिए । पौनर्भव पुत्र को जैसे ही
समुत्पन्न हो उसे समानीत करे ।
मनुष्य को चाहिए कि जातकर्म आदि समस्त संस्कारों को करे ।
पौनर्भवष्टोम के करने पर पौनर्भव कहा गया है । पिता का एकोद्दिष्ट
श्राद्ध नहीं करना चाहिए । जो मूल्य के द्वारा वनिता खरीदी गयी हैं वह
वनिता दासी कही जायी करती है, उसमें जो भी पुत्र समुत्पन्न होता है
वह पुत्र दास कहा गया है । वह राजा के राज्य का भागीदारी हुआ
करता है किन्तु विप्रों के श्राद्ध करने वाला नहीं होता है ।
राजा उसका नियोजन करके उससे तामिस्र नामक नरक में जाया
करता है । राजा को चाहिए कि वह काण्याव्यं अर्थात् विशेष अंग
वाला अथवा अंगहीन, पुत्र रहित, अनभिज्ञ, अजितेन्द्रिय, बहुत छोटे
कद वाला, रोगी को कभी अपना पुरोहित न बनावे । राजा को चाहिए
कि वह कभी कृपण के धन को ग्रहण न करे । द्विजों को बहुत अधिक
धन भी नहीं देवे । राजा कभी कामुक और उन्मत्त हाथी पर आरोहण
न करे । उस कामुक पर समारोहण करके इस लोक और परलोक में
विषाद को प्राप्त किया करता है । सम्पूर्ण धन के द्वारा राजा को अपनी
आयु की वृद्धि के लिए यत्न करना चाहिए । किसी भी क्रूर वार के
दिन अष्टमी और षष्टी तिथि में उत्तम नृप को अञ्जन, अभ्यञ्जन और
ताम्बूल का भी भोजन नहीं करना चाहिए ।
चन्द्रमा और सूर्य का ग्रहण अतीव सूक्ष्म होवे या पूर्ण हो तो राजा
को रक्तसूर्य का स्वयं अवलोकन नहीं करना चाहिए । जो उत्पात उत्पन्न
होता है चाहे वह दिव्य हो, भूमिगत हो या आकाशगत हो यत्नपूर्वक
उसे राजा को नहीं देखना चाहिए और यदि देख भी लेवे तो तीन दिन
भोजन नहीं करे । राजा सर्वदा मंगल रत्न को धारण करे और दूर्वा के
सहित ही पहने । राजा कभी भी वस्त्र से न ढके हुए शरीर को विप्रों
३९० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
के लिए न दिखावे । पानी में अपने मुख को न देखे, पर्वों में माँस न
खावे । खर, उष्ट्र, वासी और गुव्विणी पर आरोहण न करे । इस
प्रकार से नये शास्त्र से संयुत राजा चतुरंग को वर्धित करता हुआ अपने
आप की निरन्तर रक्षा करके सदा वीर्य का वर्द्धन करे । जो भक्ष्य बीज
के क्षय करने वाला होवे उसकी, भोज्य को, पानक, क्षार, शाक
आदि, बहुत खट्टे और बहुत तिक्त, (चरपरा) का वर्जन कर देना
चाहिए । कांसे के पात्र में और चाँदी के पात्र में स्थित तथा नदी का
जल मूत्र की वृद्धि करने वाला है तथा वीर्य के क्षय करने वाला है
इसको वर्जित कर देवे । ताम्र, लोहा, सुवर्ण, शीशा के पात्र में स्थित
तथा फल और चर्म में स्थित जल वीर्य की वृद्धि करने वाला होता है
ऐसे ही जल का यत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए । सम्पूर्ण मूल कृत्यों में
और सदाचारों में स्थित रहने वाला इस लोक में अनेक भागों का
उपभोग करके परम इन्द्र के स्थान को प्राप्त किया करता है ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-मुनियों में परम श्रेष्ठ और्व ने इस रीति
से राजा सगर को शासित किया था और उन्होंने सब शास्त्रों को गुह्यकों
को और सदाचारों को बहुत बार महात्मा सगर राजा को कह कर सुना
दिया । राजनीति, सत्पुरुषों की नीति और जो भी कुछ शास्त्रों में सम्भव
है संहिताओं में पुराणों में और जो आगमों के समुदाय में हैं राजा सगर
ने सभी कुछ धीमान् और्व के मुख से श्रवण किया था । हे द्विजश्रेष्ठ!
उनका कुछ उद्धृत करके कहा था । राजनीति, सदाचार, वेदों और वेदों
के अंगशास्त्रों से संगत विष्णु का रहस्य है । हे द्विज श्रेष्ठों उसका
वीक्षण कर लें । अन्य स्थल में जो नहीं कहा है अथवा संशय के सहित
का है, हे द्विजो! उनमें आप लोगों के लिए सम्पूर्ण संशयों का छेदन
करने वाला कालिका पुराण है । जो विप्र इसका निरन्तर अभ्यास
किया करता है वह वेदों के पठन का फल प्राप्त किया करता है ।
सदाचार वर्णन
ऋषियों ने कहा-संक्षेप से सदाचार और राजनीतियों में विशेष जो
और्व ने राजा से जिस तरह से कहा था वह आपके वचन से श्रवण
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३९१
किया है । फिर सबसे बाहुल्य विष्णुधर्मोत्तर तन्त्र में सदाचार देखना
चाहिए वह आपके ही प्रसाद से देखने के योग्य हैं । फिर जो हमको
संशय है जो पहले आपके ही द्वारा नहीं कहा गया है । हे विप्रेन्द्र ! उस
छेदन कीजिए । हम आपसे पूछते हैं । हमारे हृदय में बहुत ही अधिक
कौतूहल है । वेदों और लोक में भी यह सुना जाता है कि जो पुत्र रहित
है उसकी गति नहीं होती हैं । प्राचीन समय में वेताल और भैरव तप
के लिए पर्वत पर गए थे । पूर्व में वे दोनों ही दाराओं के ग्रहण करने
वाले थे । उन दोनों के पुत्र नहीं सुने गए हैं । हे द्विजोत्तम! वे ही उत्पन्न
नहीं हुए थे अथवा अनेक उत्पन्न हुए थे । उनका उत्तम स्थान में भली
भाँति से श्रवण करने की इच्छा करता हूँ । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-हे
द्विज सत्तमो! बिना पुत्र वाले की गति नहीं होती है यह निश्चित ही है ।
अपने पुत्रों के द्वारा अथवा भाई के पुत्रों द्वारा पुत्रों वाले स्वर्ग में गए
हैं । हे विप्रों! के द्वारा अथवा भाई के पुत्रों द्वारा पुत्रों वाले स्वर्ग में गए
हैं । हे विप्रों! वे दोनों उत्पन्न सन्तानों वाले वे धीर बेताल भैरव थे । अब
मैं उन दोनों के वंशों को बताऊँगा । हे महर्षि गणों! आप श्रवण
कीजिए ।
जिस समय में बेताल और भैरव दोनों भली-भाँति सिद्धि प्राप्त
करके कैलाश के प्रति हर्षित होते हुए बोध करने वाला यह तथ्य वचन
कहा था । नन्दी ने कहा-आप दोनों पुत्र सहित भगवान् शंकर के
आत्मज हैं । पुत्र के जन्म लेने में यत्न कीजिए । समुत्पन्न पुत्र वाले की
सर्वत्र सुलभ गति हुआ करती है । जो पुत्र से हीन पुरुष होता है वह
पुन्नाम वाले नरक को देखा करता है । उसका मोचन करने के लिए
तपों द्वारा तथा धर्म के द्वारा भी समर्थ नहीं हुआ करता है । केवल पुत्र
के जन्म होने ही से उस नरक के छुटकारा होता है । उस कारण से आप
दोनों ही देवयोनियों में पुत्र का उत्पादन करिए । आप दोनों की अमर्त्य
हैं । इस कारण से जैसे-तैसे भी सुरयोनियों में पुत्रों का उत्पादन करके
आप दोनों ही शिवा और शिव के प्रिय होंगे और अविलम्ब ही उनके
भवन को प्राप्त होंगे ।