सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 382

६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ३८५
में कीर्तित किया गया है । 'त्रातारम्', यह मन्त्र इन्द्र का परम प्रिय है ।
इस प्रकार करके दिवा के भाग में शक्र का उत्थापन करे । श्रवण नक्षत्र
से युक्त द्वादशी तिथि में राजा को स्वयं भरणी के अन्तिम चरण में
रात्रि में शक्र का विसर्जन करना चाहिए ।
हे नृप शार्दूल! इस कारण से नृप शक्र का विसर्जन का यह मन्त्र
कहा गया । सुर-असुर गणों के साथ पुरन्दर क्रतु इस उपहार को ग्रहण
कर, हे महेन्द्रध्वज! गमन कीजिए । सूतक के उत्पन्न होने पर भौम
अथवा शनिवार में, भूकम्प आदि उत्पात के हो जाने पर वासव को
विसर्जन नहीं करना चाहिए । उत्पात होने पर तथा उपप्लव के दर्शन
होने पर सात रात्रि को व्यतीत करके तथा शनिवार और भौमवार को
छोड़कर अन्य नक्षत्र में भी विसर्जन कर देना चाहिए । सूतक के
सम्प्राप्त हो जाने पर सूतक के अन्त में जिस किसी भी दिन में विसर्जन
कर दे ।
राजा के द्वारा उसी भाँति क्रतु की रक्षा करनी चाहिए जिससे हे
नृप शार्दूल! क्रतु पर शकुन पतन न करें । जब तक उसका विसर्जन
न हो । जिस प्रकार से आदि से उत्थापन हो धीरे-धीरे पातन करना
चाहिए । क्रतु के भग्न होने पर मृत्यु की प्राप्ति होती है । हे नृप!
अलंकारों के सहित विसर्जन किए हुए शक्रकेतु को रात्रि में अगाध जल
में निम्न वर्णित मन्त्र के द्वारा प्रक्षिप्त कर दे । हे महाभाग केतु! आप
विघ्नों के विनाश करने वाले हैं । समस्त लोकों के भव के लिए आप
जब तक सम्वत्सर हो जल में स्थित रहें । समस्त लोकों के आगे सूर्य
की ध्वनि के साथ उत्पादन करे और एकान्त में केतु का विसर्जन करना
चाहिए । यही पूजन में विशेषता है । इस रीति से महात्मा वासव की
जो पूजा किया करता है वह बहुत समय तक पृथ्वी का उपयोग करके
अन्त में वासव (इन्द्र) के लोक की प्राप्ति किया करता है । उसके
राज्य में कभी दुर्भिक्ष नहीं हुआ करता है और कहीं पर भी व्याधियाँ
तथा आधियाँ नहीं होती हैं तथा मनुष्यों की अकाल में कभी मृत्यु भी
नहीं हुआ करती है । पार्थिव! उसके समान अन्य कोई भी इन्द्रदेव का