कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 385, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३८८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
विशेष मैंने आपके सामने वर्णित कर दिया है और निषेध में विशेषों
का श्रवण कीजिए जिससे श्री के द्वारा इष्ट किया जाता है । भगवान्
विष्णु का भली-भाँति पूजन न करके तथा दान न देकर राजा को कभी
भी भोजन नहीं करना चाहिए । पुरोहितों के द्वारा नित्य अग्निहोत्र का
हवन करना चाहिए । अग्निहोत्र न करके भोजन करने वाला नरक की
प्राप्ति किया करता है । रत्नदीप से रहित अरक्षित गृह में राजा को स्त्री
के साथ शयन नहीं करना चाहिए और कभी वहाँ बैठना भी नहीं
चाहिए । अन्न खाकर श्रीफल का अशन न करके तथा नृप धात्री फल
को भी न खावें । माष, आसन और मृत्तिका ये सब बुद्धि का क्षय
करने वाले होते हैं ।
नृपों में उत्तम को प्रतिदिन बुद्धि के जो हेतु हों उन्हीं का भक्षण
करना चाहिए । राजा को यान पर विहीनआसन प्रारोहण नहीं करना
चाहिए । जो आसनों से हीन हो ऐसे यान पर, अश्व और हाथी पर भी
आरोहण नृप न करे । किसी भी समय में राजा एक अकेला निर्जन वन
में विचरण न करे । राजा को चाहिए किसी भी समय भोजन में मद
के कारण पदार्थ का अशन न करे । अष्टमी तिथि में कभी भी माँस
और मैथुन का सेवन न करे । दशश्राद्ध, गया श्राद्ध, तिलों से तर्पण,
वह राजा न करे जिसका पिता जीवित हो । ऐसा करके पाप को प्राप्त
किया करता है । राजा को राज्य पर क्षेत्रज्ञ तनयों का अभिषेक नहीं
करना चाहिए जबकि और सुपुत्र हो तो उसके होते हुए पितृगणों की
शुद्धि के लिए और सुपुत्र का ही अभिषेक करे । औरस, क्षेत्रज,
दत्तक, कृत्रिम, गूढ़ोत्पन्न अपविद्ध ये पुत्र भाग के योग्य हुआ करते हैं ।
कानीन् (कन्या से उत्पन्न), सहोढ़, क्रीत (धन देकर खरीदा हुआ),
पौनर्भव, स्वयंदत्त और दास, ये छः पुत्र पाँसुल होते हैं । पूर्व पूर्वों के
अभाव में दूसरों का अभिषेक करे । जो पौनर्भव स्वयंदत्त और दास हो
उसका कभी भी राज्य में योजन नहीं करे । दत्तक आदि पुत्र भी जो
निज गोत्र के द्वारा संस्कार किए गए हों वे अन्य के वीर्य से समुत्पन्न
हुए पुत्रता को प्राप्त हुआ करते हैं । पिता के गोत्र से राजा का जो पुत्र