कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२३
करना चाहिए । समाप्ति से हीन बीज है और बिन्दु-बिन्दु से संयुत
क्षिति बीज है इसको जान लेना चाहिए । यह चारों वर्गों का प्रदान
करने वाला है । फिर दर्पण, व्यंजन, घण्टा, चामर का प्रोक्षण करे ।
हे भैरव! यह प्रोक्षण पूर्व में कहे हुए नैवेद्य लोकमन्त्र के द्वारा करे ।
इनके बिन्दु और इन्दु से युक्त आद्य नामों के अक्षर हैं-तस्मै नमः
अर्थात् उसके लिए नमस्कार है, यह प्रांतः में, ग्रहण करना चाहिए ।
हे भैरव! वाग्भव के द्वितीय कामबीज से मुद्रा का बन्धन करना
चाहिए । मूल मन्त्र से दर्शन करे । मुद्रा का परित्याग तारा बीज के द्वारा
समाचरण करे । चन्द्र बिन्दुओं से प्रांतादि षष्ठ स्वर से संयुत जो है वह
ताराबीज कहा गया है जो धर्म अर्थ और काम का साधन होता है ।
क्योंकि वह मुद्रा अर्थात् आनन्द को दिया करती है इसलिए यह
मुद्रा-नाम से कीर्तित की गई है । मुद्रा दर्शित किए जाने पर पूजा का
समापन हुआ करता है । वह स्वयं काम, मोक्ष, धर्म, अर्थ और मोद
से समन्वित होती हैं । गमन करने के लिए अन्त में इन छः महामन्त्रों का
उच्चारण करना चाहिए और भक्ति मार्ग के द्वारा पत्र-पुष्प फल, जल
दिया गया है और जो नैवेद्य आवेदित किया गया है उसे कृपा करके
ग्रहण करिए । मैं आवाहन कैसे किया जाता है, यह नहीं जान पाता हूँ
और मुझे विसर्जन करने का भी ज्ञान नहीं हैं । मैं यजन के भाव को
भी नहीं समझता हूँ अतएव हे परमेश्वरि! मेरी आप ही गति हैं ।
कर्म, मन और वचन से आपसे अन्य मेरी कोई भी गति नहीं है ।
हे माता! जिन-जिन सहस्रों योनियों में मैं गमन करूँ, हे अच्युते! उन
योनियों में सदा आपके प्रति मेरी भक्ति होवे जो कभी भी च्युत न
होवे । देवी, दात्री, भोक्त्री यह सम्पूर्ण जगत् देवीमय ही है । देवी सर्वत्र
जय प्राप्त करती है । जो देवी है वह मैं ही हूँ । जो अक्षर परिभ्रष्ट हो
और जो मात्रा से हीन हो, हे देवी! वह सभी आप क्षमा कर देवें । कौन
ऐसा है जिसका मन स्खलित न होता हो । हे भैरव! इन मन्त्रों के पढ़े
जाने पर देवी स्वयं ही प्रसन्न हो जाया करती है और वह अविलम्ब ही
चतुर्वर्ग को प्रदान कर दिया करती है । ऐशानी दिशा में मण्डल की