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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 442 में से

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पृष्ठ 182

१८४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
निमग्न हो जाया करते हैं और देशों दिशाओं में जहाँ कभी भी जीवन
की रक्षा करते हुए परिभ्रमण करने लगते हैं । जिस समय में यज्ञ वाराह
के पुत्र त्रिविष्ट अर्थात् स्वर्ग को गमन नहीं किया करते थे । हे जगत्पते !
सभी पर्वत उस वाराह के पुत्रों ने शिखर पर क्रीड़ा करते हुए अधिक
भाग नीचे की ओर गया हुआ कर दिया था । इस प्रकार से विशेष
क्रीड़ा करते हुए उनकी क्रीड़ाओं से सम्पूर्ण जगत् हे वैकुण्ठ ! नाश के
भाव को प्राप्त हो जाता है । हे जगत् के प्रभो! उससे आप रक्षा
कीजिए ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-भगवान जनार्दन ने इस प्रकार से कहते
हुए उनके वाक्य का श्रवण करके भगवान ने देव शंकर से और विशेष
रूप से ब्रह्माजी ने कहा । जिसके लिए सभी देवगण और ये समस्त
प्रजा महान् दुःख को पा रहे हैं और यह सम्पूर्ण जगत् शीर्ण हो रहा
है । हे शंकर! मैं इस वाराह के शरीर को त्याग करने की इच्छा कर
रहा हूँ। निर्वेश में शक्त उसका त्याग करना स्वेच्छा से नहीं हो सकता
है । हे शंकर! अब आप यत्न से उसका त्याग कराइए । हे ब्राह्मण! आप
भी अपने नेत्रों से पुनः समर के विनाशक शिव को आप्याप्ति कीजिए
तथा सब देवगण भी शंकर को आप्यादित करें कि वे इस पौत्री का
हनन करने को उद्यत हो जावें । रजस्वला के संसर्ग से तथा विप्रगण के
मारने से यह शरीर पापों के करने वाला हो गया है । इस समय में
उसका त्याग करना युक्त होता है । यह पाप प्रायश्चितों के द्वारा ही दूर
होता है । अतएव मैं प्रायश्चित करूँगा । उसके लिए मेरा शरीर यत्न से
साम्यता को प्राप्त होवे ।
मुझे सदा ही प्रजा का पालन करना ही चाहिए । वह प्रजा नित्य
ही दुःखित हुआ करती है और वह मेरे ही द्वारा दुःखित हो रही है
अतएव प्रजा की भलाई के लिए मैं शरीर का त्याग कर दूँगा ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस रीति से वे दोनों ब्रह्मा और शंकर उस
समय में वासुदेव प्रभु के द्वारा कहे गये थे । तब उन्होंने वासुदेव प्रभु
के कहा था कि जैसा भी आपने कहा है वही मुझे सब करना ही