कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ० श्रीकालिका पुराण ॐ० १८३
हुआ करता है। आप ही पीताम्बर शंकर कमल से समुत्पन्न हैं। यह सब
आप ही हैं और अन्य कुछ भी नहीं है। आपके गुण गण हमारे द्वारा
चिन्तन करने के योग्य नहीं है। विधाता, हर और दिक्पालों के भी गुण
चिन्तन करने के योग्य नहीं हैं। भय से और भक्ति से आप आपकी
शरणागति से प्राप्त हुए हैं। हे विष्णो! आप हमारी रक्षा करिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से देवों के देव, भूतों के भावन
करने वालों के भी भावन इस रीति से स्तुति किए गए थे जो इन्द्रदेव
के सहित देवगणों के द्वारा स्तवन किए गये थे। मेघ के समान ध्वनि
वाले प्रभु ने उन सबसे कहा था। श्री भगवान ने कहा-जिस प्रयोजन
की सिद्धि के लिए आप लोग यहाँ पर समागात हुए हैं अथवा जो भी
कुछ भय आपको हुआ है अथवा वहाँ पर जो भी कुछ कार्य मुझे
करना चाहिए हे देवों! वह शीघ्र ही बतलाइए। देवों ने कहा-यह पौत्री
अर्थात् यज्ञ वाराह से क्रीड़ा से यह वसुधा अर्थात् पृथ्वी नित्य विकीर्ण
हो रही है और सभी लोक विशेष रूप से क्षुब्ध हो रहे हैं और वह
उपसान्त्वना प्राप्त नहीं कर रहे हैं। जिस प्रकार से सूखा हुआ तुम्बी का
फल घातों से जर्जरता को प्राप्त हो जाता है ठीक उसी भाँति यह भूमि
यज्ञ वाराह के खुरों के प्रहारों से जर्जरित हो गई है।
उसके जो तीन कालाग्नि के तेज से समान पुत्र हैं जिनके नाम
सुवृत्त, कनक और घोर हैं उनके द्वारा भी यह सम्पूर्ण जगत आपतित
हो रहा है। उनकी कर्दम लीलाओं से हे जगतों के पति! मानस आदि
सब सरोवर भग्न हो गये हैं और अभी भी प्राकृतिक स्वरूप को प्राप्त
नहीं होते हैं। महान बल वाले उनके द्वारा मन्दार आदि देवों के तरु
भग्न कर दिए गए हैं। हे देव! वे आज तक भी प्ररोह को प्राप्त नहीं
हो रहे हैं। जिस समय से वे सुवृत्त प्रभृति तीनों त्रिकूट पर्वत पर
समारोहण किया करते हैं। हे महाबाहो। वहाँ से वे प्लुति करके क्षीर
सागर में गिर जाया करते हैं। उस समय में क्षोभ को प्राप्त हुए सागर
के जल के समुदायों से यह सम्पूर्ण भूमि प्लावित हो जाया करती है।
उस समय में सभी मनुष्य उत्प्लवन को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जल से