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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

जम किंकर धर्म दूत हकारे। सत्तनाम सुन भागे सारें, जब सतगुरु
नाम उचारा है ॥ १३ ॥ गगन मँडल बिच उर्धमुख कुइया, गुरुमुख
साधू भर भर पीया । निगुरे प्यास मरे बिन कीया, जाके हिये
अँधियारा है ॥ १४ ॥ त्रिकुटी महलमें विद्या सारा, धनहर गरजे
बजे नगारा । लाल बरन सूरज उजियारा, चतुर कमल मंझार
शब्द ओंकारा है ॥ १५ ॥ साथ सोईं जिन यह गढ लीन्हा, नौ
दरवाजे परगट चीन्हा । दसवाँ खोल जाय जिन दीन्हा, जहाँ
कुलुफ रहा मारा है ॥ १६ ॥ आगे सेत सुन्न है भाई, मानसरोवर
पैठि अन्हाई । हंसन मिलि हंसा होई जाई, मिलै जो अमी
अहारा है ॥ १७ ॥ किंगरी सारंग बजे सितारा, अच्छर ब्रह्म सुन्न
दरबारा । द्वादस भानु हंस उँजियारा, षट दल कमल मँझार
शब्द रंकारा है ॥ १८ ॥ महा सुन्न सिंध विषमी घाटी, बिन
सतगुरु पावै नहि बाटी । व्याघर सिंह सरप बहु काटी, तहँ सहज
अचित पसारा है ॥ १९ ॥ अष्ट दल कमल पारब्रह्म भाई, दहिने
द्वादश अचित रहाई । बायें दस दल सहज समाई, यो कमलन
निरवारा है ॥ २० ॥ पाँच ब्रह्म पांचों अँड बीनो, पाँच ब्रह्म
निःअच्छर चीन्हों। चार मुकाम गुप्त तहँ कीन्हो, जा मध बंदीवान
पुरुष दरबारा है ॥ २१ ॥ दो पर्वतके संध निहारो भँवर गुफातें
संत पुकारो । हंसा करते केल अपारो, तहाँ गुरन दर्बारा है ॥ २२ ॥
सहस अठासी दीप रचाये, हीरे पत्रे महल जड़ाये। सुरली बजत
अखंड सदाये, तहँ सोहँ झनकारा है ॥ २३ ॥ सोहँ हृद तजी जब
भाई, सत्तलोककी हृद पुनि आई। उठत सुगंध महा अधिकार्ई,
जाको वार न पारा है ॥ २४ ॥ षोडस भानु हंसको रूपा, बीना
सत धुन बजे अनूपा । हंसा करत चैवर शिर भूपा, सत्त पुरुष
दर्बारा है ॥ २५ ॥ कोटिन भानु उदय जो होई, एते ही पुनि चंद्र