कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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श्रेदवाणी ।
शब्द ५०४—कर नैनों दीदार महलमें प्यारा है ॥ ८० ॥ काम
कोथ मद लोभ बिसारो, शील संतोष छिमा सत धारो । मद मांस
मिथ्या तजि डारो, हो ज्ञान चोड़े असवार भरम से न्यारा है ॥ १ ॥
धोती नेती बस्ती पाओ, आसन पदम जुगतसे लाओ । कुम्भक कर
रेचक करवाओ, पहिले मूल सुधार कारज हो सारा है ॥ २ ॥
मूल कँवल दल चतुर बखानो, कलिंग जाप लाल रंग मानो ।
देव गनेश तहैं रोपा थानो, रिध सिध चँवर दुलारा है ॥ ३ ॥
स्वाद चक्र षट्दल विस्तारो, ब्रह्म सावित्री रूप निहारो । उलटि
नागिनी का सिर मारो, तहाँ शब्द ओंकारा है ॥ ४ ॥ नाभी अष्ट
कमल दल साजा, सेत सिंहासन विष्णु बिराजा । हरिग जाप
तासु मुख गाजा, लछमी शिव आधार है ॥ ५ ॥ द्वादश कमल
हृदयके माहीं, जंग गौर शिव ध्यान लगाई । सोहैं शब्द तहाँ
धुन छाई, गन करै जैजैकारा है ॥ ६ ॥ दो दल कमल कंठके माहीं,
तेही मध बसे अविद्या बाई । हरि हर ब्रह्मा चँवर दुराई, जहैं श्रींग
नाम उचारा है ॥ ७ ॥ तापर कंज कमल है भाई, बग भौराँ दुइ
रूप लखाई । निज मन करत तहाँ ठकुराई, सो नैनन पिछवारा
है ॥ ८ ॥ कमलन भेद किया निर्वारा, यह सब रचना पिंड मँझारा ।
सतसँग कर सतगुरु शिर धारा, वह सत नाम उचारा है ॥ ९ ॥
आँख कान मुख बन्द कराओ, अनहद हिंगा शब्द सुनाओ ।
दोनो तिल इक तार मिलाओ, तब देखो गुलजारा है ॥ १० ॥
चंद सूर एक घर लाओ, सुषमन सेती ध्यान लगाओ । तिरबेनीके
संधि समाओ, भोर उतर चल पारा है ॥ ११ ॥ घंटा शंख सुनो
धुन दोई, सहस्र कमल दल जगमग होई । तामध करता निरखो
सोई, बंकनाल धस पारा है ॥ १२ ॥ डाकिनी बहु किलकारे,
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