कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 919, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(१०५)
नहीं जानै भूत प्रेत हठि हृदय धरै । तजि कपूर गांठी विष बाँधै
ज्ञान गंवाय मुगुध फिरे ॥ छीजे साहु चोर प्रतिपालै संत जनन
की कूट करै । कहहिँ कवीर जिह्वाके लम्पट यहि विधि प्रानी
नरक परै ॥ १७ ॥
शब्द ४०६-रामगुन न्यारो न्यारो न्यारो । अबुझा लोग
कहाँ लौ बूझैं बूझनहार विचारो । केते रामचन्द्र तपसी सो जिन
यह जग विटमाया ॥ केते कान्ह भये सुरलीधर तिन भी अन्त
न पाया ॥ केतिक सिध साधक संन्यासीजिन बनवास बसाया ॥
केते मुनि जन गोरख कहिये तिन भी अंत न पाया ॥ जाकी
गति ब्रह्मै नहीं पाई शिव शनकादिक हारे । ताके गुन नर कैसे
पैहो कहे कवीर पुकारे ॥ १८ ॥
शब्द ४०७-ए तत राम जपो हो प्रानी तुम बूझा अकथ
कहानी । जाको भाव होत हरि ऊपर, जागत रैन बिहानी ॥ टे० ॥
डाइनि डारे सोनहा डारे सिंह रहे बन घरे । पांच कुटुम्ब मिलि
जूझन लागे बाजन बाज घनेरे ॥ रोहु मिरगा संशय बन हाँके
पारथ बाना मेलै ॥ शायर जरे सकल बन डाहे मच्छ अहेरा
खेलै ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो जो यह पद निरवारै । जो यह
पदको गाइ विचारे आपु तरे अरु तारै ॥ १९ ॥
शब्द ४०८-कोइ राम रसिक रस पियहुगे सुख जियहुगे
॥ टे० ॥ फल अंकृतै बीज नहीं बोकला सुक पंछी रस खाई ।
चुवै न बुंद अंग नहीं भीजै दास भँवर सँग लाई ॥ निगम रसाल
चारि फल लागै तामैं तीन समाई । एकहै दूरि चहै सब कोई
जतन जतन कोई पाई ॥ गयउ बसंत ग्रीषम ऋतु आई बहुरि
न तरुवरतर आवै । कहै कवीर स्वामी सुख सागर राम मगन
है पावै ॥ २० ॥