कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
जो न तरे । गहि परतीति कीन जिन जासों सोई तहैं मरे ॥ जो
कहु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझ स्याना । कहैं कवीर तासों
का कहिये देखत दधि भुलाना ॥ १४ ॥
शब्द ४०३—रामरा चली बिनावन माहो । घर छोड़े जात
जोलाहो ॥ टे० ॥ गज नौ गज दस गज उनइसकी पुरिया एक
तनाई । सात सूत नौ गाड़ बहतारि पाट लागु अधिकार्ई ॥ तापट
तूल न गजन अमाई पैसन सेर अढार्ई । तामैं घटै बढै रतिओ
नहीं करकच करघ रहाई ॥ तिन उठि बैठ खसम सो बरबस
तापर लागु तिहाई । भीनी पुरिया काम न आवे जोलहा चला
रिसार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो जिन यह सूधि उपाई, छाड़ि
पसार राम भजु बौरै भवसागर कठिनाई ॥ १५ ॥
शब्द ४०४—रामरा झीझी जंतर बाजे । कर चरन विहूना राजै
॥ टे० ॥ कर विनु बाजे सुने सरवन विनु सरवने सरोता होई ।
पाटन स्ववस सभा विनु अवसर बूझे सुनि जन लोई ॥ इंद्रि
विनु भोग स्वाद जिह्वा विनु अच्छय पिंड विहूना । जागत चौर
मंदिर तहैं मूसे स्वम्भ अच्छत घर सूना ॥ बीज विनु अंकुर पेड़
विनु तरुवर विनु फूले फल फलिया । बांझके कोख पुत्र अव-
तरिया विनु पग तरुवर चढिया ॥ मसि विनु द्राइत कलम विनु
कागज विनु अच्छर सुधि होई । सुधि विनु सहज ज्ञान विनु
ज्ञाता कहैं कवीर जन सोई ॥ १६ ॥
शब्द ४०५—राम गाइ औरन समुझावे, हरि जाने विनु विकल
फिरे ॥ टे० ॥ जा मुख वेद गायत्री उचरे तासु वचन संसार तरे ॥
जाके पांव जगत उठि लागे सो ब्राह्मन जिव बद्ध करै ॥ अपना
ऊंच नीच घर भोजन धीन कर्म करि उदर भरै । ग्रहन अमावस
ढुकि ढुकि मांगै कर दीपक लिये कूप परै ॥ एकादशी व्रती