कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 833, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(८११)
पेटमें, माखन हाट बिकाय ॥ एक अचंभा हमने देखा, गढ़ाके
सिर सींग ॥ चींटीके पग डोरी लागे, खैंचे अर्जुन भीम ॥ कहें —
कबीर सुनो भाइ साधू, या पद है निरबान ॥ या पदका कोई
अरथ लगावे, सोई संत सुजान ॥
शब्द १५०-बानी छोड़दे अभिमानी ॥ टे० ॥ जे भईयाके गरब
करत थे, सोई भये अगवानी ॥ जे सायरके गरब करत थे, तापै
सिला उतरानी ॥ जे लंकाके गरब करत थे, सोई भये धुरधानी ॥
कहे कबीर सुनो भाइ साधू, शब्द लेउ पहिचानी ॥
शब्द १५१-अवधू कौन देश निज डेरा । तेरो हंसा लेत बसेरा
॥ टे० ॥ कौन देश है कौन दिशा है, कौन आपहो साई ॥ कौन
महलकी टहल करत हो, कहो खबर केहि ताई ॥ नर नारीके गरभ
भोगते, सहजे काया पाई ॥ की तुम जनमें मात पितासे, की
बीचहि आन समाई ॥ चित्रगुप्त जब लेखा मांगे, बहु बल रूप
सँवारा ॥ गोच केबार बांध फटकारे, अगिन कुंड ले डारा ॥
मझधार नइया डोलन लागी, अजहूं खेव सबेरा ॥ कह कबीर
अबकी बेर चेतो, तब मिटिहैं जम जेरा ॥
शब्द १५२-दोय दिन खेल ले यह खेला ॥ ये तो नदी नावको
मेला ॥ टे० ॥ कौड़ी कौड़ी माया जोरे, संग न जाय तेरे घेला ॥
और जनम बहुतेरे पावौ, मानुष जन्म दुहेला ॥ मात पिता सुत
कुटुम्ब कबीला, संग न जाय तेरे भेला ॥ चार वेद षट्शास्त्र पुकारें,
संत न देहैं हेला ॥ कहें कबीर सुनो भाई साधो, गतीका विरद
दुहेला ॥
शब्द १५३-तुझे बोलनकी सुध नाही रे ॥ टे० ॥ चंद चढे कुल
आलम देखे, मैं देखों तेरे ताई रे ॥ दुनियां पूजे पीर पैगम्बर,
मैं पूजों गुरु साई रे ॥ काम क्रोध अभिमान भरो है, कालके फाँस