कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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टुक हंस दे टुक रोय ॥ माता हस्ती झूलदो हो, आहूँ पहर
खुसाल । चेला दास कवीरदा, पद गावे कमाल ॥
राग काफी १६-गलताना मता जब आवैगा, तब जीवड़ा सुख
पावैगा ॥ टे० ॥ अचार विचार छुटे या जिवका, डुरमति दूर
नसावैगा ॥ माया मोह भरमके बादल, परदा खोलि बहावैगा ॥
पांच पचीस करो बसि अपने, सतगुरु सबद लखावैगा ॥ रहनि
गहनिकी नाव सवारी, तब भव पार सिधावैगा ॥ हंस सुजन जन
बहुरि मिलैंगे, साहिबका गुन गावैगा ॥ अमरलोक इम्रतकी काया,
तहाँ बड़ा सुख पावैगा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो, यह तत
विरला पावैगा ॥
अथ मंगल प्रारम्भः ।
मंगल १-तन मन सुरति विचारि तो बात जनाइये । तुम प्रभु
दीन दयाल सो ब्याह रचाइये ॥ वेद बुधि करि विधिसों चौक
गुराइये । विषम भरम सब मेटिकै कलश धराइये ॥ त्रिकुटी
छाजै बैठि नगर खलबल परी । गावत मंगल चार लगन हाथै धरी ॥
काम क्रोध दोउ काटिके खम्भ बनाइये । सत्सुकृतके बाँसन मंडप
छाइये ॥ सुरतिको घुडिला पलानि चित चाबुक लियो । अनहद
बाजो बजायके ब्याहन चढि चल्यो ॥ शीलको खड़ग बँधाय
छिमाको मौरिया । चले अमर पुर जाय धनीकी पौरिया ॥
ब्याहै सदगुरु आप सवारे हेतियो ॥ कहै कवीर सतिभाय अमर
घर चेतियो ॥
मंगल २-दीननके हो दयाल भगतिकी पन करौ । सरन आयकी
लाज गई साहिब जिनि करो ॥ नऊ द्वार बिकार थार नौका वगे ।
मेरी सुरति नहीं ठहराय लगन केमे लगे ॥ पांच तत गुना तीनका
सावर साजीया । जम राखे बिलमाय तो फंदन फादिया ॥ त्रिगुन