कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 774, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७६०)
कबीरपंथी—
सुनि लीजे, करि गुजरान गरीबीमें ॥ प्रेम नगरमें रहन हमारी,
भली बनि आई सबूरीमें ॥ कहैं कबीर दया सतगुरुकी, पाई
भगति जगीरीमें ॥
राग काफी १२—दिल मगन भया जब क्या बोलै ॥ टे० ॥ तेरा
साहेब है तुझ माहीं, बाहर नैना क्या खोलै ॥ मान सरोवर हंसा
बासी, डाबर डाबर क्या डोलै ॥ सुरति कलाली भयी मतवाली,
अमृत पाया बिन तोलै ॥ हस्तीकी चाल चलु मन मेरा, बाहर
भीतर क्या डोलै ॥ कहैं कबीर अलमस्त फकीरा, साहेब पायो
तिन ओलै ॥
राग काफी १३—दिल मगन भया अनहद बासी ॥ टे० ॥ अड-
सठको फल जान लियो है, खोजि लई काया कासी ॥ अष्ट सिद्धि
नौ निधि आगे ठाढी, जुगन जुगनकी है दासी ॥ बिन ब्याई जहाँ
काम घेतु है, दूझत है बारह मासी ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधो,
गगन मंडलका है बासी ॥
राग काफी १४—मेरी लगन साहेबसो लागी है ॥ टे० ॥ बन्धन
काटि किया गुर मुकता, जरा मरन भरम भागी है ॥ जबसे दया
भई सतगुरुकी, लोक लाज कुल त्यागी है ॥ गुरुकी दया साधुकी
संगत, अमर लोक लौ लागी है ॥ सुरति निरति दोष भइ मत-
वारी, प्रेम सुधा रस पागी है ॥ एक नाम बिन और न दूजा,
कहैं कबीर बड भागी है ॥
राग काफी १५—फकीरोंदा हाल यह हानी ॥ टे० ॥ गोदडी
गुरु ज्ञान दी हो, दया दी कफनी । कमर मंतंगा जतदा, माथे
तिलक उनसुनी ॥ धूनी धीरज ध्यान दी हो, सेली सुरति अपार ।
फावडी गुरु ज्ञान दी हो, चित्त लगदा दसवें द्वार ॥ अन्तर तुरिया
झूलदा हो, मरम न जाने कोय । जग विच दीसा बावरा हो,