कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 728, कुल 968 में से
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कवीरपंथी—
तपी संन्यासी, दिगंबर दरबेस । सनक सनंदन सबही बांधे, काहु
न पायो भेश ॥ तेंतिस कोटि देवता बांधे, माया रसरी डार ।
कहैं कवीर तेई जन बांचे, चीन्हा शब्द हमार ॥
शब्द चाचर ।
चाचर मची अब हो हो खेल जिन चाचर माहीं ॥ टेक ॥
चाचर खेलें दोय जने एक मन औ माया । पंथ चलन नहिं पावै
बहु द्रन्द्व मचाय ॥ लोभ मोहकी पिचकारी मारो चतुरा ज्ञानी ।
सुर नर सुनि सबही छले जेते अभिमानी ॥ डफ कपटही बाजे
सही बहु जग भरमाई । तृष्णा लागे खेलई सम्हरा नहीं कोई ॥
काम क्रोधकी अरगजा सब अंग लगीई । आशा तो चहुँ दिशि
फिरे सब सुधि बुधि खोई ॥ नाना रंग बनायके नाचे मन माया ।
ठांव ठांव फंदा रचे कोई जान न पाया ॥ अंग अनेक दिखायके
सबही जग खाया । मचे खेलके आंधरे काहु मरम न पाया ॥
षट् दरशन सब खेलहीं बहु भेष बनाई । मन रंगीके खेलमें सबही
बिलमाई ॥ पंडित वेद पुरानको पढ पढ अरथावैं । शेष सहस
मुख गावहीं कछु भेद न पावैं ॥ तीर्थ व्रत जग लागिया धावै
चहुँ ओरा । देवी देवल देवता खेलैं सब ठौरा ॥ सुख संपतिके
कारने अरुझा सब कोई । अंतकाल औसर परे कोई संग न होई ॥
पछा पछी सब खेलहा बहु भरम झुलाने । वार पारकी सुधि नहीं
कथनी लपटाने ॥ जाके जो कछु मन बसे वह वाही माने । सत
शब्द चीन्हें नहीं बहु झगरा ठाने ॥ सांचेको माने नहीं जिह्वाके
लपटी । वादिनकी कछु सुधि नहीं जम मारे झपटी ॥ मन मायाके
रंगमें सबही ये भूले । चौरासीके खेलमें सदा जोनी झूले ॥
सतगुरु शब्द पुकारिया खेलै जो कोई । भौसागरके भय नहीं फिर