कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 673, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(६५९)
अंग ॥ चित अमी रस पिये अघाय । अहं कृत तब चित मिटाय ॥
सुरति लिये सोहं जाप । कुमति काम तजि भय संताप ॥ जीव
सीव है ब्रह्म आप । सहज मिटि तन मनकी ताप ॥ द्वैत मिटी
निज पदको पाय । यह सतगुरु सतपद लखाय ॥ तन मन मन
तन रह्यो छाया । ततलौ वित वित तत समाय ॥ तूं पद ततको
छुटचो धंध । पाय धाम पद नित अनंद ॥ कहै कवीर आनंद
कंद । स्थिर घर मिलि भान चंद ॥
वसंत २०—सदा वसंत मन राखो थिर । मेटि कल्पना धरो
धीर ॥ टेक ॥ काया नगर बसि करि विलास । आपा चिन्हो
तजि सकल आस ॥ झूठी आसा तनको नास । ताते जगत है
काल त्रास ॥ कहा भवर होय फिरौ उदास । यहि संपुट देखो
कमल वास ॥ चारि पहरको रंग रास । सुरझत कमल करि ले
हुलास ॥ केतिक है तेरे जिवको त्रास । घोखे लेत कयों अनत
बास ॥ तूही फूल तूही अगर बास । का द्वंद्वै बन बन होय उदास ॥
अजहूं चेत है तन में स्वास । सुरति सुमति गुन राखि पास ॥
सकल मही गुरु है निवास । अटल राज जुग जुग विलास ॥ हरष
शोक नहीं भूख प्यास । रैन दिवस नहीं सदा उजास ॥ सही
धाम निरमल शरीर । सदा अखंडित कहै कवीर ॥
वसंत २१—कहा अरुझि रहै मायाके जाल । निसि दिन जीवको
संशय काल ॥ टेक ॥ अनंत भूप अलेख साध । सिद्धि न पाई
गये अगाध ॥ भरम मिल्यो नहीं मिटी व्याधि । ब्रह्म ब्रह्म रटि
ठान्यो वाद ॥ ब्रह्म कौन कहु मन है कौन । कौन शब्द कहु कौन
पौन ॥ भिनि भिनि करि त्यागये भौन । भरम रच्यौ जिमि
पानी लौन ॥ प्रगट सिद्धिपात लखै जो कोइ । सर्व यथा भरि
पूरि सोइ ॥ बीज विरछ यक संग जोय । जस चंदा एक संग