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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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कवीरपंथी—

अमृत निरवारो भेद । छोड़ो बाद विवाद खेद ॥ जो विष खाये
सो परलय होय । विन अमृत नहीं बाँचे कोय ॥ था औसर तू
मुट मान । सत शब्दको गहो प्रमान ॥ मिलि सतगुरु सो खेलो
खेल । जरा मरनकी मिटे जेल ॥ कहैं कवीर गहो सत भाव ।
बहुरि न ऐसो पावो दाव ॥

वसंत १७—बाबासो जोगी जाके सहज भाव । अकलि प्रीति की
जिच्छा खाय ॥ टेक ॥ शब्द अनहद सौगी नाद । काम क्रोध
विषीयान बाद ॥ मन सुद्रा जाके गुरुका ग्यान । त्रिकुटि कोट
में धरै ध्यान ॥ मन करनीको करै अस्नान । गुरुको शब्द लै
धरै ध्यान ॥ काया काशी खोजौ बास । ज्योति स्वरूप जहाँ
भयो परकास ॥ ग्यान मेखला सहज भाव । वंक नालि कौ रसहि
खाय ॥ जोग मूलका देत बंद । कहैं कवीर थिर होय कंद ॥ १७ ॥

वसंत १८—मगन रूप निरखत वसंत । विविधि प्रकास महिमा
अनंत ॥ टेक ॥ सरवन सुनत सोहं ग्यान । रसना बरनत आपु
ध्यान ॥ नेत्र छकै लखि आप रूप । वरनत अमि छवि अति
अनूप ॥ भोग नासिका सुखद वास । हिरदय कमलकी लै सुवास ॥
तुचा मेल कियो नासा संग । संग समान कियो परसंग ॥ ध्यान
लिये है प्रेम प्रीति । सेवा बंदन संत रीति ॥ विषय पंथ नहीं
चाले पाय । सुखित धाम बसि कहूं न जाय ॥ दरशन दरसत
आप ब्रह्म । जल घटमें जल मध्य विम्ब ॥ तेज जोतिमें जोति
तेज । विलसत सुख यह अमर सेज ॥ कहै कवीर मन मगन
ग्यान । सोधि शब्द लेहु तत छान ॥ प्रान पिंडमें पिंड प्रान ।
शब्द रीति ब्रह्मत सुजान ॥

वसंत १९—चेतन रूप निरखत वसंत । प्रेम अमीरस आदि
अंत ॥ टेक ॥ मन अज्ञा बस प्रेम संग । बुधि अस्थिर गति एक