कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 629, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(६१५)
निरगुन कथ गल डारें कंथा ॥ नौधा भगतिका भेद बतावें ।
चौका आरति और करावें ॥ जमते तिनका बहुर तोड़ावें । शरीर
अर्थ नारियर अरपावें ॥ निहअक्षर निरगुन निरवाना । लैके जाय
जवे निनाना ॥ पान परवान सनंद जब पावे । अधर दीप तब
जाय समावे ॥ निरगुन निराकार निज जोई । अलख निरंजन
जाने सोई ॥ जो परवाना पावे भाई । अमरलोक सोह जाय समाई ॥
सोरहें भान तेज सो होई । वाकी सुरत करे सब कोई ॥ ऐसे कह
कह जग भरमाया । सबै जीव यहि भांति ठगाया ॥ वे व्योहार
सुने मन माना । यही कहें मोहिं वा घर जाना ॥ घर घर झालर
झाझ बजावें । निहअक्षरकी लीला गावें ॥ वहांसे उतर यहां जिव
आया । यहां वहां कछु भेद न पाया ॥ कहे मैं कहो सो न समझे
कोई । शब्द हमार न चीन्हे लोई ॥ जो कोइ सुरतवंत होय सांचा ।
काल मिटावे मनसा बाचा ॥ सुवना सेम्हर बहुत दिढाया । ऐसे
कह कह मान उतराया ॥ सुवना सेम्हर त्यागो भाई । यही
छुगली पर बैठो आई ॥ सुगना सुरत कीन जिव सांचा । सेम्हर
त्यागो मनसा बाचा ॥ उड़ सुगना छुगली पर आई । छुगली
प्रीत कीन्ह चितलाई ॥ वही सेय पाई तहँ हरुना । जबहिं निरासा
उड़ सुवना ॥ ऐसे जीव भूल भटकाया । आरति चौका बहुत
कराया ॥ देहै त्याग जैहै यहि लोका । सत्तनाम सुमिरो नहिं सोका ॥
बारह बाट कीन जिव भाई । समता नाहीं लोग लुगाई ॥ झूठी
बनिज करो मत कोई । सांचा शब्द परखो निज सोई ॥ जीवन भई
भर्मकी फांसी ॥ सुये मुक्ति कौन उदासा । अच्छर अमर वो
छर है माया । यहीते सब जगत डराया ॥ ज्योंका त्यों छर अक्षर
भाई । बिना बूझ सब जगत डराई ॥ ये तो सबे चढे ब्रह्मण्डा ।
भये झूठ सबही पाखण्डा ॥