कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 628, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(६१४)
कवीरपंथी—
गावैं प्रानी ॥ क्षर अक्षर निअक्षर गावे । तत्त्व माहिं निज धर्म
बतावे ॥ अमी शरीर नांद औ बिंदा । निहअच्छर पुरुष तहैं करे
अनंदा ॥ सुन्न परे निज धाम बताया । निरगुन पुरुष तहां ठह-
राया ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर थाके । सुर नर सुनि तहां कोइ न राखे ॥
सब बातनते रहैं निनारा । निहअच्छर पुरुष जान अपारा ॥
हिंदू तुर्क दोऊ यक बानी । निहअच्छर पुरुष न कोऊ जानी ॥
निरगुन सोइ निअक्षर जोई । लखे न वाको चले सब कोई ॥
छर कहे माया अच्छर प्राना । निहअच्छर निरगुन निरवाना ॥
बस्ती उजार उजार बसावे । छर अच्छरकी खबर न पावे ॥
समै--छर अच्छर दोनों नहीं, निहअच्छर निज नाम । सुन्नके परे
मुकाम है, सो जानो निज धाम ॥ सुन्न परे एक शिखर है, तापर है
एक ठांव । तहांते हंसा आइके, जीव धरायो नाव ॥ शिखर परे
निज धाम है, शब्द उठे गंभीर । तहांते हंसा आइके, भये वीर
कवीर ॥ घरको छोड़ बाहर चले, निहअच्छर जहं नाम । कहैं कवीर
पुकारके, द्वादस गये निज धाम ॥ निहअच्छर निजधाम है, तो सुन्न
परे है नाहिं । सुन्न परे निज सुन्न है, निरगुन पुरुष वहां नाहिं ॥
रमैनी २२५--षट् दर्शन मिल कर बिचारा । आपन आपन
मत कीने न्यारा ॥ औ पंथ अनेक हैं भाई । अपन अपन मत
सबे बताई ॥ अपनी अपनी कथा बतावैं । करताका अस्थान न
पावैं ॥ जोगी कहैं जोग करो भाई । अलख पुरुष तब देइ दिखाई ॥
जैन कहैं करो पारस पूजा । पारसनाथ पर देव न दूजा ॥ सन्यासी
कहैं तत्त्व जो जारी । सच्चिदानन्द मिले त्रपुरारी ॥ जंगम कहैं
करो शंकर सेवा । संकरनाथ पर और न देवा ॥ दरबेस कहैं चार पर
आवैं । अल्लह तब लाहूत दिखावैं ॥ ब्राह्मण कहैं वेद जो जाने ।
वेदकी रीत ते ब्रह्म पहिचाने ॥ यहि विधि कहैं जहां लो पंथा ।