कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
निनारे ॥ ज्यों कंवला जल परसत नाहीं । त्यों साधू रहते
जग माहीं ॥
समै-जग बांधा जंजीर कर्मके, छूटा नाहीं कोई ।
कहैं कवीर बंधा नहीं, साध जानिये सोई ॥
रमैनी ११२-गुरुवा सिधु राम कहाई । इन संसार ठगा सब
भाई ॥ बैठ एकंत पाखंड बताया । निरगुन सरगुन दोय भेद
बताया ॥ निरालम्ब आलम्ब न सांगा । कहैं जलाते हम बितरागा ॥
अंतर भरम मिटे नहीं भाई । निसदिन रहो निरंकार समाई ॥
सब जग मिलके सीस नवावे । तब गुरुवा एक बचन सुनावे ॥
यहि जगते हरि रहा निनारा । विरला कोई बूझन हारा ॥ ब्रह्मा
विस्तु महेश्वर देवा । तिनहु लखा नहीं यह भेवा ॥ ऐसा बचन
कह जग भरमाया । यहि गुरुवाका भेद न पाया ॥
समै-रामनगर गुरुवा बसा, माया नगर संसार ।
कहैं कवीर यहि दो नगरते, विरले बचे विचार ॥
पाप पुन्य गुरु कर्म हरि, वैकुंठ लोक निजधाम ।
ये तो सब ऊपर परे, बूझो आतमराम ॥
रमैनी ११३-जात पांत तज मूँड़ मुँडाया । तिलक छाप दे
भगत कहाया ॥ मूँड़ मुँडाय गुरु होय खेला । नर नारी सब
कीन्ही चेला ॥ भये महंत सिखापन कीन्हा । निरगुण मंत्र पाठ
लिख दीन्हा ॥ सेवा पूजा बहुत बताई । तन मन धन लीन्हो अरपाई ॥
करताको अकरता बतलाया । अकरता सो करता लौ लाया ॥
समै-करता ते यहि भयो अकरता, गुरुवाके उपदेश ।
कविरा कोइ लावे नहीं, करता केर संदेस ॥
रमैनी ११४-जो ब्रह्माको दियो संदेशा । सो विरंच गुरु दियो
उपदेशा ॥ धाती चौका मंत्र असनाना । फूलसुं भूषण देव रचाना ॥