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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(५७५)

जहां बसें ये दोनों नारी, तहां नहीं विश्राम ।
कहें कवीर इनको संग छाड़ो, यही तुम्हारो काम ॥

रमैनी १०९-षट् दर्शन सुनो चितलाई । करताके गुण चेतो
भाई ॥ दयावंत शीतल मुख बैना । धर्मसरूप सदा सुख चैना ॥
निहकर्मो निरद्वंद सुधर्मा । सदा संतोषी कर्म सुकर्मो ॥ सब जीवनकी
करे नित चिंता । मतबादी धीरज अतिवंता ॥ सदा अनंद धीरज
दुख संसा । कोमल बचन सरब गुण हंसा ॥ चेतन सदा सरब
कछु सूझे । परगट गुपुत सब ज्ञाने बूझे ॥

समै-अनखाया खानीको पीवे, देखे सुने हजर ।
नख सिखते पूर्ण बना, तासो कहत जग दूर ॥
सब गुन भरा सृष्टिका करता, निरगुन कहो नकोय ।
कहें कवीर प्रगट जग भीतर, भर्मत पुरुष औ जोय ॥

रमैनी ११०-षट् दर्शन सुनो बचन हमारा । उनके गुन हैं
अगम अपारा ॥ मिथ्या बचन संसा विपरीता । खज अखजसे
बहुत प्रतीता ॥ निर्दया अमती अकर्मो । सदा अधीरज सदा
अधर्मा ॥ कामवंत तामसकी खानी । नाटक चेटक अगमठानी ॥
सदा निलज्ज दयामें हीना । छल औ छिद्र महा प्रवीना ॥ चञ्चल
चपल निरमती माया । अधिक गिरामनी सब जग खाया ॥

समै-सुर नर मुनि पशु पंछी मारत, डार आपने जाल ।
कहें कवीर यह महा अपर्वल, विरले बांचे विचार ॥

रमैनी १११-करता सबका सिरजनहारा । जान बूझके होते
न्यारा ॥ जलगी सदा जलहिमें रहते । उडरान सदा जल मध्य
दिखते ॥ जलगीरी पकड़ जाल जब आये । जब जलगीरी यहै
सब चितलाये ॥ हम जानीकी साथ हमारे । अब हम जाना हते ।