कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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तुम लीन उबारी ॥ २ ॥ अब चौका भेद कहो सुहि स्वामी ।
काहि कहहु तिनका सुख धामी ॥ जो तुम कहौ करौ मैं सोई ।
तामहँ फेर न परिहैं कोई ॥ ३ ॥
कबीर वचन ।
गेही भक्ति आरति आने । प्रति पाख आरती ठाने ॥ प्रति पाख
आरति नहीं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥ ४ ॥ पाख
दिवस नहीं होवे साजू । प्रति पूनोकर आरति काजू ॥ पूनो पान
लेइ धर्मदासा । पावे सिष होय सुख बासा ॥ ५ ॥ चन्द्र कला
बोडस पुर आवे । ताहि समय परवाना पावे ॥ यथाशक्ति सेवा
सहिदाना । हंसा पहुँचे लोक ठिकाना ॥ ६ ॥
धर्मदास वचन ।
धर्मनि विनय करी कर जोरी । होइ प्रभु अब दयाल बहोरी ॥
आरति चौका किहि विधि होई । काकासाज लगे प्रभु सोई ॥ ७ ॥
कबीर वचन ।
आरति साज धर्मनि सुनो, तुमसे कहौ बखान ।
विधि विधान ते जो करे, पावे सुक्ति ठिकान ॥ १ ॥
धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भाग चले जमराजा ॥
सात हाथको वस्तर लाओ । स्वंत चँदेवा वस्त्र तनाओ ॥ १ ॥
घर आँगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ ।
तापर आँटाको चौक पुराओ । सवा सेर तन्दुल लै आओ ॥ २ ॥
स्वेत सिंधासन तहां विछायी । नाना सुगन्ध धरू तहँ लायी ॥
स्वेतै मिठाई स्वेतै पाना । पूंगी फल स्वेतहिं परमाना ॥ ३ ॥
लौंग इलायची कपूर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥ जिब
पीछे नरियर लै आओ । यह सब साज सु आनि धराओ ॥ ४ ॥
संत साधु को बैठक दीजौ । यथा शक्ति सन्मान सु कीजौ ॥ करि
कबीरपंथी- शब्दावली १३