कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
आरति सतगुरु लौ लाओ । भावभक्ति बहु प्रीति बढाओ ॥६॥
चरण धोइ चरणामृत लीजो । शरधा सहित सुपूजन कीजो ॥
विनु शरधा नहिं आरति कीजे । अनशरधा तहैं काल भनीजे ॥
६ ॥ अनशरधा अगुवानी जहैंवाँ । काल बसे नहिं सतगुरु तहैंवाँ ॥
शरधा प्रेम बसे जेहि ठाकैं । सोई जानो सतगुरु गाकैं ॥ ७ ॥
कहैं कवीर धर्मनि सुनो, शरधाको व्यवहार ।
विनु शरधा नहिं पाइये, सत् लोक निज द्वार ॥ २ ॥
शरधा ते सतगुरु सन्माने । यथाशक्ति द्रव्य लेह आने ॥
नाना वासन वस्त्र विधाना । सोना रूपा बहुविधि नाना ॥ १ ॥
कपट छोड़ि शक्ति निज देखे । परमार्थ स्वार्थ बहुविधि पेखे ॥
गुरु पूजा संतन सनमाना । पहिलि विधि आरति कर जाना ॥ २ ॥
नारि पुरुष सबहीं इकठाईं । ले नरियर सब सन्मुख आईं ॥ सह
मरजाद सु सीस चढावे । सतगुरु ध्यान मगन हूँ जावे ॥ ३ ॥
सतगुरु आज्ञा देह चढाईं । इक टक दृष्टि गुरु पहुँ लाईं ॥ मोरत
नरियर बास उडावे । जमका पला तुरत छुट जावे ॥ ४ ॥ साँचा
सतगुरु साँचा चेला । साँचहिं साँच भया इक मेला ॥ घटका
परिचय सतगुरु देवे । देही देह परख कर लेवे ॥ ५ ॥ दूजा मेटि
एक लौ लावे । देखत काल तुरत मरिजावे ॥ काल दयाल को
जाने भेवा । जो सतगुरु सोई निज देवा ॥ ६ ॥ पूजा दूजा
काल पसारा । बिना एक नहिं होय उबारा ॥ चौका आरति
भेद बतावे । छाड़ि अनेक एक लौ लावे ॥ ७ ॥
कह कवीर धर्मनि सुनो, यह चौका बिस्तार ।
गुरु कृपासे छूटईं, ततछन काल पसार ॥ ३ ॥
पान प्रसाद गुरु ते पाईं । सह परिवार भक्ति चित लाईं ॥
आरति ज्योति घरे घर फेरे । कंटक काल सबहिं खदेरे ॥ १ ॥