कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथो—
मैंने देखो० ॥ न्याय मीमाँसा सारुय पतञ्जल, वैशेषिकहू विचारी।
प्रक्रिया सहित वेदान्त व्यासकृत, षट दर्शन निधारौ ॥ परख
वाकी सबसे है न्यारी ॥ मैंने देखो० ॥ शिव सनकादि और
ब्रह्मादिक, गौतम शुक् ब्रह्मचारी। गोरखदत्त वशिष्ठ श्रेष्ठ जग,
ये महान आचारी ॥ बुद्धि इन सबकी हारी। मैंने देखो० ॥
निज पदके रंग बोरि दियो मोहि, आंति भेद सब टारी। तापर
ज्ञान गुलाल सुरङ्गी, मारि कुम्कुमन डारी ॥ भरमकी अँगिया
फारी ॥ मैंने देखो० ॥ धर्मिनि गुरुके चरण कमलपर, तन मन
धन सब वारी। बजन लगी तिहुँ लोक बधार्ई, मँगन लगी
फगुवारी ॥ भक्ति मोहि दीजे तुम्हारी। मैंने देखो० ॥ १५ ॥
आज निज घटबिच फाग मचैहों। तजि मोह मान करूणा
निधानके, ध्यान चरणमें लगैहों ॥ टे० ॥ यक स्वर साधि तँबूरा
तनको, स्वासके तार मिलैहों। मोद मृदंग मँजीरा मनसा,
विनयको बीन बजैहों ॥ भजन सत नामको गैहों ॥ आज निज० ॥
भक्ति उमंग रंग केसरको लै प्रभुपै ढरकैहों। प्रेम सनेह गुलाल
अरगजा, उन्हींके शीश चढैहों ॥ सुरतिकी सुरति बनेहों ॥ आज
निज० ॥ सार विचार शृंगार साजि मति, सन्मुख आनि नचैहों।
विविध प्रकार रिझाय नाथको, फगुवा लै करि रहें ॥ अखंड
मुख पाय अघैहों ॥ आज निज० ॥ कीच उलीच नीच कर्मनको,
निरगुनपर वपैहों। पातिक जाति राख करि कारिखँ, विमुखके
मुखपै लगैहों ॥ तबै धर्मदास कहैहों ॥ आज निज घट बिच
फाग मचैहों ॥ १६ ॥
जड़ चेतनकी उरझी गॉठ, ये तो सुरझत नहि सुरझाई ॥ टे० ॥
अमल अचल अव्यय अविनाशी, जेहि श्रुति गुण बहु गाई। सो
१ व्यवस्था. २ भिन्न. जुदी. ३ सुन्दर रङ्गकी ४ बुद्धि. ५ प्रसन्नकरि. ६ काजल.