कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(३७९)
बनाऊँ । अनहत नाद झांझ डफ वीना ढोल मृदंग बजाऊँ ।
लोभको नाच नचाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ त्रिविधि कर्मकी धूरि उड़ाऊँ
रथ दिनेश ठहराऊँ ॥ जलप्रवाह स्थिर करि सरितनको, विधिको
वेद भुलाऊँ ॥ ध्यान शंकरको डिगाऊँ ॥ सतगुरु० ॥ तन अरपों
मन वारों चरणपर, सब धन धाम लुटाऊँ। साहिब कवीरसे फगुवा
मै लेऊँ तो धर्मदास कहाऊँ ॥ मुक्तिको पन्थ चलाऊँ सतगुरु० ॥ १३ ॥
मैं तो जात हती निज बाँटे २, मोहि सतगुरु होरी खेलाई
॥ टे० ॥ कृपाकी केसर घोरि बोरि तन, चूनरि रंगमें भिगाई ।
शब्द कुम्कुमा मारि हजारन, ज्ञान गुलाल उड़ाई ॥ जाय नभ
ऊपर छाई । मोहि सतगुरु० ॥ आय विवेक अबीर पन्यो, मेरे
नयनन अति सुखदाई । विविध प्रकार उपाय कियो, नहि निकस्यो
रह्यो समाई ॥ कछू मोसे बन नहि आई ॥ मोहि सतगुरु० ॥
त्यागि दियो धन धाम काम सब, बास एकान्त सोहाई । मिल्यो
अचानक आय प्राणपति, कर गहि कण्ठ लगाई ॥ भूल गई सब
चतुराई । मोहि सतगुरु० ॥ सगरो शृंगार बिगार दियो मेरो,
भरमकी गाँठ छुड़ाई । लाजकी बात न जात कही कछु, निज
उपदेश हटाई ॥ दियो एक मन्त्र सुनाई । मोहि सतगुरु० ॥ अँस्ति
भाँति प्रिय रूप है तोरो, सब तेरो प्रभुताई । गाय कवीर
अबीर उड़ायो, धर्मनि अति सुख पाई ॥ बजी तिहुँ लोक
बधाई ॥ मोहि सतगुरु० ॥ १४ ॥
आज मैंने देखो अँनोखो खिलारी । मोसे करि झकंझोरी
होरी खेले वरजोरी, मोरी सर्गरो भिजोय दीनी सारी ॥ टे० ॥
लोक वेद मग जात अचानक, रोकत गैल हमारी । कर गहि कँगन
मोहके तोरत, अरु मारत पिचकारी ॥ देत गुरुगंमकी गारी ।
१ रज. २ भाग ३ सत. ४ चित. ५ आनन्द. ६ अद्भुत. ७ छाना सपटी. ८ संपूर्ण. ९ गुक्का ज्ञान.