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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

शब्दावली

(३४५)

गारी ॥ ४ ॥

हौं मैं सत्यनामसे राजी । जासे जीती सारी बाजी ॥ १ ॥
मैं रतन अमोलक पाया । ताते कौडी हाथ न लाया ॥ २ ॥ मैं
पहिरौं मुक्ता मोती । ताते छाडी कांचकी ज्योती ॥ ३ ॥ जहाँ ब्रह्मा
विष्णु महेशा । हम छोडे तिनके देशा ॥ ४ ॥ जहाँ कोटि भानु
प्रकाशा । तहाँ का दीपककी आशा ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं कवीर
विचारी । मोहि साधु संगत लगी प्यारी ॥ ६ ॥

गारी ॥ ५ ॥

जाको चरणामृत लीजे । तिहिं गारी काहेको दीजे ॥ १ ॥
जासे मुक्ति पदारथ पव्ये । ताको हृदय माहिं समव्ये ॥ २ ॥
जाको लोभ मोह भर्मावे । ताको हीरा हाथ न आवे ॥ ३ ॥ जो
काम क्रोध मद माता । सो बांधे जमपुर जाता ॥ ४ ॥ संसार
जाल है भारी । मेरे सन्तनकी मति न्यारी ॥ ५ ॥ सन्तो कहहिं
कवीर विचारी । मोहि साधु संगत लागे प्यारी ॥ ६ ॥

गारी ॥ ६ ॥

जोरा जोर जनावे, या माया पर पनचनिया ॥ दोय रूप बनावे,
इक कनक इक कामिनिया ॥ १ ॥ इक जावे इक रहावे, इक संशय
यह मारनिया ॥ ताको काटिये कैसा, संत जन लेउ विचारनिया
॥ १ ॥ चलि सतगुरु सरना, करिय जाय पुकारनिया ॥ हम
माया फांसे, जन्म जन्म जम डांडनिया ॥ २ ॥ हम बहु दुख
पाये, सतगुरु लेहु उबारनिया ॥ भइ अधरते वानी, विगसित
कमल परकाशनिया ॥ ३ ॥ समरथ सुनि आये, विरह दुख द्रन्द
निवारनिया ॥ हम हाहो दुख पावैं, सतगुरु ऊपर वारनिया ॥ ४ ॥
देहु अत्र बधाई, काम क्रोध दल मारनिया ॥ पद देह मवासी,
कर देउ निस्तारनिया ॥ ५ ॥ कालहु शिर नाई, जे लूटे तिरदेवनिया ।
गावैं साहब कवीर, अब नहिं आऊं संसारनिया ॥ ६ ॥