कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 968 में से
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कवीरपंथी—
बनावहु जी ॥ ५ ॥ मनसा मारिके सरस बनावहु, प्रेमके घृत
चुआवहु जी ॥ ६ ॥ सतके दूध रु करनीके खोआ, शूकर सुमति
मिलावहु जी ॥ ७ ॥ यह सुख पाव जिमि सजन हमारो, श्वासकी
बेनिया डोलावहु जी ॥ ८ ॥ शीश भार भरे जल अमृत, सजनको
अचवन करावहु जी ॥ ९ ॥ पाँच पचीस पकड़ि नौ नारी, सजनको
गारी गवावहु जी ॥ १० ॥ तत्व तमोधिनि सुधर सुमति ले,
सजनको बिरिया खवावहु जी ॥ ११ ॥ एकइस खण्ड महलके
भीतर, निर्भय पल्लंग बिछावहु जी ॥ १२ ॥ धर्मदास कहैं साहेब
आये, सुक्ति पदारथ पावहु जी ॥ १३ ॥
गारी ॥ ३ ॥
सेवकके सतगुरु पाहुन आये। कालेकरउँ मिजमानी जी ॥ १ ॥
चरण धोय चरणामृत लेऊँ, तनकी तपन बुझावउँ जी ॥ २ ॥
चित चौका सन्तोष बैठिका, प्रेमके पातरि लावउँ जी ॥ ३ ॥
निरतिके गडुआ जल भरि लावउँ, परसहुँ सुरति सयानीजी ॥ ४ ॥
अकिलके आम रु नेहके नेसुआ, अदरख आदर मिलावउँजी ॥ ५ ॥
शीलके सेम रु भावके भण्टा, बनि है करार करैलाहुजी ॥ ६ ॥
धोयके डारो विचारके जलसे, कर्मनकी कडुआई जी ॥ ७ ॥
हियकी हलदी नामके नीमक, तत्वके तेलमें बघारहु जी ॥ ८ ॥
मनके मूंग मनसा मुँगौरा, प्रीतिके पापड लावहु जी ॥ ९ ॥ दिलकी
दाल अरु हेतुके बरा, सुरतिके घृतमें छनावहु जी ॥ १० ॥ दयाके
दही ले कढी बनावहु, तेहिमें बरा भिजावहुजी ॥ ११ ॥ दुबिधाकी
लकड़ी बुद्धिसे चीरहु, ज्ञानकी अगिन जरावहुजी ॥ १२ ॥ महिमा
पुरी मनोरथ चटनी, युक्ति जिलेबी लावहुजी ॥ १३ ॥ एत जेवनार
बने घट भीतर, सतगुरु नेवति बुलावहुजी ॥ १४ ॥ साधु सन्त
मिलि जेवन बैठे, छुटे प्रेम रस गारी जी ॥ १५ ॥ कहहिं कवीर
सुनो धर्मदासा, शोभा लेहु अधिकारीजी ॥ १६ ॥