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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(३३३)

सुमिरहु कामिनि सुमिरहु, सुमिरहु आपन नाह ।
अधर साहिब हम देखिया, जहँवाँ धूप न छाँह ॥ १ ॥ विनारे
घटा घन गरजई, विनु जल तिरथ नहाय । देखतहौं सुख ऊपजे,
सुमिरत कर्म कटाय ॥ २ ॥ विन पानीके जीवन, विनु दीपक
उजियार । ऐसो निर्गुण देखिके, पगखु शब्द टकसार ॥ ३ ॥
साहेब कवीर कहैं दीहल, अब सोहंगम फूल । अब मोरे जन्म
सुफल भये, पाये मुक्तिके मूल ॥ ४ ॥

दीहल (५)

साखी-मानहु गुरुके वचन पिय, हरदम खबरजु लेय ।
जो चित अन्ते जाइहैं, तौ गुरु ताजन देव ॥६॥

गुरुके वचन मोरे प्रियतम, हरदम खबर जुलेय । जो चित
अन्ते जाइ हैं, हँसि पिय ताजन देय ॥ १ ॥ पार बसे मोर
प्रियतम, दुर्बल भइ मोरि देह । पांच भैया संग दारुण, तिनसे
छुटल सनेह ॥२॥ जिनके आंगन नदिया वहे, सो कस कुआँमें
नहाय । जाघर नारि सुलक्षण, सो कस पर घर जाय ॥३॥ गृहि
आंगन नहि भावई, सुख संपत्त नाहि सुहाय । निर्गुन नाह न
आवई, सेज गयल कुम्हिलाय ॥४॥ जो साहेब वर पाइहों, नेहर
धरे उठाय । सेज बेठे सुख विलसहिं, गुरुमुख मङ्गल गाय ॥५॥
साहेब कवीर कहि दीहल, छुटल कुल पारिवार । चरण कमल
चित राखहु, पूरण नाम अधार ॥ ६ ॥

दीहल (६)

सा०-नेहर आपन कोइ नहिं, जासे करूं पहिचान ।

प्रेमसहित सखि मिलिलेहु, निजप्रियसुखप्रदजान ॥६॥

मिलि रहु सखिरी तु मिलि रहु, अपने पिया सुख जान ।
नेहर आपन कोइ नहीं, जासे करौं पहिचान ॥ १ ॥ मोरे जिवके
भावतु, छाय रहो वहि देश । मैं विरहिनि निश दिन फिरोँ, धरि