कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
दीहल (२)
साखी-मानहु शब्द हमार यह, सतगुरु सुमिरण सार ।
नतु पाछे पछताइहो, जब पडिहैं जम मार ॥ २ ॥
फेरु पछितायव हे कामिनि, मानहु शब्द हमार ॥ टेक ॥
चन्दन जानि विरछा रोपल, सेहू भेल सेमर पलास । फुलवा देखि
धीरज बांधल, फल देखि भयल निरास ॥ १ ॥ बिनारे सोनाके
कैसन आभरण, बिन मोती कैसन गरहार । बिनारे मज्याके
कैसन नेहर, बिनु स्वामी कैसन सिंगार २ कायारे कंचन गढ
टूटल, छूटल कुल परिवार । दशो दुआरिया जमुआ रोकल,
कौनेविधि होयब पार ॥ ३ ॥ साहेब कवीर कहि दीहल, शब्द
परखु टकसार । बहुरि न यहि जगमें आयब, फिर न मनुष अव-
तार ॥ ४ ॥
दीहल (३)
साखी-कामिनि अचरज देखहु, जहँ नहिं धरनि अकाश ।
चान्द सूर जहवाँ नहीं सत्य, शब्द परकाश ॥ ३ ॥
अचरज देखहु कामिनि, कहौं तो को पति आय । अधर
साहेब हम देखलौं, सतगुरु डोलिया फनाय ॥ १ ॥ चांद सुरज
है वहां नहीं, वहां नहिं धरनि अकाश । तौने पुरुष मोरे प्रिय-
तम, केहि विधि करौं निवास ॥ २ ॥ गुरु दर्शनके कारने, सर-
वस दियो लुटाय । एक पलकके बीछुडे, अब मोहिं कछु न
सोहाय ॥ ३ ॥ गुरु दर्शन हम पायलौं, छूटल कुल परिवार ।
अब जेहौं पुर आपने, परखु टकसार ॥ ४ ॥ साहिब कवीर कहे
दीहल, हृदय करहु विचार । अरस परस करु कामिनि, निर्गुण
नाह तुम्हार ॥ ५ ॥
दीहल (४)
सा०-सुमिरहु कामिनि नाह निज, जहँवाँ धूप न छाँहिं ।
देखत अतिसुख ऊपजे, सुमिरत कर्म कटाहि ॥ ४ ॥