कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
मानो भरम सँदेश ॥ १५० ॥ कर जोडे बिनती कहूँ, भवसागर
आपार । बन्दा ऊपर मिहर करो, आवा-गवन निवार ॥ १५१ ॥
अन्तर््यामी एक तू, आत्मके आधार । जो तुम छोड़ो साथको,
कौन उतारे पार ॥ १५२ ॥ भव सागर भारा महा, गहिरा अगम
अथाह । तुम दयाल दया करो, तब पाऊँ कछु थाह ॥ १५३ ॥
साहेब तुम्ही दयाल हो, तुम लग मेरी दौर । जैसे काग जहाजको,
सूझै और न ठौर ॥ १५४ ॥ साईं तेरा कुछ नहीं, मेरा होय अकाज ।
बिरद तुम्हारे लाजकी, शरण परेकी लाज ॥ १५५ ॥ मेरा मन
जो तोहि से, यों जो तेरा होय । अहिरण ताता लोह ज्यों, संधि
लखै नहिं कोय ॥ १५६ ॥ मेरा मन जो तुझसे, तेरा मन कहिं
और । कह कबीर कैसे निभै, एक चित्त दुइ ठौर ॥ १५७ ॥
मुझ अवगुण तुझ गुण घणा, तुझ गुण अवगुण मुझ ॥ जो मैं
बिसरूँ तुझको, तू नहिं बिसरो मुझ ॥ १५८ ॥ तुझ विसारा
सैर नहीं, किसके शरणें जाहि । शिव विरंचि मुनि नारदा, सो
न हिरदय समाहि ॥ १५९ ॥ मैं अपराधी जनमका, नख शिख
भरा विकार । दया करो तुम राम जी, तो मैं उतरूँ पार ॥ १६० ॥
साईं मेरा सावधान है, मैहीं भया अचेत । मन बच कर्म न हरि
भजा, ताते निष्फल हेत ॥ १६१ ॥ मन प्रतीति न प्रेम रस, ना
कोइ तनमें ढंग । ना जावूँ उस पीवसे, क्योंकर रहसी रंग ॥ १६२ ॥
जिनको साईं रंग दिया, कवहुँ न होय कुरंग । दिन दिन बाणी
आगरी, चढ़ै सवाया रंग ॥ १६३ ॥ साईं जो मुझको मिलै,
पूछैंगे कुशलात । आदि अन्त की सब कहूँ, उर अन्तर की बात
॥ १६४ ॥ कविरा तू तो गारुआ, हलकी अपनी चाल । रंग
कुरंगी रंगिया, किया और लगवार ॥ १६५ ॥