कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(२६९)
शुकदेव ॥ १३६ ॥ जनक विदेही गुरु किया, लगा हरिके सेव ।
कहै कवीर बैकुण्ठमें, उलटि मिला शुकदेव ॥ १३६ ॥ पूराको
पूरा मिलै, पूरा पड़े सो दाव । निगुरा तो उम्भर चले, जब तब
चलै कुदाव ॥ १३७ ॥ जो कामिनि परदे रहै, सुनै न गुरु मुख
बात । होय जगतमें कूकरी, फिरै उधारै गात ॥ १३८ ॥
अब विनती (प्रार्थना)
विनवत हौं कर जोरिके, सुनियो कृपा निधान । साधु सँगति
सुख दीजियो, दया गरीबी दान ॥ १३९ ॥ अबकी जो सतगुरु
मिलै, सब दुख आँसू रोय । चरणों ऊपर सर धरूं, कहूं जो
कहना होय ॥ १४० ॥ सुरति कर मोर साँइयाँ, हम हैं भवजल
माँहि । आपेही बहि जायँगे, जो नहिं पकड़ो बाँहि ॥ १४१ ॥
क्या सुख लै विनती कहैं, लाज आवत है मोहिं । तुम देखत
ओगुन किये, कैसे भाऊं तोहिं ॥ १४२ ॥ सतगुरु तोहिं विसारिके,
किसके शरणे जाँय । शिव विरंचि मुनि नारदा, हृदय नाहिं
समाय ॥ १४३ ॥ मैं अपराधी जनमका, नखशिख भरा विकार ।
तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ १४४ ॥ अवगुण मेरे
बापजी, बखशो गरीब निवाज । जो हौं पूत कपूत हौं, तऊ
पिताको लाज ॥ १४५ ॥ अवगुण किये तो बहु किये, करत न
मानी हार । भावे बंदा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ १४६ ॥
कविरा भूल बिगाडियाँ, करि २ मैला चित्त । साहेब गरूआ
चाहिये, नफर बिगाडे नित्त ॥ १४७ ॥ साईं तेरे बहुत गुण,
अवगुण कोई नाहिं । जो दिल खोजूँ आपना, सब अवगुण
मोहि माँहिं ॥ १४८ ॥ साहेब तुम जनि बीसरो, लाख लोग
लगि जाँहि । हमसे तुमरे बहुत हैं, तुम सम हमरे नाहिं ॥ १४९ ॥
अवसर बीता अल्प तन, पीव रहा परदेश । कलंक उतारो रामजी,