कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
तेरी दिन मशअल जलाये । शरीअत शाखकर शारी मुखालिफ
नजाते राह इन्साँकों बताये ॥ नबी पीरों फकीरों कैल फरजन्द।
सभी औतार धर अछह जताये ॥ सभोंमें बरतरी हैं राम और
कृष्ण । निरंजन राय खुद धर देह आये ॥ जिते मजहब हैं इस
आलममें जारी । न राहे रुस्तगारी कोई दिखाये ॥ नहीं मज-
हब सो सारे कालके जाल । किया मंसूख इक दूजा चलाये ॥
किया सुरगाने जेरक दर कफस बन्द । जो दानांकी तरपा दिल
को झुकाये ॥ फँसे उसदाममें आराम जानाँ । जपे सब रामनहि
सतनाम पाये पड़ीं सब गाय दरकाबू कसाई । जिधर जावें
उधर छूरी उठाये ॥ किया तब रहम तू शुशैद हकीकी । जो
साहब था सो सत सुकृत कहाये ॥ करे सब जीवके दुख दन्द तू
दूर । तेरा है नाम बन्दी छोर मशहूर ॥ ३ ॥
तेरे मस्तोंकी मस्तीको न जाना । हुआ मदहोश बे खुद और
दीवाना ॥ अनलहक भी न पहुँचे अपने हकको । हुआ था यह
अनलहकका बहाना ॥ कोई नागा कोई भागा बियाबाँ । कोई
अन्दर जमीके जा छिपाना ॥ कोई गावे बजावे तान तोडे । नकल
भांडोंकी सबने अकू ठाना ॥ हुए बेगानः सब अपने अमलसे ।
न पहचाने कोई अपनायगाना ॥ तेरे प्यालेसे इक कतरा जो पीया
लिया सो जान मुर्दोंका जिलाना ॥ नहीं भगवा तिलक कन्ठी
न माला । निराला भेष धर तुझमें समाना ॥ हुआ जब अरुल
से वह वरुल अपने । हुआ तब कतरये दरिया जमाना ॥ तेरी
बेमिस्ल सागर मुश्कबूसे । रहे क्या अकू आदमके ठिगाना ॥
मुअत्तर मगज-उसबूसे हुआ जब । तो दानाईको खो बैठे हैं दाना ॥
हुए बेखुद खुदीको खोय बैठे । अब तक तीर पहुँचा बरनिशाना ॥