कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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और नालायक व नादार। तु सब लायक है खाली पूर करदे ॥
हमारे बद अमल पर मत नजर कर। सरन और नाम अपनेका
अजरदे ॥ बहुत दिनका सगे दर हूँ मैं तेरा। न दुर दुर कर
न दुर कर पेट भरदे ॥ ना जाऊँ दर बदर इक दरे उम्मीद।
बचाले जान और जिवदान बरदे। मिहरकी बहर तू बेहद न
पायान। मिहर कीजे मिहर कीजे अपनी लहरदे ॥ सगे दरको
फिरा हरगिज न दर दर। मिहर कीजे मिहर कीजे मिहरकर॥१॥
तुही कुनसे किया कूनों मकाँको। तुही बरपा किया सब
जिस्म व जाँको ॥ तुही सतपुर्ण ज्ञानी नाम तेरा। तुही बतला
दिया नामे निशाँको ॥ किया तुहीने मलकुल मौत पैदा। तुही
भेजा है सुरशिव मिहवाँको ॥ कहरेके वास्ते कर काल ज्वार।
मिहर कर फिर किया अमनो अमाँको ॥ बनजमे इस जहाँ निर-
गुन बनाना। किया पैदा हरी हर वेदरुवाँको। किय मकबूल
और मकरुह व मरदूद। तुही खूबी दिया जन्नत जनाँको ॥ तेरे
सब नाम हैं आराम बरुशें। वले सब वरुफ सतनाम सुबहाँको ॥
तेरे औसाफ लायक न मलायक। है क्या इमकान इन्साँकी
जबाँको ॥ न जाना भेद कुछ हम्दे सरायां। बयों किस तौर
कीजे लाबयाँको ॥ तुही बेमिस्ल साहब सबका सरदार। तुही
बरुशे अद् और दोस्ताँको ॥ अलख तुही है कोई लख न पाया।
ना जाने भेद तुझ राजे निहाँको ॥ तुही सब कुछ किया है सबमें
मौजूद। तुही देता है हरकस हर जमाँको ॥ बहर खानो बहर
शानो बहरशे। तुही था और तुही होगा तुही है ॥ २ ॥
हजारों पीर गैगाँबर बनाये। जुदा सब मजहबो मिह्वत
चलाये ॥ नहीं वह नूर सद मासूर तारे। मिहर तुझ रुख मिहर
दैजूर जाये ॥ नहीं लमअ सौसद शमअ शविस्तां। कि बरकत