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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

शब्दावली ।

(१३७)

दाद कीजे रसूल ॥ १३ ॥ सदगार सकल सन्त रोशन जमीर
सेवक तलबदार दाय़ा कवीर ॥ १४ ॥

इति अर्जनामा गरीबदासजीका ॥ ३ ॥

विनय अष्टपदी ।

प्रभुजी तुम विनु कौन छुडावे ।

महा कठिन यम जाल फाँस है, तासो कौन बचावे ॥ १ ॥
नाना फाँस फँसाय जीवको, आपन रूप छिपावे । पंच कोश
होय प्रगट आसे, तेहिको कौन लखावे ॥ २ ॥ आपहि एक
अनेक कहाई, त्रिविधि रूप बनावे । सन्निपात होय दुष्ट नष्ट
सो, परलय अंत दिखावे ॥ ३ ॥ विषय विकार जगत् अरुझावे,
जहाँ तहाँ भटक़ावे । योग ध्यान विगुर्चन भारी, ताहि सुरति
अटकावे ॥ ४ ॥ आशा नाम नौका बैठावे, भौकी धार बहावे ।
तत्त्वमसि कहि ताहि डुबावे, अन्त कोइ नहि पावे ॥ ५ ॥ चारि
मुक्ति योनि चौरासी, तेहि मिलि हेतु बढावे । नेम धर्म पूजा
औ संयम, बहु विधि लाग लगावे ॥ ६ ॥ भेष अलेख करे को
पावे, जीवहिँ चैन न आवे । चारि नेद षट अष्टदशोले, शून्यहिँ
शून्य समावे ॥ ७ ॥ काल चक्र बसि उत्पति परलय, जीव दुसह
दुख पावे । साहब दया कीन्ह परखाये, रामरहस गुण गावे ॥ ८ ॥

दशाष्टक स्तोत्र ।

नमामि सर्व संत जिनको मनाऊं । चरण रेणु जिनकी मैं शिर-
पर चढाऊं ॥ चरण रेणु प्रताप भ्रम नाश जालं सुसंतन कृपाते
मिले गुरु दयालं ॥ १ ॥

गुरु चरण शोभा सकेको वर्ण । तरेडनन्त जीवा गुरु चर्ण
शरणं ॥ गुरु चर्ण रेणु धरो मोर भालं । नमो गुरु दयालं कवीरं
कृपालं ॥ २ ॥