कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
घाट ॥ ३० ॥ ब्रह्म तेजताली हमाली हुजूर । अग्रपंथ पाया
समाया जहूर ॥ सतगुरु शरीकत हकीकत जवाब । कहो कौन
लेगा शरमें हिसाब ॥ ३१ ॥ मौले मिहरवान मालिक सुरारि ।
हीरा हिरम्बर तुही वारपार ॥ सतगुरु दिगम्बर विश्वम्बर दयाल।
पलमें निवाजे जो नजरे निहाल ॥ ३२ ॥ अगम ज्ञान लासा
खुलासा जो सैल । पपीली न पहुँचे जो लादे है बैल ॥ गरीब-
दास छाना है नीर खीर । कुर्बान कुर्बान कायम कवीर ॥ ३३ ॥
इति अर्जनामा गरीबदासजीका ।
अथ अर्ज नामा ॥ ३ ॥
सतगुरु मिहरवान कीजे करम । गाफिल खुदी हूर दिलका
भरम ॥ १ ॥ बहुत रोज बीते मैं तेरी शरण । स्याही गई अब
सफेदी बरन ॥ २ ॥ सुझे बहुत अंदेशा किया मैं जो फेल ।
बदी बहुत कीता ओ नेकी निसेल ॥ ३ ॥ क्या मैं कहूं संगी
बुरे सोहबती । किया चाहते ये सुझे बे डुरमती ॥ ४ ॥ आजिज
मैं तनहा दुसमन जबर । अर्जी कहूं मैं मेरी लीजे खबर ॥ ५ ॥
सतोगुनकी चौकी व अपनी भगत । इतनी नाथ कीजे सो मेरी
मदत ॥ ६ ॥ काया कोट माहिं मैं निशिदिन लहुँ । दुशमनकी
लशकरसे नाहीं डरूं ॥ ७ ॥ नवे मोरचा खूब कायम कहूं ।
देशमें जमैयतसे लगाकर रहूं ॥ ८ ॥ तुम्हारी तबजुहसे दुशमन
डरे । हटा अपना माने न मुशिकल करे ॥ ९ ॥ निर्भय हरष होय
संशय मिटे । सबे रोज दिल बीच रटना रटे ॥ १० ॥ अन्तः
करन प्रेम नैना पगे । जगत कर सब स्वाद फीका लगे ॥ ११ ॥
तुम्हारी विरह अग्रिममें निशिदिन जहूं । चौथी अवस्थाको हासिल
कहूं ॥ १२ ॥ मेरी अरज होवे दरगह कबूल । दिलकी सुराद