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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१३१)

हरियान सो पान नर ताहि गहुरे । कक्वीर कक्वीर कक्वीर० ३८
नर धाय पदकंज मनमंज कीजे । यह चैन वह चैन सुखवास
लीजे ॥ दोऊ ओर कर पच्छ सो स्वच्छ गहुरे । कक्वीर कक्वीर
कक्वीर० ॥३९॥ कही ताहिसुखलाल सुखलालबरने । मिटि जात
जगतात जन्माद मरने ॥ यह जान मन मान मरना सु गहुरे ।
कक्वीर कक्वीर कक्वीर कहुरे ॥ ४० ॥

साखी ।

चालिस छंद प्रबंधये, बांचत डरपे काल । साधन प्रेम वढा-
वहीं, जम दूतन को साल ॥

इति कबीरचालीस ।

अथ अरबी नाम ।

करतहों पुकार मेरो तुमही हो आधार, सुनु वेगही गोहार
साहेब वार काहे लायेहो ॥ बडे बडे संकटमें संतन सहाय कीन्हों,
राखो प्रण जनको निज पैजहू बढायेहो ॥ जनको दुःख दुखित
देख संतनको कलाप मेट, दहन दुखदाप सुखसागर देन आयेहो ॥
सेतुबंद बांधवेको रामचन्द्र विकल भये, लिखे सतरेखा जलपा-
हन उतरायेहो ॥ द्रापर पगुधारे निस्तारे नृपबधू ब्याल, विषम
विडारे जमफंद ते छोडायेहो ॥ पांडोंके कुमार विकल यज्ञके
प्रकार, बहे संसेकी धार हारि सीस भुमि लायेहो ॥ वाको यज्ञ
सारो बिडारो दुखदारुणते, सकल भेष भूषन मिली जय जय
उचरायही ॥ कलउ तन धारे सब भेषनके काज सारे, प्रथमें
पुरुषोत्तम पुरि देवल थपाये हो ॥ सागर हटाय अम भौजल
मिताय, परगटे अनंत रूप चकित द्विज कराय हो ॥ बलख
सिधाये छुड़ाये बहु भेषन दिढाइ, सुलतान भक्ति मार्ग लगाये
हो ॥ सिंधु वोहित बचाये दाह पंडन को बुझाये, आये नगर