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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 136

(१३०)

कवीरपंथी-

कव्वीर० ॥२६॥ बोधे दोई दीन तहां कीन्ह ऐसो । समुझाय दर-
साय जिहि जौन जैसो । तजि देह दोहु और हथियार गहुरे ।
कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२७॥ दोहु ओर क्रोधा सु जोधा बडे
हैं । अपने जु अपने सु प्रनपे अडे हैं ॥ तक तास नियरान यह
बानगहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२८॥ देखो उघारी उहां है
वो नाहीं । केहि काज लरते सु मरते वृथाही ॥ तब आय दोउ
दीन देखा न अहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥२९॥ स्थूल घर
फूल अघ्रान भारी हे ब्रह्म ! हे पीर ! रटना पुकारी ॥ सुनी दीन
बानी सु तिहि दर्श बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३०॥ पुनि
एक औरि सुनो रे सुनाऊं । लखि स्वामि ऐसो सु दिन रेन माऊं ॥
तत्ताव जीवा प्रण ऐसो गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३१॥
सूखो इतो एक लकडा पुरानो । हरिआय जिहि चरण चरनोद
जानो ॥ गाडो है सो आय अगनाय बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर०
॥३२॥ जुरि आय बहुभेष दग देख लीजे । पानी सो छानी औ
गुरुजान कीजे ॥....साधू सो है सूर प्रण पूर गहुरे कव्वीर कव्वीर
कव्वीर० ॥ ३३ ॥ न्यारे सु न्यारे ले चरना पखारे । जिहिभांत
जिहरीत करप्रीत ठारे ॥ हरियान नाही सो उरदाह दुहुरे ।
कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३४॥ तब जानजन प्रीत प्रण पूर आये।
उर दाह लागी सो छिनमें बुझाये ॥ लै चरण चरनोद मनमोद
बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३५॥ डारो है कर प्रीति परतीति
आयी । हरियान निरजीव सरजीव भायी ॥ दोऊ बन्धु निरद्वंद
सरना सु गहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥ ३६ ॥ सो टूट ना
आय जी जगत केरे । जर भक्त अंकूर जमराज पेरे ॥ सो आप
गुरुरूप निजरूप बहुरे । कव्वीर कव्वीर कव्वीर० ॥३७॥ चरना
दह मृत्यु समरत्थ्य करो । करुनाशकी कोर फिर आप हेरो ॥