सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 114

(१०८)

कवीरपंथी—

अन्ता ॥ अछेदं अभेदं अकोहं अमोहं। गुणं ज्ञान गेहं अदेहं अद्रोहं ॥
कृपा लोचनं मोचनं मृत्यु पीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ॥५॥

क्षरं पार पुरुषोत्तमं अक्षरादिं। अलेखं अभेदं निरच्छरं अनादिं ॥
गहंतं महाव्याल कालं करालं। दहंतं भवं संभवं दुःखजालं ॥ नलेशं
कलेशं न माया समीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ॥ ६ ॥

गुणानन्तधामं निकासं अयोनी। अविद्या परम हे क्षमा हेत
छोनी ॥ उपायं पुनःपोष पालं कृपालं। दहादौर्महा भैरवी भैरु-
कालं ॥ धरा धारघै धर्मधी ध्यानधीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ७

कृती सुकृति सुकृतो चित्त चीते। प्रभा ज्ञान गम्यं पदाम्भोज
प्रीते। कवीराष्टकं ये पठंते प्रभातं। भने भूरिभै भर्म कर्म निपातं ॥
लहे लाभ हिरम्बरं रम्य चीरं। शरीरं मनो वाक बन्दे कवीरं ॥८॥

कवीर भानु उदय-सर्वैया

रवि आगम साख समागमको; घरियाल पुकार लगी जब
लोही। सुनि शब्द निसान पिसान भये, सठ सेन सहायक दुर्जन
द्रोही ॥ नरनाग सुरासुर सीस नवै, उदयाचल पै रवि मंडल
सोही। धन्य धन्य प्रभाकर धाम प्रभा, खलबाम बहे तुम्हरो
मुख जोही ॥ १ ॥

कुलकंटक वक्त्र बिलाय गये; रथ चक्र लखे रवि चक्रवर्तीके।
गुनज्ञान गँभीर हिये सरसे, दरसे परसे प्रिय प्राणपतीके। बडभाग
सुभाग सुभागिनको, सुख साज समाज है आज सतीके। विरहातप
ताप संतापविते, भ्रम भये चलिगये गलि ज्ञान गतीके ॥ २ ॥

यह रैन भयँकर घोर महा, तब तेज दहा तिहुँ लोकन स्वामी।
अब सूझि परे कछु बूझि परे, सत्त नाम चरित्र पवित्र प्रनामी ॥

१ नोट-भुजंगप्रयात छन्द चार भागका होता है यथा—पद्यों में प्रभृतं यह हाथ जोरो। फिर बायुते
न कबो बूझि मोरी। भुजंग प्रयातोपमा चित्त जाको। जरं ना कदा मूलिके संग ताको। छन्दप्रभाकर।