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सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१०७)

कङ्काल । हँसी तुम्हारी होत है, वेगहि लेहु सँभाल ॥ २४ ॥
हंसन नायक सदगुरु, सत्य लोक जिहि वास । जिनके शिशुको
जगतमें, काल देत है त्रास ॥ २५ ॥ ओगुण पूरति बाल बुधि,
तदपि पिता गुणवंत । नाम हँसावत पितहिंको, सुनु कवीर
महमंत ॥ २६ ॥ हंस उधारण सत्य गुरु, अधम उधारण नाम ।
बन्दीछोर कृपाल प्रभु, सत्यलोक तव धाम ॥ २७ ॥ हंस उधारण
तारण गुरु, तोर नाम जम माहिं । मैं दुखिया भवमें रहौं, बिरह
तुम्हार लजाहिं ॥ २८ ॥ कहैं लगि कहैं अशरण शरण, गुरु निर्भय
दातार । मैं अनाथ तुव शरण हौं, वेगि उतारो पार ॥ २९ ॥
जो तुम सुधि नहिं लेव तो, दूसर कौन सहाय । काल जालको
मेटिके, देवे पार लगाय ॥ ३० ॥

प्रभाती स्तुति (भुजंगप्रयास छन्द)

कवीरं रविं ज्ञान गो मुक्ति हस्तं । उदे घोस नाथा सनाथा
समस्तं ॥ जनं रंजनं भंजनं भौ विषादं । अनन्तं अनादं स्वसम्बेद
वादं ॥ निरीहं निराधारं ज्ञानं गंभीरम् । शरीरं मनो वाकं वन्दे कवीरं ॥ १ ॥

भयं भाननं काननं कर्म दहंतं । दुखं दारिदं दालकं कालगहंतं ॥
मुनीशं ऋषीशं अहीशं अभेवं । जगन्नायकं पावकं सेव्यं सेवं ॥
वली केलं गर्वं दली बांह वीरं । शरीरं मनो वाकं बन्दे कवीरं ॥ २ ॥

जनं पातकं घातकं सर्वं दोषं । ग्रहंतं परे पार भौ काल कोषं ॥
नभौ भुजनं पूजनं पादकंजं ॥ कृतांतं कृतं निवृत्तं भम भंजं ॥ दूरे
चौर सोहं परे पौर थीरं । शरीरं मनो वाकं बन्दे कवीरं ॥ ३ ॥

स्वसम्बेदं वक्ता विरक्ता विहारं । गुणं निर्गुणं सर्गुणं सर्वसारं ॥
अखंडं अदंडं प्रभुं निर्विकारं । महत्त्वं गुणं पंचतत्त्वं तु पारं ॥
तरं तारनं कारनं तार तीरं । शरीरं मनो वाकं बन्दे कवीरं ॥ ४ ॥

निराकार अंकार हंकार हन्ता । विषय वासना सासना शंक